2020 में शुरु तो हुआ है नया दशक, लेकिन मोदी दौर में आगे के बजाए पीछे जा रहा है देश

2020 में प्रवेश के साथ पीछे देखने पर हम पाते हैं कि आगे बढ़ने का आभास भले हो, लेकिन हम पीछे जा रहे हैं। भारतीय संविधान के आधारभूत अवयवों को क्रमबद्ध हाशिये पर डालते हम जिस राह पर हैं, उसमें आगे के मुकाम का खाका खींचते ऐसा लग रहा है कि यात्रा प्रतिगामी है।

फोटोः सोशल मीडिया
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मृणाल पाण्डे

पिछली सदी के पचास के दशक में राजकपूर की फिल्म ‘बूट पॉलिश’ का एक गाना बड़ा मशहूर हुआ था, ‘नन्हे-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है?’ वह नेहरू युग का आशावादी जमाना था, जब नया-नया गणतंत्र भारत उजले भविष्य के सपने देख रहा था। गाने में आगे जवाब मिलता था, ‘मुट्ठी में है तकदीर हमारी, हमने किस्मत को बस में किया है।’ साठ सालों के बाद नवजात देश का वह उछाह, वह भरोसा काफी हद तक मिट गया है। फिर भी 2020 के भीतर कदम रखते हुए वह गाना किसलिए अचानक याद आया?

शायद इसलिए कि जब हम भविष्य का अनुमान लगाते हैं तो विगत, वर्तमान और भविष्य, सबकी जड़ें आपस में गुंथी पाते हैं और भविष्य में झांकते हुए हम बीते कल को ही अपनी भरोसेमंद सीढ़ी बनाते हैं। शायद इसीलिए नए मीडिया के दादा साहिब फाल्के मार्शल मैकलुहान ने कहा था कि अपने आज को हम बीते हुए कल के रियर-व्यू शीशे में झांकते हुए ही समझ सकते हैं और भविष्य में हमेशा उल्टे पैरों चलते हुए ही घुसते हैं (वी लुक टु द प्रेज़ेंट थ्रू ए रियर व्यू मिरर, वी मार्च बैकवार्ड्स इन टु द फ्यूचर)।

रिवर्स गियर में 2020 की जो शक्ल बनती है, वह हमको 2019 में नई तकनीकी की असाधारण तरक्की और उससे जुड़ती जा रही सारी दुनिया की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शक्ल में आ चुके बदलावों को साफ-साफ दिखाती है। 2020 की दुनिया बड़ी हद तक जानकारी सूचना और ज्ञान के वितरण के आधार पर बन रही है। जानकारों की राय में दुनिया के तमाम देश इस बरस अधिक अंतर्मुखी, अधिक निजी हित-स्वार्थों से प्रेरित होने जा रहे हैं। अमेरिका तो अपनी विशाल जगत विख्यात दीवार लातिन अमेरिकी शरणार्थियों की पैठ रोकने के लिए खड़ी कर ही चुका है, यूरोपीय महासंघ (ईयू) में भी इंगलैंड ने ब्रेक्सिट से अपना चूल्हा अलग करने का ऐलान कर डाला है। इससे सदी के पहले दशक तक ग्लोबलाइज़ेशन की जो धारा बह रही थी, वह अब सिरे से पलटकर लगभग हर देश को अपनी भौगोलिक सीमाएं गैरफायदेमंद आयात-निर्यात और शरणार्थियों के लिए बंद करने की दिशा में ले जा सकती है।

भारत में भी सत्ता ने इसी मूड में अचानक ‘हम- हमारे-हमारे जैसे छोड़कर बाकी सब बाहरिये’ का दर्शन अपनाया। और फिर अपने ही धर्मनिरपेक्ष और समतावादी 1949 के संविधान की धाराओं के खिलाफ संसद में अपने बाहुबल से धार्मिक आधार पर शरणार्थियों की पहचान करने का विवादास्पद कानून पारित करवा लिया जो फिलहाल उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है। साल भर आबादी के एक बड़े हिस्से को कभी दीमक तो कभी आतंकी घुसपैठियों से भरा बताकर नई आबादी गणना तालिकाएं बनवाने की उत्सुकता को तरजीह दी जाती रही। इससे पाकिस्तान, अफगानिस्तान ही नहीं, अब तक सहज रहे बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों से भी उसके रिश्तों पर गहरा असर पड़ेगा और इसी वजह से घरेलू स्तर पर भी नागरिकों के बीच कड़वाहट बढ़ी है।

वर्तमान सरकार के मई, 2019 में दोबारा सत्ता संभालने के बाद सघन जानकारी के नाम पर नई डिजिटल तकनीकों से नागरिकों के जीवन में बढ़ती सरकारी दखलंदाजी और ताकझांक लगातार बढ़ी है जबकि न तो मंहगाई कम हुई न ही सड़कों पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा। इससे हर जाति धर्म के नाराज लोग कड़ाके की ठंड के बावजूद सड़कों पर उतर आए हैं और उत्तर प्रदेश तथा कर्नाटक सरीखे राज्यों में पुलिसिया दमनकारिता खतरनाक हद तक बढ़ने की खबरें लगातार आ रही हैं। यह तय है कि इन सबका गहरा असर 2020 की राजनीति ही नहीं, समाज और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।

