पढ़ाई और काम के लिए ही नहीं, 'डंकी रुट' तक अपनाकर पंजाब से विदेशों को लगातार पलायन का सबब क्या है! 

2016 के बाद से पंजाब छोड़कर विदेश बस जाने की प्रवृति में जैसा इजाफा हुआ है, उसमें अहम बात यह भी है कि इसमें सबसे ज्यादा संख्या महिलाओं और उसके बाद युवाओं की है।

पंजाब के कई शहरों में इस तरह के बोर्ड नजर आ जाएंगे जो स्टडी और वर्क वीजा हासिल करने के लिए युवाओं को तैयार करने का दावा करते है.
पंजाब के कई शहरों में इस तरह के बोर्ड नजर आ जाएंगे जो स्टडी और वर्क वीजा हासिल करने के लिए युवाओं को तैयार करने का दावा करते है.
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शालिनी सहाय

अब यह वैध हो या अवैध लेकिन आंकड़े बताते हैं कि 2015 तक के मुकाबले 2016 के बाद से पंजाब से महिलाओं का विदेश पलायन बढ़ा है। यह निष्कर्ष पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के एक अध्ययन में सामने आया है। अध्ययन में पाया गया कि महिलाएं (65 फीसदी) स्टडी वीजा हासिल करने में पुरुषों (35फीसदी) से कहीं आगे रहीं और इसका कारण उनका उच्च स्कोर करने और आवश्यक आईईएलटीएस बैंड हासिल करने में सक्षम होना रहा।

अध्ययन में पाया गया कि 1991 से 2015 के बीच प्रवासी परिवारों में पुरुष प्रवासियों की संख्या महिलाओं की तुलना में अधिक थी। हालांकि “2016 के बाद, जब से पंजाबी प्रवासियों का विदेश की ओर आकर्षण बिना किसी बाधा के बढ़ा है, महिला प्रवासियों की संख्या पुरुषों से ज्यादा हो गई है।”

यह भी सामने आया कि ज्यादातर पुरुष प्रवासियों की पहली पसंद वर्क वीजा रहा, उसके बाद स्टडी वीजा जबकि महिला प्रवासियों ने पहली पसंद के तौर पर स्टडी वीजा पर विदेश जाना चुना। शादी के बाद जीवन साथी वीजा का नंबर इसके बाद आया जो लंबे समय से चली आ रही प्रवृति के विपरीत था।

“ग्रामीण पंजाब से विदेशी पलायन पर एक अध्ययन: रुझान, कारण और निष्कर्ष” विषयक शोध का नेतृत्व पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र विभाग की प्रोफेसर शालिनी शर्मा, प्रोफेसर मंजीत कौर और सहायक प्रोफेसर अमित गुलेरिया ने किया। 2021 और 2023 के बीच किए गए इस शोध में 22 जिलों के 9,500 घरों से जानकारी एकत्र की गई जबकि शोध के लिए 1990 और 2022 के बीच विदेशी प्रवास को आधार बनाया गया था। इसमें पाया गया कि 2016 से बाहर जाने वालों की संख्या में खासी बढ़ोत्तरी हुई है।

बाहर जाने वालों में 70 प्रतिशत से ज्यादा पुरुष थे और इनमें भी लगभग 60 प्रतिशत 30 वर्ष से कम आयु वाले और लगभग आठ प्रतिशत 20 वर्ष से कम आयु वाले निकले। पुरुष प्रवासियों में, 43.15 प्रतिशत वर्क वीजा पर और 33.73 प्रतिशत स्टडी वीजा पर गए जबकि महिला प्रवासियों में 64.37 प्रतिशत स्टडी वीजा पर और 14.98 प्रतिशत जीवन साथी वीजा पर विदेश गईं।

अध्ययन का यह भी निष्कर्ष है कि “हालांकि 2016 और 2022 के बीच बेहतर शिक्षित युवाओं की बड़ी संख्या स्टडी वीजा पर कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इटली, यूके, यूएसए गई लेकिन मध्यम आयु वर्ग के तमाम प्रवासियों ने आर्थिक बेहतरी के लिए खाड़ी देशों का रुख करना पसंद किया।”


अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार, ज्यादा कमाई की चाहत में खाड़ी देशों में प्रवास देश के लिए एक अस्थायी नुकसान है जबकि ज्यादा युवा और अपेक्षाकृत अधिक शिक्षित युवाओं का पश्चिमी देशों में पलायन अधिक गंभीर और संभवतः एक स्थायी नुकसान है।

अध्ययन के कुछ प्रमुख निष्कर्ष:

  • पंजाब के 13.34 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों का कम-से-कम एक सदस्य विदेश में रहता है

  • कनाडा (41.88%) सबसे पसंदीदा गंतव्य है। उसके बाद दुबई (16.25%), ऑस्ट्रेलिया (9.63%), इटली (5.54%), यूके (3.49%), यूएस (3.25%) और अन्य (19.98%) हैं

  • 2016 के बाद से प्रवासन में तीव्र वृद्धि दर्ज की गई

  • पलायन के कारक या प्रेरक के रूप में कम आय और रोजगार के अवसरों की कमी (72 प्रतिशत), प्रणालीगत भ्रष्टाचार (62%), नशीली दवाओं का प्रचलन (52%), सामाजिक असुरक्षा (50%), छोटी भूमि जोत (35%), भूमिहीनता (28%) और ऋण (24%) का हवाला दिया गया

  • कम से कम 51 प्रतिशत ने छोड़ने के कारणों में से एक के रूप में “गांवों में गुटबाजी” का हवाला दिया

अध्ययन के दायरे में आए हर ग्रामीण परिवार ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपने बच्चों के स्टडी वीजा के लिए  18 से 25 लाख रुपये खर्च किए हैं। वर्क वीजा और जीवनसाथी वीजा पर चार-चार लाख रुपये खर्च हुए। जिन लोगों ने अवैध ‘गधा मार्ग’ (डंकी रूट) का विकल्प चुना, उन्होंने एजेंटों और दलालों को कहीं ज्यादा भुगतान किया। हालांकि परिवारों का दावा मानें तो ऐसे हर अवैध प्रवासी पर 32 लाख रुपये से अधिक खर्च नहीं किया गया है।

शोधकर्ताओं में से एक प्रोफेसर मंजीत कौर ने मीडिया को अपना आकलन बताया कि इस अवधि के दौरान राज्य के ग्रामीण परिवारों ने अपने बच्चों को विदेश भेजने के लिए 14,342 करोड़ रुपये बतौर कर्ज लिए थे। उनका कहना था कि, “निम्न जाति, निम्न आय और भूमिहीन मजदूरों में से ज्यादातर ने इसके लिए घर और गहने बेचे; जबकि लगभग 56 प्रतिशत परिवारों ने बच्चों को विदेश भेजने के लिए कर्ज लिया। प्रवासी परिवारों द्वारा कर्ज के तौर पर ली गई औसत राशि 3.13 लाख रुपये प्रति परिवार थी। इसमें से गैर-संस्थागत कर्ज 38.8 प्रतिशत और संस्थागत कर्ज 61.2 प्रतिशत था।”

अध्ययन में कृषि संकट को भी पलायन या प्रवासन का एक कारक माना गया है, क्योंकि पलायन का बड़ा हिस्सा छोटे किसानों (5.6 प्रतिशत) में पाया गया, इसके बाद भूमिहीन किसानों (3 प्रतिशत), मध्यम और बड़े किसानों (प्रत्येक में 2 प्रतिशत) का स्थान आता है।

न सिर्फ रोजगार के अवसर और कृषि संकट पर नाराजगी, बल्कि “बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और ड्रग्स का बेलगाम प्रसार” भी उन कारकों के रूप में सामने आए जो देश छोड़ने के फैसले के पीछे रहे। साफ बात है कि कछुआ चाल चलने वाले, भ्रष्ट और अकुशल प्रशासन को लेकर लोगों में बहुत निराशा है, जहां सरकारी कर्मचारी नागरिकों की मदद करने के बजाय उन्हें परेशान ज्यादा करते हैं।


