अंधेरों से दो-दो हाथ का साझा सांस्कृतिक उत्सव

आज की तारीख में दिवाली हमारे देश की उस अनूठी साझा संस्कृति की वारिस है, जिसकी सुगंध धरती के उन सारे कोनों तक, जहां भी देशवासियों की पहुंच संभव हुई है, फैली हुई है।

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हमें अदाएँ दिवाली की ज़ोर भाती हैं ।

कि लाखों झमकें हर एक घर में जगमगाती हैं ।।

चिराग जलते हैं और लौएँ झिलमिलाती हैं ।

मकां-मकां में बहारें ही झमझमाती हैं ।।

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अटारी, छज्जे दरो बाम पर बहाली है ।

दिवाल एक नहीं लीपने से खाली है ।।

जिधर को देखो उधर रोशनी उजाली है ।

गरज़ मैं क्या कहूँ ईंट-ईंट पर दिवाली है ।।

गौर कीजिए : अपनी शायरी को राजाओं/ बादशाहों के दरबारों व अभिजात वर्ग की हदों से निकालकर आम आदमी, बाजारों, त्योहारों और रोजमर्रा के जीवन से जोड़ने वाले गंगा-जमुनी तहजीब के पैरोकार अठारहवीं सदी के मशहूर शायर नज़ीर अकबराबादी (1735-1838) की रची 'दीवाली' शीर्षक नज़्म का यह अंश क्या बताता है? यही तो कि अंधेरे पर उजाले की विजय का प्रतीक पर्व दीपावली इस बड़े देश का ऐसा विराट सांस्कृतिक उत्सव रहा है, जिसे किसी धर्म-विशेष के त्यौहार की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। उसे ऐसे बंधन गवारा ही नहीं हैं क्योंकि संकीर्णताओं के अंधेरों में उसका दम घुटने लग जाता है।

तभी तो भले ही विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के पास उसे मनाने के अपने अलग-अलग उपलक्ष्य हैं, उद्देश्य एक ही है : अंधेरों से दो-दो हाथ और उजालों का साथ। हम जानते हैं कि कहीं इसे रावण की लंका पर विजय प्राप्त करने और वनवास के चौदह वर्ष बिताने के बाद भगवान राम के सीता व लक्ष्मण सहित वापस आने की खुशी में अयोध्या में जलाये गये दीपकों से जोड़कर मनाया जाता है तो कहीं धन, सम्पदा, सौभाग्य, श्री, समृद्धि , सौन्दर्य और शांति की देवी लक्ष्मी के समुद्र-मंथन से प्रकट होने की खुशी से जोड़ा जाता है।

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कहीं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की खुशी इसका उपलक्ष्य बनती है तो कहीं भगवान विष्णु के वामन अवतार और राजा महाबली को पाताल का अधिपति बनाने की खुशी।

इसी तरह जैन धर्मावलंबी इसे बिहार की राजधानी पटना से लगभग 101 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पावापुरी में अपने 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के मोक्ष या निर्वाण के हर्ष से जोड़कर मनाते हैं तो सिख धर्मावलंबी अपने दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह की ग्वालियर के किले (जहां वे बंदी थे) से रिहाई से जोडकर। पड़ोसी देश नेपाल में इसको 'तिहार' कहकर पांच दिनों तक मनाया जाता है और इस दौरान देवी-देवताओं के साथ-साथ कौओं, गायों और कुत्तों की भी पूजा की जाती है। 

दुनिया के जिन भी देशों में प्रवासी भारतीय हैं, वहां किसी न किसी रूप और उपलक्ष्य में यह मनाई ही जाती है।

आज की तारीख में इस रूप में यह हमारे देश की उस अनूठी साझा संस्कृति की वारिस है, जिसकी सुगंध धरती के उन सारे कोनों तक, जहां भी देशवासियों की पहुंच संभव हुई है, फैली हुई है। निस्संदेह, इस सुगंध को फ़ैलाने वाले देशवासियों को अपनी इस मान्यता को लेकर कोई संदेह नहीं कि इस दुनिया में हर शख्स को उजाला बांटने की ख्वाहिश ही एकमात्र ऐसी चीज है, जो विभिन्न समुदायों (उनकी ऐतिहासिक व सामाजिक पृष्ठभूमियां कुछ भी रही हों) को एक साथ जोड़ सकती है। 

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अकारण नहीं कि इस देश से वाबस्ता होने के बाद मुगल बादशाह भी दीपावली को 'जश्न-ए-चरागां' कहने और रौशनी के त्यौहार के रूप में पूरे जोश और रंगो-रोशनी के साथ मनाने लगे थे। 

