महिला आरक्षण बिल: महिलाओं का शक्ति वंदन नहीं, सिर्फ चुनावी लालसा के लिए बीजेपी का जुमला

जिस आसानी और तेजी से विधेयक पारित हुआ, प्रमाण है कि सरकार बीते नौ वर्षों में चाह लेती तो कभी भी ऐसा कर सकती थी। इसके लिए आम चुनाव से बमुश्किल आठ महीने पहले बुलाए गए विशेष सत्र का इंतजार क्यों हुआ?

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शालिनी सहाय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कल्पना का ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ या महिला आरक्षण विधेयक एक ‘ऐतिहासिक छलांग’ है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की यह टिप्पणी लोकसभा में विधेयक दो के मुकाबले 454 वोट से पारित होने के बाद की है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने माना कि यह एक नया और गौरवशाली अध्याय लिखेगा। प्रधानमंत्री मोदी स्वयं इस ऐतिहासिक विधेयक पारित होने पर प्रसन्न दिखे। 

महिला आरक्षण विधेयक पहली बार 2010 में जब राज्यसभा से पारित हुआ, तो बीजेपी खुश नहीं थी। यह लोकसभा में नहीं आ सका, तो एक कारण बीजेपी भी थी, जो तब विपक्ष में थी। यूपीए भी एक गठबंधन था और कई घटक इस पर सहज नहीं थे। और आरजेडी-सपा के कुछ नेताओं का ऐसा रुख बीजेपी को सुकून देने वाला था। 

बीजेपी में तो इसपर ठीकठाक विरोध था। सांसद योगी आदित्यनाथ ने तो इस्तीफे तक की धमकी दे डाली थी और हिंदुस्तान टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, “विधेयक पारित हुआ तो यह भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को डुबो देगा।” यह कहते हुए कि “महिलाओं में मर्दाना गुण विकसित हो गए, वे राक्षस बन गईं तो…”, उन्होंने महिलाओं की मुक्ति के पश्चिमी सोच के प्रति चेतावनी दे डाली थी। 

बीजेपी अपने चुनावी घोषणा पत्र में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण की प्रतिबद्धता जाहिर कर चुकी थी लेकिन पार्टी के उभरते सितारे तेजस्वी सूर्या जून, 2014 में ट्वीट कर रहे थे: “उस दिन से डरो जब महिला आरक्षण वास्तविकता बन जाएगा।” बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय 2010 से 2013 के बीच लगातार ट्वीट करते रहे। एक ट्वीट था: ‘नमो महिलाओं को राष्ट्र निर्माता के रूप में देखते हैं जबकि राहुल गांधी उन्हें आरक्षण देना चाहते हैं!' 

कांग्रेस इस मामले में ज्यादा तर्कसंगत रही। 2017 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और 2018 में अगले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर वह विधेयक पारित कराने के लिए लोकसभा में बीजेपी के पूर्ण बहुमत का उपयोग करने का आग्रह किया था जिसे राजसभा पहले ही पास कर चुकी थी। 

प्रधानमंत्री के नाम पत्र में राहुल गांधी ने लिखा था, “प्रधानमंत्रीजी, कई रैलियों में आप महिलाओं के सशक्तिकरण और सार्वजनिक जीवन में उनकी और ज्यादा भागीदारी के अपने जुनून की बात करते रहे हैं… ऐसे में अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने का इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता है कि महिला आरक्षण विधेयक पारित करने में अपना बिना शर्त समर्थन दें? और इसके लिए संसद के आगामी सत्र से बेहतर भला क्या हो सकता है? कैसे भी विलंब की स्थिति में अगले आम चुनाव से पहले इसे लागू करना असंभव हो जाएगा।”


दोनों पत्रों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। और न ही ‘मुखर’ प्रधानमंत्री ने कभी ‘मन की बात’ या अपने सार्वजनिक कार्यक्रमों में विधेयक का उल्लेख जरूरी समझा।

उनकी चुप्पी, उस विधेयक पास करने के लिए मार्च, 2023 में भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) नेता के कविता की छह घंटे की प्रतीकात्मक भूख हड़ताल और फिर सीपीएम सहित 10 से अधिक विपक्षी दलों के विरोध प्रदर्शन से भी नहीं टूटी, जिसे पहली बार 1996 में एच डी देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार द्वारा पेश किया गया था। हर बार सवाल पर सरकार का रूटीन जवाब होता- इसमें खासी जटिलताएं हैं और हितधारकों के साथ आम सहमति और परामर्श जरूरी है। हालांकि शायद ही कोई जानता हो कि कब, किससे, कहां परामर्श किया गया!