हताशा और नतीजतन देश छोड़ने की इच्छा इतनी प्रबल है कि अनेक प्रवासी परिवारों ने जमीन, प्लॉट/मकान, कार, सोना और ट्रैक्टर जैसी अपनी संपत्तियां बेच दीं या गिरवी रख दीं। ज्यादातर निचली जाति, भूमिहीन और कम आय वाले परिवारों ने अपना संचित सोना बेचने का सहारा लिया। लगभग 18 प्रतिशत छोटे कृषक परिवारों ने जमीन बेच दी।

अध्ययन से यह भी पता चला कि परिवार की चांदी और सोना बेचने वालों में 28.42 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 35 प्रतिशत भूमिहीन और 17 प्रतिशत छोटे किसान थे। कम आय वाले कई किसानों ने बच्चों को विदेश भेजने के लिए अपने ट्रैक्टर तक बेच दिए।

सबसे बड़ी बात कि 95 प्रतिशत प्रवासियों और उनके परिवारों के 91 प्रतिशत लोगों का कहना है कि वे देश छोड़ने के अपने फैसले से खुश और संतुष्ट हैं। इनमें से 60 प्रतिशत से अधिक ने विदेश प्रवास को उचित ठहराया और बताया कि प्रवासियों ने विदेशों में बेहतर रोजगार हासिल किये हैं और बेहतर जीवन स्तर का आनंद ले रहे हैं। लगभग 19 प्रतिशत प्रवासियों ने वहां के ‘बेहतर शासन’ और प्रणालियों (सिस्टम) को अपनी संतुष्टि का आधार बताया।

परिवार के अपेक्षाकृत युवा सदस्यों के इस उर्वर जमीन की ओर उन्मुख हो जाने के कारण पीछे छूट गए परिवारों का नेतृत्व वृद्ध पुरुष और महिलाओं के हाथ में है और इसका असर दोनों पीढ़ियों पर पड़ रहा है। जो लोग अब भी संयुक्त परिवारों में रहने का सुख भोग रहे, वे बेहतर स्थिति में हैं, लेकिन तमाम ऐसे एकल परिवार भी हैं जहां बुजुर्ग अकेलेपन का शिकार हैं और उन्हें घर का सारा काम खुद ही करना पड़ता है।

यह भी सही है कि विदेशों में रहने वाले तमाम युवा अपराध बोध का शिकार हैं, हालांकि उनमें से कुछ अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल के लिए पर्याप्त पैसे भेजने में सक्षम हैं। सौभाग्य से, अध्ययन का यह भी एक निष्कर्ष है कि “सर्वेक्षण में शामिल अधिकांश ग्रामीण परिवार अब भी संयुक्त परिवार” हैं।

फिर भी, सर्वेक्षण के अनुसार कम-से-कम 52 प्रतिशत बुजुर्गों ने अकेलेपन की शिकायत की जबकि 41 प्रतिशत परिवारों ने माना कि पीछे छूट गए बुजुर्ग उपेक्षा का शिकार हैं। एक चौथाई परिवार भूमि जोत और अन्य संपत्तियों की बिक्री के बाद अपना सहारा खो चुके हैं जबकि एक तिहाई से अधिक परिवारों का कहना था कि वे कर्जदार हो गए हैं और उन पर उधार वापसी का दबाव है।


यह पूछने पर कि इस प्रवृत्ति को उलटने, प्रवासन रोकने या इसकी रफ्तार धीमी करने के लिए क्या होना चाहिए, 96 प्रतिशत लोगों ने रोजगार के अवसरों में सुधार और विस्तार करने, ‘अच्छी नौकरियां’ और ‘स्थिर आय’ सुनिश्चित करने की जरूरत पर बल दिया। एक चौथाई से अधिक लोगों ने माना कि वे सुरक्षित महसूस नहीं करते हैं और लालफीताशाही से निपटना उनके लिए बड़ी मुश्किल है।

उन्होंने माना कि ‘सिस्टम’ में सुधार होना चाहिए और इसे अधिक कुशल बनाना चाहिए। कम-से-कम 21 प्रतिशत ने कृषि को अधिक व्यावहारिक बनाने का सुझाव दिया जबकि आठ प्रतिशत का मानना था कि सरकारी संस्थानों में बेहतर और सस्ती शिक्षा इस समस्या का बड़ा निदान हो सकती है।

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