जानकारों के अनुसार दीपावली आती तो राजधानी दिल्ली में इन बादशाहों की कोठियों, महलों व दरबारों को रौशन करने के लिए आकाश दीया कहें या आकाशदीप जलाया जाता था और उसमें कई मन बिनौले (कपास के बीज) का तेल व रूई की खासी बड़ी बत्ती इस्तेमाल की जाती थी। करीब 40 गज ऊंचे खंभे पर 16 रस्सियों के सहारे लटकाकर इस दीप को जलाया जाता तो उसकी रौशनी दूर-दूर तक बिखरकर बेहद मनोहारी दृश्य पैदा करती थी। 

प्रसंगवश, इस दीप में बत्ती व तेल डालने के लिए एक बड़ी सीढ़ी का इस्तेमाल किया जाता था और दीपावली की रात यह जलता तो इसकी रोशनी लाल किले से लेकर चांदनी चौक तक के क्षेत्र को आच्छादित कर देती थी। 

इसकी रोशनी में आतिशबाजी शुरू होती तो सोने में सुहागा हो जाता। मुगल बेगमें और शहजादियां उसे जी भर देखने का लोभ संवरण नहीं कर पातीं और अपने महलों की छतों, कुतुबमीनार के ऊपर या किसी और सुविधाजनक ऊंचे स्थान पर चढ़ कर जी भरकर निहारती थीं।

तब लाल किले के रंग-महल, फतेहपुर सीकरी और आगरा के किलों को भी दीयों से जगमगा दिया जाता था और भव्य आतिशबाजी की जाती थी, जिसकी व्यवस्था के लिए 'मीर-आतिश' (आतिशबाजी के प्रमुख) की नियुक्ति की जाती थी। 

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एक विशेष भोज भी इस जश्न का हिस्सा हुआ करता था, जिसमें आने वाले मेहमानों को देश-विदेश के नामचीन रसोइयों के बनाये नाना प्रकार के पकवान परोसे जाते थे। साथ ही छप्पन भोग के लिए 'छप्पन थाल' सजाकर मेहमानों को उनमें 56 अलग-अलग राज्यों और संस्कृतियों के पकवान पेश किए जाते थे।

दूध, शहद, केसर और गुलाब के जल में भिगोकर तैयार विशेष शाही मिठाइयाँ इस भोज का खास आकर्षण हुआ करती थीं। इनमें घेवर, पेठा, शाही टुकड़ा, जलेबी, फिरनी और पेड़ा मुख्य थीं, जिन्हें दीपावली की शुभकामनाओं के साथ दरबारियों और लोगों में बाँटा भी जाता था।

हां, बादशाह अकबर ने अपने समय इस जश्न में एक यह परम्परा भी जोड़ दी थी कि वह शुरू होता तो पहले बादशाह को सोने-चांदी से तौला जाता। फिर तौल में इस्तेमाल हुआ सारा सोना-चांदी गरीबों व जरूरतमंदों में बांट दिया जाता। कभी-कभी इस सोने-चांदी के साथ कई कीमती आभूषण भी दान किये जाते।

पहले अकबर, फिर मुहम्मद शाह 'रंगीला' और अंत में बहादुरशाह जफर की बादशाहत में इस ज़श्न ने एक के बाद एक कई नई छवियां पाईं। 'रंगीला' खुद शाही लवाजमे के साथ दीपावली के जश्न में शामिल होते और मौज-मस्ती करते थे। समय के साथ उनके इस जश्न नाम ही 'रंगीला की दीवाली' रख दिया गया था। वे दीपावली पर लाल किले के रंग-महल को हजारों दीयों से सजवाते और पुरानी दिल्ली के प्रसिद्ध चांदनी चौक के बाजारों का दौरा करते तो पूरी दिल्ली एक बड़े उत्सव स्थल में बदल जाती थी। 


अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर के दौर में लाल किले के भीतर श्री व समृद्धि की देवी लक्ष्मी की विशेष पूजा हुआ करती थी, जिसमें दिल्ली का हर शहरी शामिल हो सकता था और इसके लिए किसी निमंत्रण की दरकार नहीं थी। जफर ने अपनी बादशाहत के बुरे से बुरे कहें या बदहाली वाले दौर में भी दीपावली की रस्में निभाने के लिए धन की कोई कमी नहीं होने दी थी। 

पीछे मुड़कर जहाँगीर के समय का जिक्र करें तो उनके समय में शाही किलों व महलों को बड़ी-बड़ी मशालों से रोशन किया जाता और यमुना के तट पर आतिशबाजी का भव्य प्रदर्शन किया जाता था। इस तरह कि दिल्लीवासी उसे देखने के लिए उमड़ पड़ते थे। 

