वार्षिक लेखा-जोखाः राजनीतिक इच्छाशक्ति की दुनिया में कमी, 2026 होने वाला है और भी ज्यादा अस्थिर
दुनिया में गृह युद्ध गहरे हो गए हैं। इलाकाई युद्ध फैल गए हैं। कमजोर और मध्यम आय वाले देशों में राजनीतिक हिंसा की पकड़ मजबूत हो गई है। दक्षिणपंथी राजनीति के उदय के साथ मानवीय सहायता फंडिंग में तेज गिरावट आई है।

वर्ष 2025 को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की मौत के साल के तौर पर याद रखा जाएगा। युद्ध कई गुना तेज हो गए। लोगों का पलायन ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया। मानवीय एजेंसियों को बढ़ती जरूरतों और घटते संसाधनों के विरोधाभास का सामना करना पड़ा। बहुपक्षीय संस्थाएं कमजोर हुईं और सैन्य खर्च ने सामाजिक सुरक्षा को पीछे छोड़ दिया। अब जब 2025 खत्म हो गया है, वैश्विक समुदाय इस असहज सच्चाई को सामने खड़ा पा रहा है कि 2026 और भी ज्यादा अस्थिर होने वाला है।
संघर्षों पर नजर रखने वाले संगठनों ने शीत युद्ध खत्म होने के बाद से संगठित हिंसा में सबसे तेज बढ़ोतरी दर्ज की है। गृह युद्ध गहरे हो गए हैं। इलाकाई युद्ध फैल गए हैं। कमजोर और मध्यम आय वाले देशों में राजनीतिक हिंसा की पकड़ मजबूत हो गई है। इस बीच, दक्षिणपंथी राजनीति के उदय के साथ मानवीय सहायता फंडिंग में तेज गिरावट आई है। घरेलू राजनीतिक दबाव, दानदाताओं की उदासीनता और रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता ने बहुपक्षीय प्रतिबद्धताओं को कमजोर कर दिया है। इस पृष्ठभूमि में 2026 में दुनिया को क्या कुछ झेलना पड़ सकता है, इसपर नजर डालना चाहिए। निश्चित ही, यहां पेश संघर्ष व्यापक नहीं और ऐसे तमाम अन्य टकराव भी होंगे, लेकिन ये मोटे तौर पर यह अंदाजा लगाने के लिहाज से काफी है कि आने वाला समय कैसा रह सकता है।
सूडान में शुरू हुआ प्रतिद्वंद्वी सैन्य गुटों के बीच सत्ता संघर्ष दुनिया की सबसे गंभीर मानवीय आपदाओं में से एक बन गया है। बाहरी ताकतों ने इसे और भी बदतर बना दिया है, जिन्होंने युद्धरत पक्षों को हथियार, पैसे और राजनीतिक सुरक्षा दी। इस तरह सूडान प्रॉक्सी युद्ध का मैदान बन गया है।
मध्यस्थता के प्रयास बिखरे हुए और प्रतिस्पर्धा में हुए हैं। प्रतिबंध चुनिंदा रहे हैं और मानवीय सहायता को भू-राजनीतिक हितों के हवाले कर दिया गया है। इसका नतीजा हैः बड़े पैमाने पर हत्याएं, जातीय सफाए, यौन हिंसा, बढ़ता अकाल और लाखों लोगों का पलायन। प्रतिस्पर्धी अंतरराष्ट्रीय ताकतों ने बातचीत की गुंजाइश को कम किया है, युद्ध को लंबा खींचा है और राजनीतिक समाधान की संभावना को और भी दूर धकेल दिया है।
गाजा और पश्चिमी तट में बमबारी और हवाई हमले बेशक रुक गए हों, लेकिन बुलडोजर अब भी चल रहे हैं और हिंसा बढ़ गई है। इजरायल संघर्षविराम का बेखौफ उल्लंघन कर रहा है, गाजा के बड़े हिस्सों पर अपना नियंत्रण बना रखा है और फिलिस्तीनियों और मदद की आवाजाही को सख्ती से नियंत्रित कर रहा है। ज्यादातर इलाका मलबे में बदल गया है, शासन व्यवस्था चरमरा गई है और खाने की कमी हर जगह है।
अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के उल्लंघन को सामान्य मान लिया गया है और लोगों की तकलीफ को सैन्य रणनीति की एक स्वीकार्य कीमत माना जा रहा है। साथ ही, ट्रंप प्रशासन अंतरराष्ट्रीय सेना के लिए एक भरोसेमंद और राजनीतिक रूप से संभव सहमति बनाने में विफल रहा है, जिससे सैनिकों की भूमिका में रुकावट आ रही है और गाजा बिना किसी सार्थक नागरिक सुरक्षा के रह गया है। संघर्षविराम के उल्लंघन, बसने वालों के विस्तार और कूटनीतिक गतिरोध को खत्म किए बिना, गाजा को जान-बूझकर तबाही में बदला जा रहा है।
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (डीआरसी) में स्थानीय सशस्त्र समूह, क्षेत्रीय ताकतों और प्रॉक्सी सेनाओं के बीच लगातार चल रहे संघर्ष ने आम लोगों को खतरनाक दर से विस्थापित किया है। यह सबसे लंबे समय तक चलने वाले और सबसे घातक संघर्षों में से एक है और 1996 से अब तक 60 लाख से ज्यादा लोगों की जान ले चुका है। लाखों लोग विस्थापित हुए हैं जिससे भूख, बीमारी और मानवाधिकारों के उल्लंघन की वजह से मानवीय आपात स्थिति पैदा हो गई है। पूर्वी डीआरसी की विशाल खनिज संपदा- कोबाल्ट, तांबा, सोना- हिंसा को बढ़ावा देती है, क्योंकि सशस्त्र समूह और विदेशी ताकतें अवैध खनन और तस्करी से मुनाफा कमाते हैं, जिससे एक ‘संघर्ष अर्थव्यवस्था’ आकार लेती है जो लड़ाई को जारी रखती है।
वेनेजुएला अपने आर्थिक संकट और राजनीतिक गतिरोध के साथ 2026 में प्रवेश करेगा। इसके साथ ही उस पर ट्रंप प्रशासन का बाहरी दबाव भी होगा, जो सत्ता परिवर्तन करवाने के लिए हालात को भड़का रहा है। वेनेजुएला के लाखों लोग लैटिन अमेरिका में पलायन कर गए हैं, बुनियादी सेवाएं खस्ताहाल हैं और मानवीय संकट गंभीर। जबरदस्ती सत्ता परिवर्तन से यह इलाका और भी अस्थिर हो सकता है, विस्थापन की एक बड़ी लहर शुरू हो सकती है और पहले से ही नाजुक इस गोलार्ध में संकट गहरा सकता है।
पाकिस्तान राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक कमजोरी और जलवायु संकट से जूझ रहा है। उसके सीमाई इलाकों में सशस्त्र हमले तेज हो गए हैं, और सीमा पार आतंकवाद और विद्रोही समूहों को पनाह देने के आपसी आरोपों के बीच अफगानिस्तान के साथ उसके रिश्ते खराब हो गए हैं। भारत के साथ तनाव तो है ही। पहलगाम की हालिया उकसावे वाली घटना और उसके बाद चार दिन के युद्ध के अलावा, दोनों के आपसी विवाद अनसुलझे हैं और बातचीत के लिए बनी व्यवस्थाओं के टूटने से हालात खराब ही हैं। पाकिस्तान में सैन्य प्रतिष्ठान के लिए ये बाहरी टकराव देश की शासन की नाकामियों और सामाजिक ध्रुवीकरण से ध्यान भटकाने का आसान तरीका हो सकते हैं, लेकिन लोगों के लिहाज से हालात गंभीर हैं- न सिर्फ घरेलू अस्थिरता बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में तनाव बढ़ने की भी आशंका है।
लाल सागर और आस-पास के समुद्री मार्ग एक और सुलगता क्षेत्र हैं। समुद्री मार्गों का सैन्यीकरण, जहाजों पर हमले और प्रॉक्सी टकराव ने दुनिया के सबसे जरूरी व्यापार मार्गों में से एक को संघर्ष क्षेत्र में बदल दिया है। यहां की अशांति का दुनिया भर में खाने की कीमतों, ऊर्जा बाजार और सप्लाई चेन पर असर पड़ता है। खतरा यह है कि एक गलत अनुमान यहां के किसी भी सीमित संघर्ष को ऐसे बड़े टकराव में बदल सकता है जिसमें वैश्विक ताकतें कूद पड़ें।
