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मंदिर अभी नहीं बनाएंगे: धर्म संसद में संतों के मनमुटाव के बाद वीएचपी का नया नारा

अब तक जितनी भी धर्म संसद का आयोजन हुआ, उसकी अगुआई शंकराचार्य करते थे। पहली बार ऐसा हुआ कि धर्मसंसद में चारों पीठों से एक भी शंकराचार्य शामिल नहीं हुए।

फोटो : सोशल मीडिया

उर्वशी शर्मा

कुंभ में विश्व हिंदू परिषद ने कोशिश तो बहुतेरी की, लेकिन न तो दो दिवसीय धर्म संसद में मंदिर निर्माण का खाका खींच सकी, न ही नरेंद्र मोदी को अगले लोकसभा चुनाव में साधु-संतों के समर्थन का वादा जुटा सकी। ले-देकर हुआ यह कि आर्ट ऑफ लिविंग के सर्वेसर्वा श्री श्री रविशंकर को जिम्मा थमाया गया कि वह मंदिर निर्माण के लिए सर्वानुमति बनाएं। हालांकि यह प्रयास पहले ही विफल हो चुका है। इसीलिए विहिप ने लोकसभा चुनाव तक मंदिर के लिए किसी आंदोलन से परहेज करने की घोषणा की है।

विहिप की कोशिशें कैसे विफल होती गईं, यह समझना भी जरूरी है। असल में, अब तक जितनी भी धर्म संसद का आयोजन हुआ, उसकी अगुआई शंकराचार्य करते थे। पहले स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती यह दायित्व निभाते थे। लेकिन कोर्ट ने उन्हें ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया है। इसलिए उनकी वह हैसियत जाती रही। पहली बार ऐसा हुआ कि धर्मसंसद में चारों पीठों से एक भी शंकराचार्य शामिल नहीं हुए।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कुंभ में आकर पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद को मनाने की कोशिश की, लेकिन वह कामयाब नहीं हो सके।

संत भी बंटे

धर्मसंसद से अखाड़े और धर्माचार्य भी अनुपस्थित रहे। अखाड़ा परिषद के कई पदाधिकारियों के अलावा आचार्य महामंडलेश्वर ने भी धर्म संसद से दूरी बनाए रखी। शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानंद सरस्वती भी नहीं गए। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती तो विहिप की धर्मसंसद में कभी नहीं जाते। जगदगुरु स्वामी हंसदेवाचार्य धर्म संसद में गए जरूर लेकिन बिना कुछ बोले ही चले गए। वहीं, दूसरे दिन धर्मसंसद के मंच पर जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर , अवधेशानंद गिरि जी महाराज के पहुंचने से संतों में भी रोष रहा । वैसे, धर्म संसद में पहुंचने वालों में निर्मोही अखाड़ा के सचिव गौरी शंकरदास, महानिर्वाणी के स्वामी विशोकानंद, निरंजनी के स्वामी वियोगानंद, समेत अखाड़ों से जुड़े कई अन्य संत जरूर पहुंचे।

भड़क गए संत

जो संत किसी तरह पहुंच भी गए थे, उन्हें गुस्सा तब आ गया जब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मंदिर निर्माण की तिथि घोषित नहीं की। संतों ने इसे लेकर हंगामा भी किया। इस दौरान जमकर धक्का -मुक्की हुई और कई संतों-श्रद्धालुओं को धक्का देकर पंडाल से बाहर निकाला गया। करीब 15 मिनट तक चले हंगामे की वजह से अफरा-तफरी मची रही। निर्वाणी अखाड़ा के रामकुमार दास का कहना था कि वह कार सेवक हैं, उन्हें राम मंदिर निर्माण की तारीख बताई जाए। धक्का देकर उन्हें बाहर करने से लोगों में नाराजगी रही।

