आकार पटेल का लेख: अयोध्या फैसला जरूरत के सिद्धांत की याद दिलाता है

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मस्जिद में मूर्तियां रखना गैरकानूनी था फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में बिल्कुल वही फैसला सुनाया है जैसा कि विश्व हिंदू परिषद और बीजेपी शुरु से ही चाहते थे।

फोटो : सोशल मीडिया
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आकार पटेल

अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने हमारी न्यायपालिका के इतिहास को दोहराया है। भारतीय उपमहाद्वीप में न्यायपालिका ने आवश्यकता के सिद्धांत का आह्वान किया है।

पाकिस्तान में आज से कोई 65 साल पहले ऐसा ही हुआ था। आजादी के कुछ समय बाद ही पाकिस्तानी सेना ने देश पर कब्जा कर लिया, और उस समय हुए तेज घटनाक्रम के बाद जनरल अयूब खान पाकिस्तान के नेता बन गए।

इस घटनाक्रम को हवा मिली थी गुलाम मोहम्मद नाम के गवर्नर जनरल से। वह भारत के महिंद्रा समूह में साझीदार हुआ करते थे, और तब महिंद्रा समूह का नाम महिंद्रा एंड मोहम्मद हुआ करता था। (बाद में इसका नाम महिंद्रा एंड महिंद्रा हो गया।) वह एक प्रशिक्षित चार्टर्ड अकाउंटेंट थे और बहुत ही चतुर माने जाते थे। उन्हें पाकिस्तान का वित्त मंत्री बनाया गया। 1948 में जिन्ना की मौत और उनके डिप्टी लियाकत अली खां की 1951 में हत्या के बाद पाकिस्तान मुस्लिम लीग नेतृत्व विहीन हो गई थी। इसी राजनीतिक शून्य को भरने की कवायद में गुलाम मोहम्मद गवर्नर जनरल बन गए।

1954 में उन्होंने पाकिस्तान की संविधान सभा को बरखास्त कर दिया, क्योंकि वह भारत से कहीं ज्यादा समय पाकिस्तान का संविधान लिखने में लगा रही थी। सभा के बरखास्त सदस्यों ने अदालत की शरण ली और कहा कि गुलाम मोहम्मद का फैसला गैरकानूनी है। लेकिन गुलाम मोहम्मद और उनके साथ मंत्री बने लोगों ने इसके खिलाफ अपील कर दी।

इस मामले में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने गुलाम मोहम्मद का साथ दिया और उनके फैसले को कानूनी करार दे दिया। फैसले में कहा गया, “जो मुद्दा लाया गया है उसमें आपातकाल के दौरान गवर्नर जनरल के असीमित अधिकारों का जिक्र है न कि सामान्य हालात में मिले अधिकारों का, क्योंकि उस समय विधायिका काम कर रही होती है। सवाल यह है कि क्या संविधान में ऐसा कोई प्रावधान है जो ऐसे हालात में या इन जैसे हालात में संविधान के एक्ट के बाहर जाकर गवर्नर जनरल को अतिरिक्त अधिकार देता है जो जरूरत पड़ने पर उन्हें ऐसे फैसले लेने की अनुमति दे।”

बुनियादी तौर पर आपातकाल लागू है (और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपातकाल गवर्नर जनरल ने ही लागू किया हो) तो गवर्नर जनरल को उसकी इच्छानुसार फैसले लेने की इजाजत है। अदालत ने आगे कहा, “अगर कुछ भी नहीं किया जा सकता तो फिर कानून सम्मत है क्या, हम किसी को कानून बनाने भेजेंगे तो क्या देश का गला कट जाएगा।” इस वाक्य को इंग्लिश सिविल वॉर के विनर ऑलिवर क्रॉमवेल ने लिखा है।

कोर्ट ने आगे लिखा कि, “गवर्नर जनरल के फैसले से पाकिस्तान की राजनीतिक और संवैधानिक संस्थाओं के टूटने का खतरा टला।” इसलिए कोर्ट ने गवर्नर जनरल की इस गलती को अनदेखा कर दिया। मेरे मस्तिष्क में अयोध्या का फैसला भी इसी आश्यकता पर भरोसे की सोच से ही निकला है। मुझे इस बात में कोई भी संदेह नहीं है कि आखिर कोर्ट ने यह कहने के बाद भी कि वह नहीं तय कर सकता कि बाबरी मस्जिद को किसी तोड़े गए ढांचे पर बनाया गया, क्यों सारी जमीन मंदिर को देने का फैसला किया।

सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया कि बीजेपी द्वारा बाबरी मस्जिद को गिराया जाना कानून का उल्लंघन था और अपराध था। यह भी मान लिया कि मस्जिद में मूर्तियां रखना भी किसी धार्मिक स्थल को अपवित्र करने जैसा था। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए मस्जिद को अपवित्र करने वालों को सारी जमीन दे दी कि ,”आस्था को न्यायसंगत ठहराना न्यायिक जांच के दायरे से बाहर है। एक बार आस्था स्थापित हो गई, तो कोर्ट को इसा सम्मान करना चाहिए।”

यह अब साफ हो गया है कि न्यायिक तौर पर देश ने वैसा ही किया जैसा कि विश्व हिंदू परिषद और बीजेपी लंबे समय से मांग कर रहे थे। जब मैं 30 साल पहले एक छात्र था, तो हमारे बड़ौदा विश्वविद्यालय में अरुण शौरी आए थे। यह बात बाबरी मस्जिद गिराए जाने से तीन साल पहले की है। शौरी (जो बाद में बीजेपी समर्थक हो गए थे) ने कहा कि मुसलमानों को मस्जिदलेकर कहीं और चले जाना चाहिए, क्योंकि हिंदुओं के लिए तो यह भूमि पवित्र है। अब हम जो करने जा रहे हैं, यह वही बात है, फर्क इतना है कि अब इस पर कानूनी जामा चढ़ा हुआ है।

हमें ध्यान रखना चाहिए कि पाकिस्तानी अदालत ने जो फैसला दिया था, उसके दीर्घकालिक परिणा हुए थे। भारत और पाकिस्तान में हमारा कानून नजीरों पर आधारित होता है। कुछ साल बाद, जब गुलाम मोहम्मद की मृत्यु हो गई, तो उसी कोर्ट ने पाकिस्तान पर जनरल अयूब खां के नेतृत्व में सेना के कब्जे के लिए भी वही दलीलें सामने रखीं। इसके बाद फिर जब जनरल जियाउल हक ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी दी और खुद राष्ट्रपति बन गए, तो कोर्ट ने एक बार फिर इन्हीं दलीलों और नजीर के प्रकास में फैसला सुनाया।

हाल के वर्षों में देखें तो जनरल परवेज मुशर्रफ ने भी खुद को इन्हीं नजीरों के आधार पर वैधता दिलवाई। सभी तानाशाहों ने अपने लिए एक कानूनी कवच तैयार किया और उनके सारे कृत्य कानूनी और वैध हो गए।

अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आने वाले वक्त में क्या प्रभाव पड़ेंगे, यह तो समय ही बताएगा। लेकिन, यह तय है कि इसके प्रभाव तो होंगे। और हम उम्मीद करें कि इन प्रभावों से उतना नुकसान नहीं होगा जितना कि पाकिस्तान का हुआ है।

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