श्रमिक असंतोष पहुंचा मोदी-शाह के गुजरात तक, सूरत में भारी संख्या में मजदूरों का पलायन
सूरत में मजदूरों का बढ़ता असंतोष, भारी संख्या में पलायन और गांव चलो अभियान ने मोदी-शाह के विकास के गुजरात मॉडल पर सवालिया निशान लगा दिया है।

गुजरात के टेक्सटाइल और हीरा कारोबार के गढ़ सूरत में, वेतन बढ़ोत्तरी और साप्ताहिक छुट्टियों की मांग कर रहे श्रमिकों पर गुजरात पुलिस की सख्ती ने भारत के इस सबसे बड़े टेक्सटाइल केंद्रों में से एक में श्रमिकों का असंतोष और भड़क उठा है। इसके चलते, दिवाली और छठ पूजा से ठीक पहले सूरत से प्रवासी श्रमिकों का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो गया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछले सप्ताह एम्ब्रायडरी इकाइयों में काम करने वाले मजदूरों को अपनी मांगों के लिए सूरत कलेक्टर के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन करने पर हिरासत में ले लिया गया। पुलिस का हालांकि कहना है कि इन मजदूरों ने विरोध प्रदर्शन की पहले से कोई इजाजत नहीं ली थी।
न्यू इंडियन एक्सप्रेस उन अखबारों में से एक है जिन्होंने सबसे पहले इस हिरासत की खबर दी थी। साथ ही वीडियो शेयर किए थे जिसमें पुलिस वाले बेरहमी से मजदूरों पर लाठीचार्ज करते हुए उन्हें हिरासत में ले रहे हैं।
पुलिसिया कार्रवाई के बाद मजदूरों का आक्रोश और बढ़ गया है जिसने पहले से बड़ी संख्या में अपने-अपने राज्य पलायन कर रहे मजदूरों की संख्या को और बढ़ा दिया है।
लगातार बढ़ते पलायन से कपड़ा उद्योग चलाने वाले कारोबारियों की चिंता बढ़ गई है क्योंकि इससे त्योहारी सीजन में मजदूरों की कमी से उन्हें मांग पूरी करने मे दिक्कतें आना स्वाभाविक है। ध्यान रहे कि त्योहारों के मौके पर मांग में काफी तेजी आती है। इस बीच बीबीसी हिंदी की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि करीब 10 लाख मजदूर सूरत से पलायन कर चुके हैं।
मजदूरों के इस असंतोष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य में प्रवासी मजदूरों के काम करने के हालात को उजागर कर दिया है। साथ ही इससे औद्योगिक विकास के 'गुजरात मॉडल' पर भी सवालिया निशान लग गया है।
गौरतलब है कि अपने कपड़ा उद्योग की वजह से सूरत को 'भारत का मैनचेस्टर' भी कहा जाता है। यहां का अधिकांश कारोबार काफी हद तक बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और अन्य राज्यों से आए प्रवासी मजदूरों पर निर्भर है।
मजदूरों की आम शिकायतें में मुख्य रूप से 12 घंटे की शिफ्ट, साप्ताहिक छुट्टियों से इनकार, वेतन में कटौती और छुट्टी मांगने पर काम से निकाले जाने से जुड़ी हैं। इन मांगों के लिए इस साल 15 अगस्त से शुरू हुए ये विरोध-प्रदर्शन नवरात्रि के आखिरी हफ्ते में और तेज हो गए हैं, जबकि इसी बीच ‘गांव चलो अभियान’ ने भी जोर पकड़ लिया है। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, कपड़ा उद्योग के मालिकों ने साप्ताहिक छुट्टी की मांग करने वाले 250 से 300 मजदूरों को काम से निकाल दिया, जिससे मजदूरों के पलायन में तेजी आई है।
खबरों के अनुसार, दिवाली और छठ पूजा से पहले काफी मजदूर अपने घर लौट रहे हैं। आरोप है कि उनके मालिक या तो छुट्टी देने से मना कर रहे हैं, या फिर छुट्टी लेने पर वेतन काटने की धमकी दे रहे हैं। अपने गृहनगर लौट रहे अजय नाम के एक युवा मजदूर ने 'दैनिक भास्कर' को बताया कि उसके मालिक ने उसे छुट्टी नहीं दी और साफ कह दिया कि अगर वह छुट्टी लेता है, तो उसका वेतन काट लिया जाएगा।
मजदूरों के लिए यह विवाद सिर्फ छुट्टी न मिलने तक सीमित नहीं है। उन्होंने शिकायत की है कि उनसे बहुत लंबे समय तक काम कराया जाता है, उनका वेतन रोक लिया जाता है और पूरे महीने लगातार काम करने का दबाव डाला जाता है। इस वजह से वे भारी आर्थिक और मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं।
मजदूर संघ (लेबर यूनियन) गांवों को लौट रहे श्रमिकों की मदद के लिए आगे आए हैं। उन्होंने फैक्ट्री मालिकों पर श्रमिकों को परेशान करने और बदले की भावना से उन्हें नौकरी से निकालने का आरोप लगाया है। 'भास्कर' के अनुसार, मजदूर संघ के प्रतिनिधि अजय डी. दुबे ने बताया कि 'गांव चलो' अभियान के तहत बड़ी संख्या में मजदूर अपने गांवों की ओर लौट रहे हैं। दुबे ने आरोप लगाया कि जब से यह अभियान शुरू हुआ है, तब से मालिक श्रमिकों को परेशान कर रहे हैं और उन्हें नौकरी से निकाल रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यूनियन के पास ऐसे कई वीडियो हैं, जिनमें इस तरह की घटनाएं दर्ज हैं।
इस बीच, केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह ने 9 अक्टूबर को सूरत का दौरा किया और श्रमिकों तथा नियोक्ताओं से आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की अपील की। उन्होंने कहा, "नियोक्ता और श्रमिक एक ही सिक्के के दो पहलू हैं," और दोनों पक्षों से आग्रह किया कि वे अपने मतभेदों को "एक परिवार की तरह" सुलझा लें। हालाँकि, उनकी इस अपील का असंतोष को कम करने पर कोई असर नहीं पड़ा।
सूरत से श्रमिकों का बड़े पैमाने पर पलायन, कढ़ाई (एम्ब्रॉयडरी) कामगारों के बीच बढ़ती नाराजगी को उजागर करता है। त्योहारों के सीजन के अपने चरम पर पहुंचने के बीच, इसका उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर व्यापक असर पड़ सकता है।
कांग्रेस ने इस बढ़ते असंतोष के मुद्देनजर बीजेपी के 'गुजरात मॉडल' पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद सैयद नसीर हुसैन ने कहा है, "यही बीजेपी का गुजरात मॉडल है: मजदूरों का शोषण करना, असहमति को कुचलना और अर्थव्यवस्था को चलाने वालों की कीमत पर अमीरों को बचाना।"
गुजरात के हालात पर नजर रखने वालों के अनुसार, यह संकट एक तरफ तो सूरत की उस क्षमता पर सवाल खड़े करता है जिसके दम पर वह टेक्सटाइल (कपड़ा उद्योग) का बड़ा केंद्र बना हुआ है - खासकर तब, जब मजदूरों की उचित वेतन और छुट्टी जैसी बुनियादी मांगें पूरी नहीं हो रही हैं। दूसरी तरफ, यह मोदी द्वारा प्रचारित 'गुजरात मॉडल' की असलियत भी सामने लाता है, जो व्यक्तिगत विकास पर तो जोर देता है, लेकिन मजदूरों की चिंताओं और उनके कल्याण को पूरी तरह अनदेखा कर देता है।
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