उस काल के ऐतिहासिक दस्तावेज 'तुज़ुक-ए-जहाँगीरी' में उल्लेख है कि इस जश्न के दौरान दरबारियों और आम लोगों को द्यूत क्रीड़ा की खास छूट दी जाती थी।  जहाँगीर ने खुद इसका जिक्र किया है कि उनके  राज में दीवाली के दिन लोग लक्ष्मी पूजा तो करते ही थे, धन व समृद्धि की कामना के लिए आपस में पांसे (जुआ) भी खेलते थे और उन पर कोई पाबंदी नहीं होती थी।

इतना ही नहीं, पुरानी दिल्ली की गलियों में मुस्लिम भुजवा (हलवाई) परिवार विशेष रूप से खील-बताशे बनाकर बेचते थे, जो इस बात का प्रतीक था कि इस त्योहार ने पूरे समाज को आपस में जोड़ रखा था।

औरंगजेब के वक्त बादशाहत की ओर से किए जाने वाले इस जश्न की कुछ चीजों को गैर-इस्लामी करार देकर खत्म कर दिया गया तो यह फीका पड़ गया, लेकिन तब भी राजपूत सामंतों के साथ आम लोगों ने अपने स्तर पर इसकी परम्परा को कायम रखा।

दूसरी ओर लखनऊ में अवध के नवाबों ने मुगल बादशाहों की तरह दीपावली को कोई अलग या नया नाम नहीं दिया, लेकिन सूबे की निराली गंगा-जमुनी तहजीब के अनुरूप उसे मनाते वे भी बेहद निराले अंदाज में थे। 

इतिहासकार बताते हैं कि उनके महलों में हफ्तों पहले से ही दीपावली की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। इस अवसर पर महलों की साफ-सफाई और रंग-रोगन करवाकर उन्हें दुल्हनों की तरह सजाया जाता था। फिर उनके चारों ओर सुंदर तोरणद्वार बनाये और उन पर खास तरीके से दीये जलाये जाते थे।

18वीं-19वीं शताब्दी तक पटाखों के साथ आतिशबाजी भी नवाबों की दीपावली का हिस्सा बन गई थी और वे अपनी प्रजा में हिंदू या मुसलमान का भेद किये बिना उसके बीच जाकर लोगों को दीपावली की दिली मुबारकबाद देते थे।

लखनऊ में चौथे नवाब आसफ़उद्दौला (जिनके 1775 से 1797 तक के शासनकाल को लखनवी या कि गंगा-जमुनी तहजीब का स्वर्णकाल कहा जाता है) के वक्त के दीपावली के आयोजनों को सबसे निराला बताया जाता है। इनकी परम्परा उन्होंने तब डाली थी, जब सूबे की राजधानी फैजाबाद से लखनऊ ले आये थे। उनके वक्त दीपावली पर पूरे लखनऊ में बड़े इमामबाड़े समेत विभिन्न नवनिर्मित नवाबी इमारतों और गोमती नदी के तटों को दीयों से खूब रौशन किया जाता था।


कहते हैं कि सूबे में दीपावली पर आतिशबाजी के अनूठे व भव्य प्रदर्शन की शुरुआत भी आसफउद्दौला ने ही कराई। साथ ही उन्होंने उसे शाही संरक्षण भी प्रदान किया। सूबे के इतिहास की पुस्तकों के अलावा कई यूरोपीय चित्रकारों की पेंटिंगों में भी इसका जिक्र मिलता है। उनके ही वक्त अवध, खासकर लखनऊ में, दीपावली के अगले दिन 'जमघट' की अनोखी परंपरा भी शुरू हुई, जो आज तक चली आती और बड़े चाव से निभाई जाती है। 

उन्होंने शुरू में अपने चाचा उस्ताद आगा अबू तुराब खान (जिनको पतंगबाजी व आतिशबाजी का बेहद शौक था) की हौसला अफजाई के लिए इन दोनों को दीपावली से जोड़ा और हिंदू मुस्लिम भाईचारे व मेल-जोल का जरिया बनाया। फिर दीपावली की रात की भव्य 

रौशनी, आतिशबाजी व जश्न के अगले दिन, क्या हिंदू और क्या मुसलमान, सभी के खुले मैदानों और अपने घरों की छतों पर इकट्ठे होकर परस्पर मिलने जुलने की नई परम्परा विकसित की। 

समय के साथ इसे 'जमघट' कहा जाने लगा और यह धीरे-धीरे दीपावली के दूसरे दिन की पक्की परंपरा बन गया।

आसफउद्दौला के वक्त की दीपावली की एक और खास बात यह थी कि इस अवसर पर लखनऊ के राजा बाजार और बताशे वाली गली को सफेद रंग की खिलौनों जैसी मिठाइयों से खूब सजाया जाता था, जबकि आखिरी नवाब वाजिद अली शाह के वक्त दीपावली के अवसर पर रहस व नाटकों के मंचन जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ करते थे। 

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