कृषि कोई रंगमंच नहीं जो महज भाषण देने भर से जैविक खेती की ओर रुख कर लेंगे किसान
किसान रसायनों से छुटकारा पाना चाहते हैं, उन्हें उपदेश देने की कोई जरूरत नहीं है। वे बस इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए व्यवस्थित नीतिगत समर्थन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव निबट जाने और असम तथा पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत सुनिश्चित हो जाने के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फैसला किया कि अब भारतीयों को पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध से उत्पन्न होने वाले मूल्य झटकों और अन्य संकटों के लिए तैयार रहने को कहने का समय आ गया है। हमेशा की तरह, उन्होंने त्याग का भार नागरिकों पर डाला - सोना न खरीदें, तेल का कम इस्तेमाल करें, घर से काम करें… और फिर वही जुमले-अनुशासन, संयम और कुर्बानी।
उन्होंने किसानों के लिए भी एक सुझाव दियाः '50 प्रतिशत जैविक खेती की ओर बढ़ना’। लेकिन क्या यह बदलाव इतना आसान है?
रासायनिक खेती से जैविक- या टिकाऊ (सस्टेनेब्ल)- खेती की ओर बदलाव में लगभग सात से दस साल लगते हैं। इस लेखक ने देश भर के हजारों किसानों से बातचीत में पाया है कि यह बदलाव कई बड़े झटकों और जोखिमों के साथ आता है - उत्पादन में अचानक गिरावट, मजदूरी में वृद्धि, कीटों का हमला, अनिश्चित संसाधन...
आम सहमति यह है कि उत्पादकता समय के साथ स्थिर हो जाती है, लेकिन बदलाव के लिए निरंतर मार्गदर्शन और ऐसी सेवाओं की जरूरत होती है जो आम तौर पर बाजार में उपलब्ध नहीं होती हैं। भारत में विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में जैविक खेती की लगभग 400 परिभाषाएं मौजूद हैं, फिर भी कृषि वैज्ञानिक समुदाय ने इसे उत्पादन प्रणाली के रूप में अभी तक नहीं अपनाया है।
कुल मिलाकर, जैविक खेती देश में सामुदायिक संगठनों, गैरसरकारी संगठनों, और कुछ मामलों में, अत्यधिक प्रेरित व्यक्तिगत किसानों के माध्यम से फैली है, न कि सार्वजनिक संस्थानों या विश्वविद्यालयों के जरिये।
पहली नजर में, जैविक खेती की ओर बड़े बदलाव का मोदी का प्रस्ताव पर्यावरण की दृष्टि से दूरदर्शी लगता है। भारत का कृषि संकट वास्तविक है - किसान लगभग पिछले तीन दशकों से इससे जूझ रहे हैं। दशकों से रसायनों के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी और भूजल को बुरी तरह से दूषित कर दिया है, जैव विविधता को कम किया है और किसानों को महंगी, संसाधन-प्रधान कृषि प्रणालियों में फंसा दिया है। कुछ गंभीर पर्यावरणविद टिकाऊ कृषि पद्धतियों की तत्काल जरूरत से इनकार नहीं करेंगे।
दरअसल, ऑर्गेनिक कृषि अनुसंधान संस्थान (एफआईबीएल) और इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ ऑर्गेनिक एग्रीकल्चर मूवमेंट्स (आईएफओएएम) ऑर्गेनिक्स इंटरनेशनल की नवीनतम 2026 रिपोर्ट से पता चलता है कि जैविक कृषि 180 से अधिक देशों में लगभग 99 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है, जिसमें 4.8 मिलियन उत्पादक शामिल हैं। वैश्विक जैविक खाद्य बाजार लगभग 145 अरब यूरो तक बढ़ गया है। भारत की 40 लाख हेक्टेयर भूमि के साथ प्रमाणित जैविक किसानों की संख्या दुनिया में सबसे अधिक एक है, हालांकि ऑस्ट्रेलिया में ऐसी 530 लाख हेक्टेयर भूमि है जहां जैविक खेती हो रही है।
रिपोर्ट में उन किसानों को शामिल नहीं किया गया है जो जैविक खेती तो करते हैं, लेकिन प्रमाणित नहीं हैं। उदाहरण के लिए, भारत में लाखों किसान घरेलू खपत के लिए प्रमाणीकरण प्रक्रिया के रूप में सहभागी गारंटी प्रणाली (पीजीएस) का उपयोग करते हैं, इसके अतिरिक्त निर्यात के लिए आम तौर पर तीसरे पक्ष द्वारा प्रमाणीकरण की जरूरत होती है।
