कुटिलताओं के प्रतिरोध का समय

विश्व इतिहास कुटिल सत्ताधीशों द्वारा किए जाने वाले धर्म और राजनीति के घालमेल के अनर्थो से भरा पड़ा है। स्वतंत्रता के बाद हमारे देश को इस घालमेल के अनर्थों से महफ़ूज़ रखने के लिए ही संविधान निर्माताओं ने उसमें राजसत्ता के धर्म से परहेज की व्यवस्था की थी।

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गत शताब्दी के नवें दशक के उत्तरार्ध की बात है, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार ने अयोध्या में 'वहीं' राममंदिर निर्माण के लिए आसमान सिर पर उठा लिया था और रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद के फैसले की प्रतीक्षा के लिए भी तैयार नहीं था। उसके लोग यह तक कह रहे थे कि किसी न्यायालय को इसका फैसला करने का अधिकार ही नहीं है। 

लेकिन इस परिवार के आनुषंगिक संगठन विश्व हिन्दू परिषद ने अयोध्या के संतों-महंतों में इस 'दृष्टिकोण' के लिए समर्थन जुटाने की कवायदें तेज कीं, तो पाया कि वे उसका साथ देने को कतई राजी नहीं हैं। अलबत्ता, बाद में बदली परिस्थितियों में उनमें से कुछ सहानुभूति रखने लगे।

अयोध्या (फैजाबाद) के लब्धप्रतिष्ठ सहकारी हिन्दी दैनिक 'जनमोर्चा' के संस्थापक संपादक स्मृतिशेष महात्मा हरगोविंद ने इसको लक्ष्य कर अपने एक लेख में लिखा था कि ये संत-महंत जिस तरह हंसों के भ्रम में बगुलों का साथ दे रहे हैं, वह एक दिन हिन्दू धर्म और भगवान राम दोनों की मर्यादाओं के हनन और अप्रतिष्ठा का बड़ा कारण बन जाएगा।

1990 में विश्व हिन्दू परिषद की बहुप्रचारित 'कारसेवा' में बहे खून की बिना पर 1991 में उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व में  भारतीय जनता पार्टी की पहली पूर्ण बहुमत वाली सरकार बन गई, जिसने राष्ट्रीय एकता परिषद और सर्वोच्च न्यायालय को आश्वस्त करके भी छह दिसंबर 1992 को कारसेवकों से बाबरी मस्जिद की रक्षा का दायित्व नहीं निभाया और बर्खास्तगी के बाद शहादत की मुद्रा ओढ़ ली। तब  महात्मा ने एक और लेख में कई उदाहरणों की मार्फत लिखा कि यह याद करने का वक्त है कि इस देश की प्रकृति कुछ ऐसी है कि कोई भी राज्याश्रय किसी भी हालत में किसी भी धर्म के किसी काम नहीं आता।  

इस बात को अयोध्यावासियों ने कमोबेश तब तक याद रखा, जब तक संघ परिवार को नरेन्द्र मोदी के रूप में नया 'नायक' नहीं मिल गया। 2014 में 'विकास पुरुष' का चोला धारण करके 'अवतरित हुए' इस नए नायक ने बाद में देशवासियों के सामाजिक-धार्मिक विवेक को अस्त-व्यस्त करने के लिए अनेक फरेब रचे और खुद के लिए सहूलियत पा ली कि वह प्रधानमंत्री के रूप में हिन्दुओं को उनके धर्म को मजबूत राज्याश्रय का झांसा देते हुए अपने को 'धर्माधीश' भी बना ले। 

2019 में नौ नवंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने राजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद का राममंदिर के पक्ष में निपटारा किया तो उसने संघ परिवार को ही समूचा हिन्दू  समाज मानकर जिस तरह अपने को 'बहुरूपधारी' बनाया, जिसके कारण, एक शंकराचार्य के शब्दों में कहें, तो सारे हिन्दुओं को सहज स्वीकार्य मंदिर के बजाय संघ का कार्यालय निर्मित हुआ और जल्दी  ही उसके 'एसेट' में बदल गया, वह सब अभी हमारे हालिया व्यतीत की  सबको ज्ञात बातें हैं। यह कुटिल 'राज्याश्रय' जल्दी ही मंदिर निर्माण में भ्रष्टाचार और चढ़ावे की चोरी के खुलासों तक पहुंच कर गंभीर मर्यादा हीनता और अप्रतिष्ठा का कारण बनने लगा तो अयोध्या के लोगों को महात्मा हरगोविंद की बातें फिर याद आने लगीं।


यहां यह बात समझने की है कि क्यों हजारों साल पुराने इतिहास वाले इस देश के लोग धर्म को मनुष्य का व्यक्तिगत चयन मानते आए हैं? देश की जिस धार्मिक बहुलता पर हम आज भी गर्व करते हैं, वह गवाह है कि अपने धर्म के प्रचार और प्रसार की लाख कोशिशों के बाद भी सत्ताओं के लिए इस देश को किसी एक धर्म के रंग में रंगना संभव नहीं हो पाया तो इसीलिए कि जनमानस ने उसमें  सहयोगी होना स्वीकार नहीं किया।

