ताकतवर अमेरिका और ट्रंप को करारा झटका
ट्रंप, जो तेहरान के साथ ऐसा समझौता करने की महत्वाकांक्षा रखते थे जिसका श्रेय उन्हें मिल सके, ने चल रही बातचीत को धोखा दिया। खबरों की मानें तो ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि ईरान के सर्वोच्च नेता की बर्खास्तगी का पूरा श्रेय इजरायल को मिले।

दुनिया भर की राजधानियों में ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच लंबे समय तक चलने वाले युद्ध की निराशाजनक चर्चाओं के बीच आशंका जताई जा रही है कि यह फारस की खाड़ी में स्थित सुन्नी अरब देशों के लिए भी नुकसानदेह है। इनमें से अधिकांश देशों ने तटस्थता का दावा करते हुए विरोध जताया है, लेकिन कई देशों की धरती पर अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं और कम-से-कम कुछ देश तो छिपे तौर पर ही सही अमेरिकी कार्रवाई के पक्ष में थे।
यह लेख लिखते समय युद्ध के कम होने के कोई साफ संकेत तो नहीं हैं, लेकिन माना जा सकता है कि यह मार्च खत्म होते-होते या उससे भी पहले, अचानक समाप्त हो सकता है। कारण यह कि अमेरिका सहित पूरी दुनिया ऊर्जा आपूर्ति के गंभीर संकट से जूझ रही है और स्वाभाविक रूप से जनमत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर अपना रुख बदलने का दबाव डालेगा।
ट्रंप 31 मार्च से चीन की यात्रा पर जाने वाले हैं। इस बात की कम ही संभावना है कि एक ऐसे युद्ध के हालात में कोई शिखर सम्मेलन हो पाएगा, जिसमें वाशिंगटन और बीजिंग अजीब तरह से एक-दूसरे के विपरीत खड़े हैं।
कच्चे तेल की कीमतें चार साल पहले यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद से ही अभूतपूर्व स्तर पर पहुंची हुई हैं, और जब तक युद्ध समाप्त नहीं होता और होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से आपूर्ति फिर से शुरू नहीं हो जाती, दुनिया को अब तक के सबसे बड़े तेल संकट का सामना करते रहना पड़ सकता है। गैस की कीमतें भी चार साल के उच्चतम स्तर पर हैं, क्योंकि दुनिया के छठे सबसे बड़े उत्पादक कतर ने अप्रत्याशित परिस्थितियों में आपूर्ति बंद करने की घोषणा कर दी है। यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के आपातकालीन भंडार से भी सीमित समय के लिए ही आपूर्ति छोड़ी जाएगी। दुनिया की दैनिक मांग लगभग 104 मिलियन बैरल प्रतिदिन है।
10 मार्च को ट्रंप सोशल मीडिया पर दावा करते दिखे कि अमेरिकी मिशन ‘निर्धारित समय से काफी आगे’ है और ‘लगभग पूरी तरह से सफल’ है। एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्हें कहते हुए सुना गया, “हम अपनी प्रारंभिक समय-सीमा से काफी आगे हैं... हमने दो बार, और शायद तीन बार भी, नेतृत्व को हराया है।” यह इस बात का संकेत है कि वह सम्मानजनक तरीके से बाहर निकलने की जुगत लगा रहे हैं।
ट्रंप ने ईरान से ‘बिना शर्त आत्मसमर्पण’ चाहा था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इसलिए, वे खामेनेई सीनियर के खात्मे और ईरान के रक्षा कवच पर हमले का हवाला देते हुए ‘मिशन पूरा हुआ’ का दावा तो कर ही सकते हैं।
21 जून 2025 (जिस दिन अमेरिका ने फोर्डो, नतान्ज़ और इस्फ़हान पर हमले किए थे) को राष्ट्र को संबोधित करते हुए ट्रंप ने दावा किया था कि “ईरान की प्रमुख परमाणु संवर्धन सुविधाओं को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया है”। हालांकि, रॉयटर्स के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के प्रमुख राफेल ग्रॉसी ने इस महीने की शुरुआत (9 मार्च) में कहा, “हमारा मानना है कि हमारे अंतिम निरीक्षण तक इस्फ़हान में 200 किलोग्राम से थोड़ा अधिक, शायद उससे भी थोड़ा अधिक, 60 प्रतिशत (संवर्धित) यूरेनियम मौजूद था।"
माना जाता है कि यह भंडार उन सुरंगों में मौजूद है जो हमलों में बच गईं, और अगर इसे और समृद्ध किया जाए, तो इससे 10 परमाणु हथियारों के लिए पर्याप्त विस्फोटक सामग्री हासिल हो सकती है। ठीक है कि युद्ध ने ईरान का मिसाइल भंडार कम कर दिया है, लेकिन यह अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। साथ ही, यूक्रेन के साथ युद्ध से प्राप्त रूसी ड्रोन विशेषज्ञता ईरान को उपलब्ध कराई गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिकी नौसेना के विमानवाहक पोतों की तैनाती भी ईरान पर पूर्ण हमले की तैयारी से कहीं ज्यादा सैन्य कूटनीति थी।
