विचार

आकार पटेल का लेख: देश को मिनिमम गारंटी स्कीम की जरूरत है, सियासी फसल काटने के लिए अंतरिम घोषणाओं की नहीं

भारत से लेकर यूरोप तक, पूरी दुनिया में यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम लोगों को लुभाती है। वामपंथी और उदारवादी लोगों को लगता है कि इससे गरीबी और असमानता खत्म होगी। दक्षिणपंथी इसे ज्यादा प्रभावी और नौकरशाही से मुक्त कल्याण योजना मानते हैं।

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आकार पटेल

लोकसभा चुनाव में वोटों की सियासी फसल काटने के लिए मोदी सरकार के अंतरिम बजट मं किसानों को 6,000 रुपए सालाना की मदद का चौतरफा तारीफें की जा रही हैं। लेकिन इस ऐलान से पहले दो बातें हुईं। पहली, सरकार ने देश में बेरोजगारी की दर 45 साल निचले स्तर पर पहुंचने की बात छिपाई और दूसरी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सत्ता में आने पर मिनिमम इनकम गारंटी देने का ऐलान किया।

किसानों के लिए नकद मदद की योजनाएं देश में पहले से चल रही हैं। तेलंगाना में सरकार किसानों को प्रति एकड़ 8,000 रुपए सालाना देती है। मोदी सरकार की योजना सिर्फ उन किसानों के लिए है जिनके पास 2 हेक्टेयर यानी 5 एकड़ से कम जमीन है। लेकिन अगर ऐसा किसान तेलंगाना में है तो उसे तो पहले से 40,000 रुपए मिल रहे होंगे।

ओडिशा में भी किसानों को 5000 रुपए नकद मिलते हैं। इसके अलावा छोटे किसानों को बुवाई के पांच सीज़न में 25,000 रुपए और भूमिहीन किसानों के परिवारों को तीन किसतों में 12,500 रुपए मिलते हैं। इन सभी योजनाओं की आलोचना करने वाले भी हैं, जो कहते हैं कि ऐसे किसानों की पहचान करना मुश्किल काम है। वे कहते कैसे पता चलेगा कि कौन सा किसान भूमिहीन है और कौन सा किसान छोटा? लेकिन, अब केंद्र की योजना सामने आने के बाद हर राज्य संभवत: इसका अनुकरण करेगा। आखिर इससे सियासी फायदा जो होना है।

यह सोचना कि बिना नकद मदद के जीवनयापन करना मुश्किल है, भारत ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों में भी है। यूके में बेरोजगार दंपति को 114 पाउंड हर सप्ताह यानी करीब 42,000 रुपए हर माह सरकार से मिलते हैं। ऐसे परिवार जिनके पास घर नहीं है या बेहद कठिन परिस्थितियों में रह रहे हैं, उन्हें सरकार सस्ते और कई बार मुफ्त मकान भी देती है। अमेरिका में भी बेरोज़गारी भत्ता और भोजन की मदद मिलती है।

जून 2016 में स्विटज़रलैंड में हुए एक जनमत में मतदाताओं ने बेसिक इनकम गारंटी के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। वहां के 77 फीसदी वोटर ने इसके खिलाफ वोट दिया था। योजना के मुताबिक हर किसी को बिना शर्त एक निश्चित न्यूनतम आमदनी की गारंटी दी जानी थी, भले ही उसकी पहले से इनकम हो या नौकरी आदि हो।

योजना के समर्थकों का कहना था कि स्विटज़रलैंड के सभी व्यस्कों को प्रति माह 25,00 स्विस फ्रैंक (करीब 1.8 लाख रुपए) और बच्चों को 625 स्विस फ्रैंक (करीब 45,000 रुपए) प्रति माह दिए जाने चाहिए। समर्थकों का तर्क था कि आने वाले दिनों में ऑटोमेशन तेज़ी से बढ़ेगा और बहुत ज्यादा नौकरियां उपलब्ध नहीं होंगी। लेकिन योजना के विरोधियों का मानना था कि ऐसा करने से दूसरे देशों के लोग भारी तादाद में स्विटज़रलैंड पहुंच जाएंगे।

पाठकों को यह बात दिसचस्प लग सकती है कि इस योजना को स्विटज़रलैंड के राजनीतिज्ञों का कोई खास समर्थन नहीं था। यहां तक कि एक भी संसदीय पार्टी ने इस योजना का समर्थन नहीं किया। भारत के संदर्भ में यह थोड़ा अटपटा लग सकता है, क्योंकि हमारे यहां तो हर दल किसी न किसी रूप में नकद पैसे देना चाहता है।

अभी कुछ ही दिन पहले फिनलैंड में भी उस योजना को बंद कर दिया गया जिसमें प्रयोग के तौर पर 28 से 58 वर्ष के 2,000 बेरोजगारों को हर महीने 560 पाउंड (करीब 45,000 रुपए) दिए जा रहे थे। इन लोगों को यह पैसा तब भी मिलता रहता जब उन्हें कोई रोजगार या नौकरी मिल जाती, ताकि इस योजना के असर का अध्ययन हो सके। स्पेन के बार्सिलोना और नीदरलैंड्स के उतरेख्त में भी ऐसे ही प्रयोग हो चुके हैं।

भारत से लेकर यूरोप तक, पूरी दुनिया में यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम लोगों को लुभाती है। वामपंथी और उदारवादी लोगों को लगता है कि इससे गरीबी और असमानता खत्म होगी। दक्षिणपंथी इसे ज्यादा प्रभावी और नौकरशाही से मुक्त कल्याण योजना मानते हैं।

नरेंद्र मोदी जब सत्ता में आए तो उन्होंने वादा किया था कि वे मनरेगा जैसी योजनाओं को खत्म कर देंगे, उन्होंने इसे मनमोहन सरकार की ऐतिहासिक नाकामी करार दिया था। लेकिन जब बजट पेश किया तो उन्होंने मनरेगा के मद में पैसे को 10 फीसदी बढ़ा दिया। यानी, इस योजना को लेकर उनके विचार बदल चुके थे।

हकीकत यह है कि पूरी दुनिया में नौकरियां कम हो रही है और आने वाले दिनों में और कम होंगी खासतौर से वह जैसी नौकरियां लोग चाहते हैं। बहुत से विशेषज्ञ भविष्यवाणी कर रहे हैं कि दुनिया की सबसे विकसित अर्थव्यवस्थाएं भी अगले एक-डेढ़ दशक में भीषण बेरोज़गारी का सामना करेंगी। इसका अर्थ है कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम योजनाओं पर ज़्यादा से ज़्यादा ध्यान दिया जाए। भारत में तो पश्चिम के मुकाबले ज्यादा कठिन समस्याएं हैं। हमारे यहां प्रति व्यक्ति आय पश्चिमी देशों के मुकाबले काफी कम है। इसलिए हमें दूसरे देशों से पहले अपने यहां लोगों को पैसे से मदद करने की जरूरत है।

हां, इससे फर्क जरूर पड़ता है कि देश में कौन प्रधानमंत्री है, मौजूदा दौर का ‘जीनिसय’ या पिछले दौर का अर्थशास्त्री, जिसकी पूरी दुनिया में इज़्ज़त है।

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