वैश्विक विस्थापन अपने आप में एक संकट है। आज जबरन विस्थापितों की संख्या दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे ज्यादा है और लगातार बढ़ रही है। संघर्ष, दमन और जलवायु आपदाएं लाखों लोगों को सीमाओं के पार धकेल रही हैं, जबकि शरण प्रणाली सख्त हो रही है और राजनीतिक नैरेटिव कहीं आक्रामक होते जा रहे हैं। शरणार्थियों को अब पीड़ितों के रूप में नहीं, बल्कि खतरों के रूप में देखा जाता है। 2026 में विस्थापन राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ा सकता है, जेनोफोबिया को बढ़ावा दे सकता है और मेजबान समाजों पर दबाव डाल सकता है।
चरम मौसमी घटनाएं अब असामान्य नहीं। सूखा, बाढ़ और तूफान नियमित रूप से उन देशों को तबाह कर रहे हैं जो पहले से ही संघर्ष या खराब शासन से कमजोर हो चुके हैं। जलवायु परिवर्तन खतरा बढ़ाने वाले एक कारक के रूप में काम करता है, जिससे खाद्य असुरक्षा बढ़ती है, पलायन होता है और राजनीतिक अशांति और बिगड़ती है। फिर भी, जलवायु अनुकूलन के लिए पैसे नाकाफी हैं और इसकी उपलब्धता असमान। अंदाजा है कि 2026 में जलवायु घटनाओं से और अधिक मानवीय आपात हालात पैदा होंगे।
मानवीय सहायता के लिए मिलने वाला पैसा घट रहा है। संयुक्त राष्ट्र 2026 में अपनी वैश्विक मदद को घटाकर करीब 23 अरब डॉलर कर देगा, जो रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची जरूरतों को पूरा करने के लिहाज से आधा है। यह कमी दान देने वालों की घटती प्रतिबद्धता को दिखाती है, जिसमें बड़े दान देने वाले देश घरेलू राजनीतिक दबाव और बढ़ते सैन्य बजट के कारण समर्थन घटा रहे हैं।
चूंकि सहायता एजेंसियां सभी संघर्षग्रस्त इलाकों से पीछे हट रही हैं, लाखों लोग जो भूख, विस्थापन और संघर्ष का सामना कर रहे हैं, उन्हें कोई मदद नहीं मिलेगी। अपने मानवीय सहायता कर्मचारियों को निशाना बनाए जाने और पहुंच कम होने के कारण, संयुक्त राष्ट्र अब मानने लगा है कि उस पर बहुत ज्यादा बोझ है, उसके पास पैसे की कमी है और उसे सबसे ज्यादा जरूरत के समय जीवन बचाने वाले मिशन छोड़ने पड़ रहे हैं।
सबसे बड़ा संकट बहुपक्षवाद का टूटना है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं वीटो राजनीति और राष्ट्रवादी एजेंडे की वजह से तेजी से पंगु हो रही हैं। नियमों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है और कूटनीति लाचार दिख रही है।
ऊपर बताए गए संकट एक-दूसरे को बढ़ावा देते हैं। संघर्ष से पलायन होता है; पलायन से राजनीतिक प्रतिक्रिया होती है। जलवायु परिवर्तन से असुरक्षा बढ़ती है। मदद में कटौती से इंसानी तकलीफ बढ़ती है। भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता सामूहिक प्रतिक्रियाओं को रोकती है। इतना तय है कि 2026 में दुनियाभर में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी दिख रही है।
(अशोक स्वैन स्वीडन की उप्सला यूनिवर्सिटी में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर हैं)
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