सच यही है कि न तो इस सप्ताह संसद के विशेष सत्र के लिए कामकाज की सूची और न ही संशोधित कार्यसूची में भी महिला आरक्षण विधेयक का उल्लेख था। 18 सितंबर की शाम अचानक केंद्रीय कैबिनेट की बैठक हुई और विधेयक को मंजूरी मिल गई। यह अगले दिन पेश हुआ और 20 सितंबर को लोकसभा से पारित भी हो गया। जिस आसानी और तेजी से विधेयक पारित हुआ, प्रमाण है कि सरकार बीते नौ वर्षों में चाह लेती तो कभी भी ऐसा कर सकती थी। इसके लिए आम चुनाव से बमुश्किल आठ महीने पहले बुलाए गए विशेष सत्र का इंतजार क्यों हुआ?

साफ है कि सरकार तब तक इंतजार करती रही जब तक उसे अहसास नहीं हुआ कि उसकी लोकप्रियता का ग्राफ ढलान पर है। अर्थव्यवस्था संभल नहीं रही, महंगाई-बेरोजगारी पर जनाक्रोश बढ़ रहा है। अगले कुछ महीनों में होने वाले पांच राज्यों के चुनावों में भी बीजेपी खुद को बैकफुट पर पा रही है और अब उसे बताने को एक नई ‘उपलब्धि’ चाहिए। 

दूसरा बड़ा कारण जिसने बीजेपी को इस विधेयक पर आगे बढ़ने को मजबूर किया, वह है वोट देने में महिलाओं की बढ़ती संख्या। आजादी के बाद पहली बार 2019 के आम चुनाव में पुरुषों का कुल वोट प्रतिशत 67 था जबकि महिलाओं की संख्या उससे कुछ ज्यादा, यानी 67.2 फीसदी रही। दरअसल महिलाएं आज राजनीतिक दलों के लिए इतना महत्वपूर्ण हो चुकी हैं कि उन्हें नजरअंदाज करना असंभव है। सरकार की जल्दबाजी के पीछे यह भी बड़ा कारण रहा।

समझना बहुत आसान है कि बीजेपी लोकसभा और विधानसभाओं में महिला आरक्षण के प्रति उदासीन क्यों रही है। इसका समर्थन आधार काफी हद तक उत्तर भारत की उस गाय पट्टी तक सीमित है जहां पितृसत्ता और सामंती प्रथाएं हावी हैं और बाल विवाह, ऑनर किलिंग, दहेज हत्या, घरेलू दुर्व्यवहार और महिलाओं के खिलाफ अपराध के अलावा जातिगत अत्याचार अन्य राज्यों की तुलना में कहीं ज्यादा हैं।


पार्टी ने पंचायतों-स्थानीय निकायों में महिला आरक्षण स्वीकारा भले हो, कुख्यात बृजभूषण शरण सिंह जैसे ‘दबंगों’ की पत्नियों को मैदान में उतारकर वह इसे धता बताने में भी पीछे नहीं रही। जीतने लायक उपयुक्त महिला उम्मीदवारों की तलाश और जिन्हें उनके रूढ़िवादी परिवारों द्वारा चुनाव लड़ने और प्रचार करने की अनुमति भी मिल जाए, अभी भी एक चुनौती है। यह बताता है कि 16 राज्यों में सरकार बनाने वाली बीजेपी के पास मुख्यमंत्री के रूप में एक भी महिला क्यों नहीं है!

