क्या बालकनाथ को मिलेगी राजस्थान की कमान, आखिर कौन हैं तिजारा से नए बने विधायक और क्यों है उनके नाम की चर्चा !

बालकनाथ ने अभी तक खुद को राजस्थान के सीएम के तौर पर पेश नहीं किया है, लेकिन तिजारा ही नहीं बल्कि राजस्थान के अन्य इलाकों में उन्हें सीएम बनाए जाने की मांग और अटकलें दोनों सामने आ रही हैं।

फोटो: सोशल मीडिया
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प्रकाश भंडारी

विधानसभा चुनावों के नतीजों का ऐलान होने के बाद जहां तेलंगाना में कांग्रेस मुख्यमंत्री ए रेवंत रेड्डी शपथ ले चुके हैं, वहीं मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जीत दर्ज करने वाली बीजेपी अभी तक मुख्यमंत्रियों के नाम तय नहीं कर पा रही है। सबसे ज्यादा चर्चा में राजस्थान है जहां एक साथ कई नाम सीएम पद के लिए हवा में तैर रहे हैं। इन्हीं में से एक नाम है महंत बालकनाथ, जो अलवर जिले की तिजारा सीट से बीजेपी विधायक बने हैं।

वैसे तो महंत बालकनाथ बीजेपी के लोकसभा सांसद थे, लेकिन चुनावी नतीजे आने के बीजेपी ने अपने उन सभी सांसदों से इस्तीफा दिलवा दिया हैं जिन्होंने विधानसभा चुनाव जीते हैं। नतीजे घोषित होने के महज 18 घंटों के भीतर ही महतं बालक नाथ दिल्ली रवाना हो गए थे, और उन्हें उम्मीद थी कि लोकसभा में उनका शानदार स्वागत होगा। उनका स्वागत करते हुए कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने टिप्पणी भी की थी, “यह बनेंगे राजस्थान के सीएम...”

इसके जवाब में बालकनाथ ने कहा था, “मैंने तो मुख्यमंत्री पद का कभी दावा ही नहीं किया। मुझे पार्टी ने आदेश दिया था विधानसभा चुनाव लड़ने का। मेरा कर्तव्य अलवर निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के प्रति है, और मैंने अपनी पूरी निष्ठा से उनकी सेवा की है। बीजेपी मुझे जो भी जिम्मेदारी देगी, मैं उसे निभाऊंगा...इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कह सकता...।”

राजस्थान में सीएम की कुर्सी के लिए वसुंधरा राजे, दिया कुमारी, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और अर्जुन राम मेघवाल के नामों की चर्चा है। जहां तक मुख्यमंत्री पद का सवाल है, तो यह सभी काफी अनुभवी हैं। लेकिन फिर भी बालकनाथ का नाम चर्चा में अधिक है और ऐसे में कयास हैं कि भले ही वे सीएम न बनें, लेकिन राजस्थान की बीजेपी सरकार में मंत्री तो अवश्य बनेंगे।


बालकनाथ के चुनाव क्षेत्र अलवर की बात करें तो उसे दिल्ली और हरियाणा से राजस्थान का द्वार माना जाता है और ऑटो उद्योग का एक प्रमुख केंद्र भी है। अलवर एनसीआर का हिस्सा है और इलाके को मेव मुस्लिम और यादव बहुल माना जाता है। महंत बालकनाथ यादव समुदाय से आते हैं। उनसे पहले अलवर से गुरु महंत चांदनाथ लोकसभा सांसद रह चुके हैं। लेकिन कार्यकाल पूरा होने के दो साल पहले उनकी मृत्यु के बाद हुए उपचुनाव में कांग्रेस के जे एस यादव ने जीत हासिल की थी। लेकिन बाद में हुए आम चुनावों में बालकनाथ ने यहां से जीत दर्ज की। बालकनाथ गुरु महंत चांदनाथ के शिष्य हैं और उनकी मृत्यु के बाद अस्थल बोहर स्थित बाबा मस्तनाथ मठ के प्रमुख हैं। यह मठ हरियाणा के रोहतक में कई स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी आदि नियंत्रित करता है।

बालकनाथ के बारे में अलवर के राजघराने से आने वाले नरेंद्र सिंह राठौर कहते हैं कि, “वह कनफटिया साधू हैं, यानी ऐसा साधू जिसके कान छिदे होते हैं और उसमें रिंग पड़ा होता है। न सिर्फ राजस्थान, बल्कि हरियाणा और उत्तर प्रदेश के यादवों में भी कनफटियां साधुओं का बड़ा सम्मान होता है।”