इन जानकारियों के उजास में पूरी संभावना है कि 2020 में हम भारत ही नहीं, दुनिया में भी देशों के बीच नए सौमनस्य की बजाय वीजा नियमों में सख्ती, नौकरियों में नस्ली आधार पर भेदभाव और शरणार्थियों को लेकर बढ़ती असहिष्णुता और उसके खिलाफ प्रदर्शनों की बढ़ोतरी देखेंगे। दुनिया की दो बड़ी आर्थिक महाशक्तियां: चीन और अमेरिका जो कुछ दशकों से सघन व्यापारिक रिश्ते बनाती रही थीं, आज एक-दूसरे पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाकर पंजा लड़ाई कर रही हैं। दोनों के नेता जिद्दी एक छत्रताधारी नायक हैं इसलिए कोई पीछे हटता नहीं दीख रहा। यह टकराव दुनिया के तमाम देशों में पुराने साझा बाजारों की बजाय नई तरह की व्यापारिक खेमेबंदियां, दोस्तियां और दुश्मनियां बना-बिगाड़ रहा है। बहुत संभव है कि जब महाशक्तियां बिल्लियों की तरह रोटी के टुकड़े पर झगड़ रही हों तो उसका लाभ छोटी, लेकिन ज्ञान और नई सूचना-संचार तकनीकी सेलैस वियतनाम, आयरलैंड, फिनलैंड और पोलैंड सरीखे देश ले उड़ें।

दुनिया का इतिहास अक्सर कुछ गुप्त चक्रों से संचालित होता रहा है। उदाहरण के लिए अमेरिका पिछली सदी में साठ के दशक तक महाबली नजर आता था, फिर पहले जापान और उसके बाद यूरोपीय महासंघ ने काफी हद तक उसका कद घटा दिया। फिर चीन का महाकार इतिहास की स्लेट पर उभरा और उसने 2010 तक जापान यूरोप को पीछे छोड़ दिया। अब जापान तेजी से बुढ़ाती जनसंख्या का शिकार है और यूरोप का शीराजा भी बिखरने लगा है। पिछले बरस इन सबसे ट्रंप सरीखे पूंजीवाद तथा हथियार निर्माण को शिवलिंग की तरह पूजने वाले नेता के फैसलों से अमेरिका को दुनिया की समृद्धि अपनी तरफ खींचने में मदद तो मिली, लेकिन घरेलू स्तर पर इसने वहां गहरी आर्थिक विषमता और नक्सलवाद को भी पोसा है। 2020 में उसके क्या नतीजे सामने आएंगे, देखना दिलचस्प रहेगा।

2019 में बड़े डाटा का आर्थिक राजनैतिक और चुनावी महत्व और उसकी संचयन प्रणालियां भारत में बहुत महत्वपूर्ण हुईं। होनी ही थीं, क्योंकि आज राज, समाज और बाजार तीनों की बाबत सही जानकारी पाने का आधार डिजिटल तालिकाओं में निबद्ध डाटा ही है। सो भारत सरीखे विशाल देश के कीमती जनगणनात्मक सघन डाटा की खुदाई और उसे सबसे बड़ी बोली लगाने वालों को बेचा जाना तमाम कानूनों को धता बताकर किस तरह होगा यह भी राज, समाज और बाजार तीनों जगह महत्वपूर्ण मोड़ लाएगा।

गौरतलब है कि 4जी तकनीकी से मोबाइल हर तरह की जानकारी का स्रोत बनते गए हैं और भारत में शहर, गांव हर जगह इस तकनीकी की पैठ बन चुकी है। पर जितनी सहजता से यह उपकरण खबरों और ज्ञान का स्रोत हैं, उतनी ही आसानी से वे अर्धसत्य भरी सूचनाओं, छवियों और फर्जी खबरों का भी स्रोत बन जाते हैं। पर अंतत: दर्द जब हद से गुजर जाता है तो दवा बनता है। इसी सचाई के तहत मीडिया में जिस तरह 2019 तक क्राउड फंडिंग यानी खबर के ग्राहकों से सीधे पैसा लेकर सरकारी या कार्पोरेट मदद के बिना विशुद्ध खबरें देने की शुरुआत हुई है और जैसी तादाद में उसके ग्राहक जुटते गए हैं, उससे उम्मीद बंधती है कि मुख्यधारा मीडिया ने सरकारी और कार्पोरेट फंडिंग की मदद से उन्हीं हित स्वार्थों का एजेंडा बढ़ाते हुए सत्य की लगातार अनदेखी की और उसे कुचला है, वह खेला अब बहुत देर जारी नहीं रहेगा।