26 फरवरी को, जिनेवा में अमेरिकी और ईरानी अधिकारियों के बीच वार्ता की मध्यस्थता कर रहे ओमान के विदेश मंत्री बदर अलबुसैदी ने दोनों पक्षों के बीच ‘महत्वपूर्ण प्रगति’ की घोषणा की। बता दें कि चर्चा आगे बढ़ाने के लिए दोनों पक्षों के विशेषज्ञों को अगले सप्ताह वियना में मिलना था।
इजरायल के गरम मिज़ाज प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए, जो देश में भ्रष्टाचार के आरोपों और गाजा में युद्ध अपराधों के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) के गिरफ्तारी वारंट के बावजूद सत्ता पर काबिज हैं, अमेरिका-ईरान के बीच सुलह किसी बुरी खबर से कम नहीं है।
ट्रंप, जो तेहरान के साथ ऐसा समझौता करने की महत्वाकांक्षा रखते थे जिसका श्रेय उन्हें मिल सके, ने चल रही बातचीत को धोखा दिया। खबरों की मानें तो ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि ईरान के सर्वोच्च नेता की बर्खास्तगी का पूरा श्रेय इजरायल को मिले। उन्होंने तो यहां तक दावा कर दिया कि ईरान के नए नेतृत्व का फैसला वह ही करेंगे।
ट्रंप अब हताश-निराश हैं कि इस हमले के बावजूद इस्लामी शासन ने उनके आगे घुटने नहीं टेके। आत्मसमर्पण नहीं किया। पिछले साल से ही ईरान में जन विद्रोह भड़काने के लिए अमेरिका ने जिस तरह पानी की तरह पैसा झोंका उसके बावजूद हालात नहीं बदले हैं। दमनकारी कारवाई से स्वाभाविक रूप से नाराज उदारवादी ईरानी, ऐसे प्रलोभनों का आसानी से शिकार बन जाते हैं। लेकिन आंशिक रूप से ही सही जनवरी का सीआईए समर्थित विद्रोह विफल रहा, और एक निर्मम इस्लामी सत्ता प्रतिष्ठान की कार्रवाई में हजारों लोगों की जान चली गई।
ईरान एक विभाजित राष्ट्र है। देश का बड़ा हिस्सा सत्ताधारी मुल्लाओं को सत्ता से बेदखल करने के पक्ष में रहा है। लेकिन इसके बावजूद नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई शुरुआत में इसलिए भी सहानुभूति बटोर सकते हैं, कि उनके पिता की हत्या के लिए किए गए घातक हमले में उनकी मां, पत्नी और एक बेटे की भी मौत हो गई थी। ऐसे में, सत्ता परिवर्तन की संभावना फिलहाल तो न के बराबर है।
इस बीच, ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं और अमेरिकी अवाम भी भोजन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों की मार महसूस करने लगा है। ट्रंप को नवंबर में मध्यावधि चुनाव का सामना करना है। लगभग 60 प्रतिशत अमेरिकी मौजूदा युद्ध के खिलाफ हैं और सैनिकों के शव अमेरिका लौटने के साथ यह संख्या और भी बढ़ सकती है ।
युद्ध और उससे उत्पन्न कच्चे तेल के संकट के चलते रूसी तेल की खरीद पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध हटाए जा रहे हैं। इसी का एक शर्मनाक पहलू वह घोषणा थी कि भारत को अब रूसी तेल की खरीद फिर से शुरू करने की अनुमति दे दी गई है। ट्रंप रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से फोन पर हुई अपनी बातचीत को लेकर उत्साहित दिखे, जिसमें उन्होंने यूरोप को तेल और गैस की आपूर्ति करने को लेकर तत्परता का संकेत दिया था। अब अगर यूरोप रूस के साथ व्यापार फिर से शुरू करने के लिए मजबूर हो जाता है, तो यह क्रेमलिन के लिए एक बड़ी जीत होगी।
नरेन्द्र मोदी सरकार की लगातार जारी रणनीतिक गलतियों की बात करें तो, ईरान पर इजरायल के हमले से ठीक 24 घंटे पहले तेल अवीव में उनकी उपस्थिति कूटनीतिक रूप से आत्मघाती कदम था। मोदी का खुला पक्षपात और खामेनेई की हत्या पर उनकी चुप्पी ने विकासशील देशों की नजरों में भारत की छवि को और ज्यादा नुकसान पहुंचाया है।
इसकी तुलना पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में भारत द्वारा 1992 में इजरायल के साथ राजनयिक संबंधों को बेहतर बनाने के लिए किए गए कुशल प्रयासों से की जानी चाहिए, जिसके बाद भारत को एक ऐसे तटस्थ पक्ष के रूप में देखा जाने लगा, जिस पर इजरायली और फिलिस्तीनी दोनों भरोसा कर सकते थे। मोदी का नेतन्याहू की ओर झुकाव वैश्विक दक्षिण में भारत की छवि को धूमिल कर रहा है। मौजूदा सरकार के तहत, भारत संयुक्त राष्ट्र महासभा में इजरायल पर होने वाले मतदान में लगातार गलत खांचे में रहा है, और इस वर्ष के अंत में भारत द्वारा आयोजित किए जाने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पश्चिम एशिया मुद्दे पर खुद को अल्पमत में पाएगा।
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