बालकनाथ का जन्म जयपुर-दिल्ली हाईवे स्थित बेररू उपमंडल के कोहराना गांव का बताया जाता है। सरकारी कागजों में उनकी जन्मतिथि 16 अप्रैल 1984 दर्ज है। बताया जाता है कि जब बालकनाथ 6 साल के थे तभी उनके पिता सुभाष यादव और मां उर्मिला देवी ने उन्हें बाबा खेताननाथ द्वारा संचालित नीमराना स्थित आश्रम में भेज दिया था। चूंकि बालकनाथ का जन्म गुरुवार को हुआ था तो उन्हें गुरुमुख नाम दिया गया था।

खेताननाथ के शिष्य बाबा ब्रह्मनाथ ने बालकनाथ को शिक्षा के लिए रोहतक आश्रम भेज दिया था, जहां वह चांदनाथ के शिष्य बन गए। उन्होंने ही बालकनाथ नाम दिया था। अपने शपथ पत्र में बालकनाथ ने खुद को अविवाहित बताया है और 12वीं तक शिक्षा का जिक्र किया है। लेकिन उनकी शिक्षा का कोई प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं है।

बीजेपी ने पहले चांदनाथ और फिर बालकनाथ की लोकप्रियता और यादव समुदाय में प्रभाव को देखते हुए ही उन्हें चुनावी मैदान में उतारा था।


बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने राजस्थान में दो साधुओं को मैदान में उतारकर सबको चौंका दिया था। इनमें से एक थे बाबा चांदनाथ और दूसरे थे स्वामी सुमेधानंद सरस्वति, जोकि हरियाणा के एक आर्यसमाजी थे। इन दोनों को हिंदुत्व के चेहरे के तौर पर उतारा गया था। सुमेधानंद को सीकर से टिकट दिया गया था, लेकिन वहां के जाटों ने इसका विरोध किया था, परंतु उनकी जीत हुई थी।

कहा जाता है कि इन दोनों को राजनीति में लाने वाले बाबा रामदेव है, जिनका एक समय मे बीजेपी में अच्छा रुतबा माना जाता था। रामदेव भी हरियाणा के हैं और उन्होंने हरियाणा से सटे राजस्थान के इलाकों में इन साधुओं को बीजेपी का टिकट दिलवाया था।

सुमेधानंद दोबारा 2019 में जीते थे। उन्होंने पूर्व केंद्रीय मंत्री जीतेंद्र सिंह को हराया था। लेकिन जब बीजेपी ने हाल के विधानसभा चुनावों में कई लोकसभा सांसदों और केंद्रीय मंत्रियों को उतारा तो कई लोगों को आश्चर्य हुआ था। राजस्थान से बालकनाथ के अलावा दिया कुमारी, राज्यवर्धन सिंह राठौर, नरेंद्र कुमार, देवजी पटेल और भगीरथ चौधरी के अलावा राज्यसभा सांसद किरोड़ी लाल मीना को भी चुनाव लड़ने भेजा गया था।

बालकनाथ को अलवर की तिजारा सीट से उतारा गया जहां से उन्होंने भारी मतों से जीत हासिल की है। बताया जाता है कि बालकनाथ तिजारा से चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे क्योंकि इस भेत्र में मेव मुसलमानों की काफी अधिक संख्या है। उनकी पसंद यादव बहुल बेहरोर सीट थी। लेकिन उन्हें तिजारा से ही चुनाव लड़ना पड़ा। बालकनाथ का मुकाबला कांग्रेस के इमरान खान से था, लेकिन बालकनाथ 6000 से अधिक वोटों से जीत गए।

चुनाव के दौरान ही बालकनाथ को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करने की कोशिशें की गई थीं। कहा जा रहा था कि उत्तर प्रदेश की तरह ही राजस्थान को भी एक महंत के हाथों में दिया जाएगा। बता दें कि योगी आदित्यनाथ ने बालकनाथ के लिए प्रचार भी किया था। महंत चांदनाथ की मृत्यु के बाद जब बालकनाथ को मठ प्रमुख बनाया गया था तो उसमें बाबा रामदेव और अन्य के अलावा आदित्यनाथ भी आए थे।

लेकिन योगी आदित्यनाथ को बालकनाथ से कहीं ज्यादा अनुभव है। यूपी का सीएम बनने से पहले आदित्यनाथ पांच बार लोकसभा चुनाव जीत चुके थे। और अब वे उत्तर प्रदेश के सबसे अधिक समय तक पद पर रहने वाले मुख्यमंत्री हैं।

बहरहाल बालकनाथ ने अभी तक खुद को राजस्थान के सीएम के तौर पर पेश नहीं किया है, लेकिन तिजारा ही नहीं  बल्कि राजस्थान के अन्य इलाकों में उन्हें सीएम बनाए जाने की मांग और अटकलें दोनों सामने आ रही हैं।

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