ज्ञान और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में नई सूचना संचार तकनीकी और डाटा विश्लेषण के कई सुपरिणाम हमको 2020 में देखने को मिल सकते हैं। सबसे अधिक उम्मीद डीप लर्निंग या सघन सिखवन के क्षेत्र से है, जहां डिजिटल नेटवर्क की मशीनों को सीधे मानवीय स्नायु तंत्र से जोड़कर विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं द्वारा नाजुक और कठिन किस्म की जानकारी, गणना और नतीजे निकाल पाने का काम जो बरसों लेता था, अब चुटकी बजाते किया जाने लगेगा। लेकिन यहां हम फिर अपने विगत की एक कड़वी सचाई सेट कराएंगे। वितरण की असमानता। जिसके पास संसाधन हैं और जिनके पास नहीं, उनके बीच की खाई 2019 में इस हद तक बढ़ी है कि आज हमारे देश के 10 फीसदी लोग 90 फीसदी अर्थव्यवस्था पर काबिज हैं।

मानव स्वभाव और सरकारों द्वारा पोसी गई स्वार्थपरकता के मद्देनजर अचरज नहीं कि इससे घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों जगहों में उच्चतम ज्ञान के मुट्ठी भर मालिकों (हैव्स) और बहुसंख्यक वंचितों (हैव नॉट्स) के बीच अहंकारी मालिक और पर निर्भर दासों के रिश्ते नई तरह के उपनिवेशवाद को पैदा करें जहां दुनिया भर के मुट्ठी भर हैव्स आपसी रिश्तेदारियों का सुरक्षा कवच पहनकर शेष विश्व में अपना एकछत्र साम्राज्य बना लें। कुछ लोग कह सकते हैं कि भौगोलिक संप्रभुता और संसाधनों पर अधिकार भी तो कोई चीज़ है। ऐसे कैसे कोई बाहरिया ठगवा उसे लूट लेगा भाई?

हमारे यहां तो भारी तादाद में बाहरी पूंजी न उमड़ी तो हमारी नाक काट लेना। पर हम इन नक्कुओं को याद दिला दें कि दुनिया में समृद्धि के लिए सस्ता जैविक तेल, साफ पर्यावरण और पेयजल अनिवार्य हैं जो कि भारत में तेजी से खत्म हो रहे हैं। मशीनी ज्ञान बढ़ रहा है पर हर सेक्टर में वह नौकरियां भी लील रहा है जबकि पढ़े-लिखे लेकिन बेरोजगार युवाओं की तादाद विस्फोटक बन चुकी है। पर्यावरण आमूलचूल ऐसा बदल चुका है कि कल तक सर्वज्ञता का दावा करने वाले मौसम विज्ञानी भी आज हमको मुहल्ला स्तर के लालपोथी वाले ज्योतिषियों से बेहतर नजर नहीं आते।

राजधानी तक में पिछले साल बार-बार अलर्ट घोषित कर सरकारी दफ्तर-स्कूल बंद करने पड़े हैं। ऐसे में नागरिक रजिस्टर या जनगणना को गोली मारिए, सीधे लोगों के जीवन-मरण के मसलों पर भी हमारे यहां के महानायक क्या कोई सार्थक काम कर-करा रहे हैं? याद रखें गणतंत्रों का इतिहास दुनिया में बमुश्किल ढाई सौ बरस का है और भारत में तो सिर्फ सत्तर बरस का। 2019 में हमारे यहां डिजिटल एप्स से क्लाउड कंप्यूटिंग से धंधा करने वाले ऊबर या जमाटो, स्विगी या अमेजन जैसे सफल नए व्यवसाय पिछले बरस वे रहे जिनके पास अपने कोई संसाधन नहीं। ऊबर बिन कार के सबसे बड़ी कैब कंपनी बना, एयर बीएनबी सबसे बड़ा होटेल कमरा दाता बन गया जिसका अपना कोई होटल नहीं। शेष व्यवसाय भी संसाधनों में नहीं, डाटा और कनेक्टिविटी के बूते कुशलता से चलाए गए।

सो दुनिया 2019 से ही बदल चली थी और 2020 में वह बहुत संभव है नई-नई उलटबांसियों को पैदा करे और राजनीति, अर्थनीति तथा सामाजिकता के बहुत सारे पुराने कचरा को नए झाड़ू मारकर दूर फेंक दे। अगर 2010 का दशक इकॉनोमी में बड़े कार्पोरेट्स का, राजनीति में पाशवी बहुमत का और समाज में सम्मिलित कुटुंबों की सफलता का दशक था तो यकीन मानिए, 2019 के ट्रेंड देखते हुए भारत में 2020 छोटे सफल व्यवसायों, छोटी-छोटी आशाओं और कम उम्र संसाधनहीन पर तकनीकी ज्ञान से लैस युवाओं के हंसमुख उदय की शुरुआत का साल बन कर उभरेगा। बाकी भूलचूक लेनी देनी।

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