इस देश के इतिहास में इसकी अनेक मिसालें हैं, लेकिन दो महान सम्राटों-अशोक और अकबर-की दो खास मिसालों से ही बात पूरी तरह साफ हो जाती है। अपने वक्त में सबसे शक्तिशाली मौर्य राजवंश के प्रतापी सम्राट देवानांप्रिय अशोक ने ईसापूर्व 269 से 232 तक राज किया और कई लोग उन्हें देश का पहला चक्रवर्ती सम्राट मानते हैं। ईसापूर्व 262 से 261 तक लड़े गए ऐतिहासिक कलिंग युद्ध के दौरान हुए भयानक नरसंहार से द्रवित होकर उन्होंने अहिंसामार्गी बौद्ध धर्म की शरण ले ली। उनके समय में देशवासियों का एक बड़ा समूह उनके द्वारा प्रेरित इस धर्मपथ पर गया भी। लेकिन यह धर्म उनके संसार को अलविदा कहने के साढे़ पांच दशक तक भी अपनी इस स्थिति को बचाए नहीं रख पाया।

उनके वंशज नवें मौर्य सम्राट वृहद्रथ की उनके ही सेनापति पुष्यमित्र शुंग (ईसा पूर्व 185-149) ने हत्या कर दी और इतिहासकार डीएन झा के शब्दों में कहें तो बौद्ध भिक्षुओं के संहार और उनके धर्मस्थलों के ध्वंस के रास्ते चलकर सनातन ब्राह्मणीय धर्म की पुनरस्थापना कर दी। बौद्ध धर्म का तो ऐसा उच्छेदन कर डाला कि लोग भूल से गए कि कभी देश में उसका वर्चस्व हुआ करता था। इतिहासकार यह लिखने तक पर विवश हो गए कि महात्मा बुद्ध द्वारा प्रवर्तित बौद्ध धर्म दुनिया भर में तो फैला, लेकिन उनके अपने ही देश से लुप्तप्राय हो गया! 

दूसरी मिसाल मुगल बादशाह अकबर की है, जिन्होंने 11 फरवरी, 1556 से 27 अक्तूबर 1605 तक सत्ता संभाली। उनके द्वारा प्रवर्तित एवं प्रचारित दीन-ए-इलाही का हश्र भी कुछ अलग नहीं हुआ। उन्होंने अपनी बहुधर्मी-बहुभाषी रियाया के लिए सबसे कल्याणकारी मानकर अपने द्वारा प्रवर्तित दीन-ए-इलाही को उस वक्त तक दुनिया भर में प्रचलित तमाम धर्मों का सार-संग्रह बनाने की कोशिश की थी। उसमें हिन्दू और  इस्लाम धर्मों की ही नहीं, जैन, बौद्ध एवं ईसाई धर्म-दृष्टियों का भी समाहार किया था। 

लेकिन तत्कालीन भारतीय समाज ने उसे कतई स्वीकार नहीं किया। अलबत्ता, अकबर ने कभी किसी पर उसे कुबूल करने का दबाव भी नहीं डाला। इसके उलट उन्होंने तब धार्मिक सहिष्णुता की बड़ी नजीर पेश की, जब पुर्तगाल में कुरान के अपमान से क्षुब्ध उनकी मां बेगम हमीदा बानो ने उन पर हिन्दुस्तान में बाइबिल के उससे बड़े अपमान के आयोजन का दबाव डाला। तब अकबर ने यह कहते हुए मां की बात टाल दी कि पुर्तगालियों द्वारा कुरान का अपमान करना गलत था, तो मेरे जैसे बादशाह के लिए बुराई का प्रतिशोध बुराई से लेना भी बहुत अशोभनीय होगा, क्योंकि किसी भी धर्म का अपमान अंततः ईश्वर का ही अपमान है।


हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक और साहित्यकार विजय बहादुर सिंह कहते हैं कि इस उत्तर आधुनिकताकाल में भारत के लिए इन दोनों महान सम्राटों की मिसालें भुलाना उसे अंधकार की ओर धकेल सकता है, जबकि सबक लेना नए उजाले प्रदान कर सकता है।

उनका मानना है कि हम जितनी जल्दी यह बात समझ जाए उतना ही अच्छा कि देश की चुनी हुई सरकारों का काम किसी धर्म की स्थापना, उसका संरक्षण या प्रचार करना नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रतिज्ञाओं के अनुसार सुशासन की स्थापना और लोक-समाज की सारी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का यथासंभव आदर करना है।

अफसोस कि वर्तमान सत्ताधीश शायद ही कभी देश की इस संस्कृति को गंभीरता से जानने-समझने की कोशिश करते हैं। दुनिया का इतिहास भी कुटिल सत्ताधीशों द्वारा किए जाने वाले धर्म और राजनीति के घालमेल के अनर्थों से भरा पड़ा है। स्वतंत्रता के बाद हमारे देश को इस घालमेल के अनर्थो से महफ़ूज़ रखने के लिए ही संविधान निर्माताओं ने उसमें राजसत्ता के धर्म से परहेज की व्यवस्था की थी। 

आज इस परहेज के टूटने को इस कदर 'गर्व' का विषय बना दिया गया है कि कभी संविधान का सबसे पवित्र मूल्य रही धर्मनिरपेक्षता छद्म करार दी जाने लगी और मजाक का विषय बना दी गई है। इतना ही नहीं, सरकारों में खुद को बहुसंख्यकों के धर्म की सबसे बड़ी पैरोकार, हिन्दूवादी या हिन्दुत्ववादी प्रदर्शित करने का फैशन-सा चल पड़ा है।

निस्संदेह, वह समय हमारे सामने आ खड़ा हुआ है जब समूचे हिन्दू समाज को उसे खुश रखने के नाम पर बरती जा रही इन सारी कुटिलताओं और स्वार्थ साधनाओं को उनके वास्तविक रूप में पहचान और साथ ही यह समझकर कि उनसे सबसे ज्यादा नुकसान उसके समाज का ही है, पूरी शक्ति से उनका प्रतिरोध करना चाहिए। इससे कम पर तो सत्ताधीशों को संसद में चढ़ावा-चोरी पर चर्चा तक मंजूर नहीं है।

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