भारत, और दुनिया भर में, जैविक खेती समग्र उत्पादन प्रणाली का छोटा-सा हिस्सा है, लेकिन यह बढ़ रही है। उदाहरण के लिए, भारत जैविक कपास के उत्पादन में अग्रणी है। बाजरा के मामले में भी यही स्थिति है। आदिवासी और पिछड़े क्षेत्रों के लाखों छोटे किसान कम रसायनों का उपयोग करते हैं और वास्तव में जैविक खेती करते हैं, लेकिन उन्हें किसी भी महंगी और जटिल प्रमाणन प्रणाली द्वारा प्रमाणित नहीं किया गया है।
लेकिन पहले और दूसरे बिंदु के बीच अंतर पर ध्यान दें। ऑस्ट्रेलिया का दृष्टिकोण व्यवस्थित है, भारत का नहीं। हमारी समस्या नीति है - या कहें कि नीति का अभाव है। किसान रसायनों से छुटकारा पाना चाहते हैं, उन्हें उपदेश देने की जरूरत नहीं है। वे इसके लिए व्यवस्थित नीतिगत समर्थन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (सीएसए) के जी.वी. रामानजनेयुलु सतत कृषि पद्धतियों के प्रबल समर्थकों में से एक हैं। वह कहते हैं कि 'किसानों ने पिछले 20 वर्षों में अपनी आय बढ़ाने और सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने की हरसंभव कोशिश की है।' उन्होंने अपनी फसल संबंधी विकल्पों में बदलाव किए हैं, जैविक खेती सीखी है, समय और धन लगाया है और इस बदलाव के दौरान आने वाले जोखिमों को भी सहा है।
सार्वजनिक संस्थानों और प्रणालियों के आधुनिक, यानी औद्योगीकृत खेती पर अत्यधिक निर्भर होने के कारण, कमजोर जैविक किसान अत्यधिक अस्थिर बाजारों में प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते हैं।
रामानजनेयुलु कहते हैं कि 'भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और कृषि विश्वविद्यालयों को जैविक खेती अनुसंधान और रणनीति को संस्थागत रूप देने के लिए कहा जाना चाहिए। नीति को उन किसानों का समर्थन करना चाहिए जो गैर-रासायनिक कृषि उत्पादन प्रणालियों का अभ्यास कर रहे हैं।'
पिछले 25 वर्षों में, सीएसए (सेंटर फाॅर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर) ने तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में अपने सहकारी समितियों और किसान उत्पाद कंपनियों के तहत किसानों को लगातार संगठित किया है, जिससे उन्हें रासायनिक कीटनाशकों से जैविक या एकीकृत कीटनाशक प्रबंधन प्रणालियों में बदलने में मदद मिली है, जो कि इसके अपने ब्रांड सहज आहारम के तहत है।
फिर भी, चुनौतियां बनी हुई हैं: लाभकारी मूल्य, बाजारों तक पहुंच, गुणवत्तापूर्ण इनपुट, ज्ञान संबंधी सहायता इत्यादि। रामानजनेयुलु का कहना है कि जैविक खेती अपनाने वाले किसानों को समर्थन देने के लिए नीति में कोई बदलाव नहीं आया है - कीमतें, ऋण प्रवाह, इनपुट बाजार स्थिर बने हुए हैं और जैविक खेती के विज्ञान को अभी तक संस्थागत रूप नहीं दिया गया है।
वह कहते हैं कि 'रासायनिक कृषि प्रणालियों के सभी आधार मौजूद हैं - सार्वजनिक संस्थान इसे बढ़ावा देते हैं, बैंक और वित्तीय संस्थान इसमें मदद देते हैं, और बाजार इसे अपना लेते हैं।' किसानों को एक से दूसरी प्रणाली में बदलने के लिए भी इसी तरह के आधारों की जरूरत होती है। वह पूछते हैं कि 'ये कौन उपलब्ध कराएगा? इस बदलाव के लिए किस प्रकार की ज्ञान प्रणालियों की आवश्यकता है? ये महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिनके लिए सरकार के समर्थन और रणनीति की जरूरत है।'
किसी के कहने भर से कोई किसान जैविक खेती नहीं अपना सकता या रसायनों का उपयोग बंद नहीं कर सकता। प्रधानमंत्री को किसानों को नैतिक दायित्व का एहसास कराने और परिवर्तन का भार उठाने के लिए कहने से पहले, नीति और व्यवस्था लागू करनी होगी।