अगर आज लोकसभा की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएं, तो पार्टी को उन सभी पर चुनाव लड़ने के लिए 189 महिलाओं को मैदान में उतारना होगा। राज्य विधानसभाओं के लिए जीतने की संभावना वाली महिला उम्मीदवार तलाशनी होंगी। बीजेपी संभवतः अन्य की तुलना में इस परिदृश्य से निपटने में उतना सक्षम नहीं है।

उदाहरण के लिए, अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (एआईटीसी) और बीजू जनता दल अपेक्षाकृत ज्यादा महिलाओं को चुनाव में उतार रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस का तो दावा ही है कि संसद के दोनों सदनों में उसकी 37 प्रतिशत सांसद महिलाएं हैं। कांग्रेस ने भी 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 40 प्रतिशत महिलाओं को उतारा था। इसलिए, सत्तारूढ़ दल के रूप में बीजेपी के लिए असल समस्या यह कि बड़ी संख्या में अपने पुरुष सांसदों और विधायकों को हटाए कैसे?

पितृसत्ता को बढ़ावा देना ‘नए’ बिल के नाम से भी स्पष्ट है जो निश्चित रूप से इसके इतिहास को मिटाने वाला कदम है। कनिमोझी करुणानिधि की बात बहुत तार्किक है कि ‘शक्ति वंदन’ जैसा शब्द महिलाओं को ‘आसन’ या 'पीठ' पर स्थापित करते हुए उन्हें धारा से दूर करता है और व्यवहार के पितृसत्तात्मक मानकों को लागू करता है। बल्कि सच कहें तो गाय पट्टी की उनकी ये पसंदीदा देवियां (चाहे वह सीता, लक्ष्मी, यहां तक कि अंबिका) अपने पुरुषों को हराती नहीं हैं। वे तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा की काली नहीं हैं। 

निश्चित रूप से यह हिन्दी-अनुकूल नाम एक और संकेत है (जैसा कि हाल ही में लागू अन्य संशोधित कानूनों में दिखता है) कि भाजपा किस जमीन पर खेल रही है

यह सारा ऊहापोह बताता है कि बीजेपी ने ऐसा आसान रास्ता क्यों तलाशा कि उसे महिला आरक्षण तुरंत लागू न करना पड़े। यही कारण रहा कि लोकसभा में पेश विधेयक लागू किए जाने से पहले जनगणना और उसके बाद निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन जैसी शर्तें रख दी गईं। 

अतीत गवाह है कि इन कामों को पूरा होने में पांच साल या उससे भी ज्यादा समय लगा है जिससे 2029 में भी इसका कार्यान्वयन संदिग्ध है। कई टिप्पणीकार मानते हैं​ कि 2024 आम चुनाव से पहले यह लागू नहीं हो सकता है जबकि कुछ को तो अब से 16 साल बाद, यानी 2039 तक भी इसके अमल पर संदेह है। 


महिला आरक्षण के लिए जनगणना भी जरूरी नहीं है क्योंकि महिलाएं कुल आबादी की लगभग आधी हैं और जो आरक्षण दिया जा रहा है, वह महज 33 प्रतिशत है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सीट आरक्षण के विपरीत, महिला आरक्षण न तो जनसंख्या के अनुरूप है; न ही आनुपातिक है। 

बचाव में गृह मंत्री और बीजेपी के अन्य वक्ताओं के तर्क काबिले गौर हैं। अमित शाह ने तंज से पूछा कि अगर राहुल गांधी का लोकसभा क्षेत्र वायनाड महिलाओं के लिए आरक्षित हो गया तो क्या होगा? उन्होंने सत्ता पक्ष से मेजों की थपथपाहट के बीच कहा, “इसलिए परिसीमन होने का इंतजार करो।” हालांकि वह यह समझाने में असफल रहे कि जब पिछले दो दशकों या उससे अधिक समय से बिना परिसीमन नियमित रूप से चुनाव होते रहे हैं, तो ऐसी शर्त या चेतावनी का क्या मतलब, और महिलाओं को इंतजार क्यों कराया जाए?

वैसे, बीजेपी और प्रधानमंत्री पर ऐसी आलोचनाओं का कोई असर नहीं होता और न ही पाखंड या अवसरवाद जैसे आरोप उन्हें विचलित करते हैं। वे आश्वस्त हैं कि उनके लोग विधेयक को मील का पत्थर के रूप में प्रचारित कर पाएंगे जो बीजेपी के एकमात्र नेता द्वारा संभव बनाया गया है। 

और एक तरह से बीजेपी शायद आश्वस्त है कि 2024 जीतने के लिए यही काफी होगा!

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