आकार पटेल का लेख: चीन, कोरोना, जीडीपी को छोड़कर आगे बढ़ चुके हैं मोदी, तैयार रहिए एक और भाषण और वादे के लिए

नोटबंदी से लेकर देशबंदी तक की रात 8 बजे की घोषणाओं के क्या नतीजे निकलते हैं, पीएम मोदी इससे आगे बढ़ चुके हैं। कोरोना, जीडीपी चीन से सीमा विवाद को भूल चुके हैं, उन्हें आगे अब अधिक रोचक काम नजर आ रहे हैं। ऐसे में तैयार रहिए नए भाषण, घोषणा और वादों के लिए।

फोटो : INDIAN GOVERNMENT / HANDOUT” 
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आकार पटेल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास करेंगे। यह तो निश्चित है कि प्रधानमंत्री से जुड़ा कोई भी कार्यक्रम है तो वह भव्य ही होगा। यह आयोजन 5 अगस्त को किया जा रहा है, और यही वह तारीख है जब कश्मीर का संवैधानिक दर्जा छीन लिया गया था। ध्यान रहे कि अनुच्छेद 370 को खत्म नहीं किया गया है, यह तो संविधान में अब भी है, बस इतना किया गया है कि इसका पालन खत्म कर दिया गया है। लेकिन एक साल बीतने के बाद भी अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि आखिर इस फैसले के पीछे कारण क्या था।

इस साल के पहले 6 महीने में ही कश्मीर में हुई हिंसा में 200 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। केंद्र की निगरानी में कश्मीर में हिंसा लगातार बढ़ रही है। वाजपेयी और मनमोहन सिंह के दौर में शुरु हुई प्रक्रिया दम तोड़ रही है और पिछले साल के मुकाबले दो गुना ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है।

कश्मीर को बुनियादी तौर पर सैन्य शासन में रखा गया है। कश्मीरियों को इंटरनेट की सुविधा नहीं है और न ही उन्हें अपनी बात कहने का अधिकार। सुप्रीम कोर्ट में उनकी बात नहीं सुनी गई या फिर तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों की तरह उन्हें भी अनदेखा कर दिया गया।

लेकिन सवाल वही है कि आखिर अनुच्छेद 370 हटाने का मकसद क्या था।

अब दूसरे मोर्चे की बात करें और कोरोना के खिलाफ हमारे युद्ध को देखते हैं। प्रधानमंत्री ने अब अपने रात 8 बजे वाले राष्ट्र के नाम संबोधन बंद कर दिए हैं और वे खुद भी कोरोना जैसे मुद्दे से उकताए से लगते हैं। यह सच है कि इस महामारी को सरकार सिर्फ अंशत: ही नियंत्रित कर सकती है। लेकिन बहुत सी ऐसे बातें थीं जो सरकार कर सकती थी। पड़ोसी पाकिस्तान संभवता कोरोना का प्रसार रोकने में कामयाब रहा है और वहां 14 जून को 6800 केस प्रतिदिन सामने आ रहे थे जो 24 जुलाई को घटकर 1200 रह गए।

इसके विपरीत भारत में 14 जून को 11,000 केस प्रतिदिन सामने आ रहे थे जो 24 जुलाई को बढ़कर करीब 49,000 हो गए।

अभी कुछ दिन पहले तक पाकिस्तान में कोरोना रोगियों की संख्या भारत के मुकाबले आधी थी, जबकि उनकी आबादी भारत की आबादी का पांचवा हिस्सा ही है। लेकिन अब लगता है कि उसने हालात पर नियंत्रण पा लिया है जो भारत नहीं कर सका है। बांग्लादेश में भी कोरोना केस कम हो रहे हैं।

लेकिन अपने रात 8 बजे भाषणों में लॉकडाउन का ऐलान करने के बाद मोदी आगे बढ़ चुके हैं।

रात 8 बजे की जिस घोषणा को लेकर मोदी सबसे ज्यादा उत्साहित रहे वह था नोटबंदी बम जो उन्होंने 8 नवंबर 2016 को गिराया था। और जिस फैसले ने देश की अर्थव्यवस्था को गर्त में पहुंचा दिया। सरकार ने अपनी नाकामी छिपाने के लिए जीडीपी के आंकड़ों में हेराफेरी की। अभी दो सप्ताह पहले आरबीआई के पूर्व गवर्नर सी रंगराजन ने कहा कि सरकार को खुद चाहिए कि जीडीपी के आंकड़ों की गणना की प्रक्रिया को लेकर पैदा विवाद को साफ करे। देश के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्र्हमण्यन ने खुद कहा कि भारत अपनी जीडीपी असली आंकड़ों से करीब 2.5 फीसदी अधिक बताता रहा है।