प्रधानमंत्री (और उनके मंत्रिमंडल) को इनमें से कुछ सवालों के जवाब देने होंगे ताकि किसान उनके उपदेशों पर अमल कर सकें। बदलाव की समय-सीमा क्या है? खरीद प्रक्रिया किन ढांचों के तहत होगी? विस्तार प्रणालियों के जरिये क्या होगा? किस प्रकार की वित्तीय सहायता मिलेगी? परिवर्तन के दौरान उपज में होने वाले नुकसान की भरपाई कैसे की जाएगी? प्रमाणन का प्रबंधन कैसे किया जाएगा? भारी कर्ज में डूबे छोटे किसानों का क्या होगा? बदलाव की अवधि में कम उत्पादन की भरपाई राज्य सरकारें कैसे करेंगी? प्रयोग का आर्थिक जोखिम कौन उठाएगा? ये तकनीकी विवरण नहीं हैं। ये दिखावे और क्रियान्वयन के बीच का अंतर हैं।
सबक सीखने के लिए, श्रीलंका से बेहतर उदाहरण और कोई नहीं है। 2021 में, श्रीलंका सरकार ने रासायनिक उर्वरकों के आयात पर अचानक प्रतिबंध लगा दिया और देश को जैविक खेती की ओर अग्रसर किया। इस फैसले को पर्यावरण संबंधी शब्दावली और राष्ट्रीय गौरव के ढर्रे पर पेश किया गया। लेकिन इसके परिणाम विनाशकारी रहे। फसलों की पैदावार में भारी गिरावट आई। चाय उत्पादन को भारी नुकसान हुआ। खाद्य पदार्थों की कमी चरम पर पहुंच गई। महंगाई बेतहाशा बढ़ गई। ग्रामीण क्षेत्रों में संकट गहरा गया।
श्रीलंका में जैविक खेती के प्रयोग से यह सबक नहीं मिलता कि यह असंभव या अवांछनीय है। बल्कि, यह कि कृषि पद्धतियों को रातोंरात सरकारी आदेश से नहीं बदला जा सकता। इन बदलावों के लिए वर्षों की तैयारी, वैज्ञानिक योजना, किसानों से परामर्श, बाजार का पुनर्गठन, परिवर्तनकालीन वित्तपोषण और स्थानीय पारिस्थितिक वास्तविकताओं के अनुरूप विकेन्द्रीकृत अनुकूलन की जरूरत होती है। भारत में कई संगठनों ने इस दिशा में प्रारंभिक कार्य किया है। हम उनके अनुभवों से सीख सकते हैं। सिक्किम ने पूरी तरह से जैविक मॉडल अपनाया, लेकिन राज्य के किसानों को आर्थिक रूप से लाभ नहीं हुआ।
पारिस्थितिकीय परिवर्तन अत्यंत जटिल प्रक्रियाएं हैं जिन्हें मंचों से दिए जाने वाले नैतिक उपदेशों तक सीमित नहीं किया जा सकता। कृषि कोई रंगमंच नहीं है। मृदा (स्वाॅयल) प्रणालियां नारों का पालन नहीं करतीं।
युद्धों से तेल आपूर्ति बाधित होती है, मुद्रास्फीति बढ़ती है, मुद्राएं कमजोर होती हैं, बाजारों में अनिश्चितता फैलती है। ऐसे में सावधानी, संयम, यहां तक कि मितव्ययिता भी जरूरी हो सकती है। लेकिन लोकतांत्रिक नेतृत्व को राजनीतिक दिखावे से अलग करने वाली बात यह है कि क्या बलिदान समान रूप से साझा किया जाता है या चुनिंदा रूप से थोपा जाता है?
अब तक हम जान चुके हैं कि इस शासन को समझने का सबसे विश्वसनीय तरीका यह नहीं है कि हम उसकी बातें सुनें, बल्कि यह है कि हम उसके काम देखें। एक दशक से अधिक समय से, भारत में संरचनात्मक संकटों को बार-बार नागरिकों के लिए नैतिक दायित्वों में तब्दील किया गया है। 2016 की नोटबंदी और 2020 की कोविड-19 महामारी के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए आह्वान को याद कीजिए। अब, भू-राजनीतिक अस्थिरता को सतत कृषि, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता, संसाधन संरक्षण और पारिस्थितिक सुधार जैसे गंभीर राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय, मितव्ययिता पर एक और उपदेश में तब्दील किया जा रहा है। यह जिम्मेदारी पहले से ही कमजोर नागरिकों पर नहीं डाली जा सकती।
(जयदीप हार्दिकर नागपुर निवासी वरिष्ठ पत्रकार और 'रामरावः द स्टोरी ऑफ इंडियाज फार्म क्राइसिस’ पुस्तक के लेखक हैं)
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