विरोध करने वालों ने कहा कि वे यहां चुनावी भाषण और मोदी की तारीफ सुनने नहीं आए। वे तो मंदिर निर्माण की तिथि की घोषणा सुनने आए थे लेकिन ऐसा न करके उनके साथ बदसलूकी की गई। धर्म संसद में पहुंचे जगद्गुरु रामानंदचार्य रामभद्राचार्य ने कहा कि मन में प्रसन्न्ता नहीं है, अवसाद लेकर जा रहा हूं। अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनेगा, इस उम्मीद के साथ बीजेपी को दो बार केंद्र की सत्ता में लाने में सहयोग किया। दोनों ही बार विश्वासघात हुआ। सरकार पहले प्रयास करती तो कोई न कोई हल निकल ही आता। वहीं, अखाड़ा

परिषद के महामंत्री और जूना अखाड़े के महंत हरि गिरी ने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण विहिप के वश का नहीं जबकि अखाड़ा परिषद पूरी गंभीरता से इस दिशा में कार्य कर रही है।

तीन कारण प्रमुख रहे

संतों का विश्वास तो टूटा ही, मंदिर मुद्दे की राजनीति भी बिगड़ गई, इसके पीछे तीन कारण प्रमुख हैं। पहली समस्या यह है कि इस वक्त इस मुद्दे पर सड़कों पर आंदोलन किसके खिलाफ हो। केंद्र में हिंदू हृदय सम्राट नरेंद्र मोदी और यूपी में गोरक्षनाथ पीठ के योगी आदित्यनाथ पीठासीन हैं। दूसरी समस्या विपक्ष को लेकर है। 1992 में बाबरी

मस्जिद एक्शन कमेटी के रूप में स्पष्ट मुस्लिम विरोध था। अब परिस्थिति बदली हुई है। न तो बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी-जैसी कोई प्रतिद्वंद्वी संस्था है, न ही मुस्लिम समुदाय की तरफ से कोई तीव्र विरोध। तीसरी समस्या सुप्रीम कोर्ट की वजह से पैदा हुई है। कोर्ट में इस मसले पर रोजाना सुनवाई होती, तो कोर्ट को हिंदू विरोधी ठहरा कर किसी पहल की संभावना हो सकती थी। परंतु कोर्ट ने इस पचड़े पर पड़ने से ही मना कर दिया। ऐसे में, मोदी सरकार के लिए अध्यादेश लाने का रास्ता भी बंद हो गया।

विहिप, बीजेपी और पूरे संघ परिवार को अंदाजा हो गया है कि मंदिर की हांडी इस बार चढ़ाने का कोई फायदा नहीं है, इसलिए इस तरह का स्टैंड लिया गया है। विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने इसी वजह से साफ कर दिया है कि उनका

संगठन अगले चार माह तक राम मंदिर आंदोलन को स्थगित रखेगा क्योंकि लोग इसे चुनाव से जोड़कर देखने लगे हैं और हम नहीं चाहते कि इस मुद्दे का राजनीतिकरण हो। विहिप प्रवक्ता विनोद बंसल ने भी कहा कि ‘देश के प्रति अपने दायित्वों व पूज्य संतों की भावनाओं को देखते हुए आम चुनावों के कारण मात्र आंदोलन स्थगित किया गया है। मंदिर को लेकर हमारा जनजागरण चुनावों के दौरान भी जारी रहेगा।’

वैसे, लोकसभा में यूपी के एक बीजेपी सांसद ने भी नाम न छापने की शर्त पर कहा , ‘हमारी मुश्किल है कि हम हिंदुत्व के एजेंडे से नहीं हट सकते क्योंकि यही हमारा वोट बैंक है। लेकिन हमें वक्त और हालात के हिसाब से अपनी रणनीति बनानी और बदलनी होगी। मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करना हमारी मजबूरी है क्योंकि उनके मुकाबले वोट खींचने का दूसरा ब्रांड हमारे पास नहीं है।’

(उमाकांत लखेड़ा के इनपुट के साथ)

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