शनिवार को मिंट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक सभी आर्थिक संकेतक बताते हैं कि सरकार आंकड़ों की बाजीगरी करती रही है। फैक्टरी आउटपुट की वृद्धि जो 2011 में 20 फीसदी थी वह 9 फीसदी पर आ गई है। मोदी सरकार का अपना खुद का नेशनल सैंपल सर्वे बताता है कि ग्रामीण उपभोग (रूरल कंजम्पशन) की वृद्धि दर माइनस 1.5 फीसदी है यानी यह मोदी शासन में नीचे आई है। वहीं अर्बन कंजम्पशन यानी शहरों में उपभोग भी 3.4 फीसदी से गिरकर 0.3 फीसदी पहुंच गया है।

कार्पोरेट इनवेस्टमेंट यानी निजी क्षेत्र का निवेश 23 फीसदी से घटकर माइनस 1.8 फीसदी पर है। बैंको से दिए जाने वाले कर्ज की रफ्तार 14 फीसदी से नीचे आकर 4 फीसदी पर है, लेकिन इस सबके बावजूद जीडीपी 7 फीसदी पर ही है। मोदी से पहले भी 7 फीसदी पर थी और मोदी के आने के बाद भी 7 फीसदी पर है। यह अविश्वस्नीय है क्योंकि सारा डेटा देखने के बाद इस पर विश्वास हो ही नहीं सकता।

इतना ही नहीं बेरोजगारी की दर 8 फीसदी पर है जो इतिहास में कभी नहीं रही। शुक्रवार को आरबीआई ने कहा कि बैंकों को एनपीए यानी बट्टे खाते में गया कर्ज मौजूदा 8.5 फीसदी से बढ़कर मार्च तक 12.5 फीसदी या अधिक पर पहुंच सकता है।

इस सबके वाबजूद वित्त मंत्री को अर्थव्यवस्था में हरित कोंपले फूटती दिख रही हैं, यानी उनकी मुताबिक अर्थव्यवस्था पटरी पर आ रही है। उनकी बात को कोई गंभीरत से वैसे भी नहीं लेता है।

इसी दौरान मोदी ने मेक इन इंडिया जैसा एक बड़ा नारा दिया था, लेकिन अब इस नारे में खुद मोदी की ही कोई दिलचस्पी नहीं रह गई लगती है। मैन्युफैक्चरिंग की देश की जीडीपी में योगदान 15 से गिरकर 14 फीसदी हो चुका है।

सीमा पर देखें तो चीन के साथ हमारी दिक्कत सामने है ही। लेकिन मोदी ने इस समस्या को लद्दाख में एक भाषण देकर सुलझा लिया। उसके बाद कोई एक्शन नहीं हुआ। ध्यान रहे कि अक्टूबर आते-आते चीन से ली सीमा पर रसद पहुंचाने के लिए इस्तेमाल होने वाले दर्रे और रास्तों पर बर्फ जम चुकी होगी। हमारे करीब 2 लाख सैनिक बर्फ के ब्याबान में अपना कर्तव्य पालन कर रहे होंगे और उनके पास कोई इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं होगा, जबकि इस दौरान चीन ने अपने सैनिकों के लिए डोकलाम के बाद बीते तीन साल में अच्छा खासा इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर लिया है।

चीनी सेना हमारे क्षेत्र में बैठी है और मोदी के उस भाषण को सामने रख रही है जिसमें मोदी ने कहा था कि न तो हमारी जमीन पर कोई घुसपैठ हुई है और न ही किसी चौकी पर कब्जा हुआ है। चीन इस भाषण को सबूत के तौर पर सामने रख रहा है। आखिर ऐसा बयान देने की जरूरत ही क्या थी? यह अभी तक स्पष्ट नहीं है, लेकिन मोदी आगे बढ़ चुके हैं क्योंकि चीन से समस्या के मुकाबले कहीं अधिक रोचक काम उन्हें नजर आ गया है।

अगले सप्ताह वह फिर भाषण देंगे, देखिए क्या बोलते हैं। वह नए वादे करेंगे और इनमें से अधिकतर पूरे नहीं करेंगे। लेकिन हां, वह नई घोषणाओं और भाषणों की गारंटी दे सकते हैं।

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