प्रधानमंत्री के नाम पत्र: जनगणना में अंतरजातीय कॉलम का प्रावधान करने की अपील

जनगणना और सर्वेक्षणों में आमतौर पर धर्म और जाति के कॉलम पहले से तय हैं, लेकिन इनमें काफी कमी है, जिसमें बदलाव की आवश्यकता है। इसी को लेकर प्रधानमंत्री के नाम एक पत्र जिसमें जनगणना के दौरान अंतरजातीय कॉलम के प्रावधान की अपील की गई है

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अनिल चमड़िया

माननीय प्रधानमंत्री,

आप जानते हैं कि दुनिया भर में लोगों के बीच में पैदा किए गए कृत्रिम भेदभाव के खिलाफ लोग जागरूक हो रहे हैं। हम सब ने यह देखा है कि पहले सरकारी व गैर सरकारी दस्तावेजों में किसी भी नागरिक से लिंग के आधार पर सिर्फ यह पूछा जाता था कि वह पुरुष है या स्त्री। लेकिन चेतना के विस्तार के साथ स्त्री, पुरुष के अलावा अन्य के लिए भी कॉलम के प्रावधान किए गए हैं। जेंडर की शिक्षा लेने वाली एक छात्रा ने मुझे बताया है कि जेंडर की कम से कम इतनी पहचान सामने आई है- Queer,Gender fluid, Trans persons - trans man, trans woman, Intersex, Cisgender, Non-binary आदि। इसके साथ भी विकल्प है कि यदि कोई अपनी लैंगिग पहचान न बताना चाहें तो उसकी भी उसे स्वतंत्रता है।

हमने यह भी देखा है कि किसी नागरिक से यह पूछा जाता था कि वे किस धर्म से जुड़े हैं । इसमें धर्मों के नामों की एक छोटी सूची डाली जाती है जबकि लोगों के बीच में धर्मों की सूची लंबी होती है। बहरहाल धर्मों की सूची के विवाद को यहां छोड़ दें। हमने उन लोगों के लिए कॉलम की व्यवस्था करने की मांग को पूरा करने का एक लंबा अभियान चलते देखा है, जिससे कि किसी भी घोषित धर्म को नहीं मानने वाला व्यक्ति उसी रुप में बेझिझक अपनी पहचान जाहिर कर सके। नास्तिक कॉलम को इसी तरह से सरकारी व गैर सरकारी दस्तावेजों में जगह मिली है। और जहां नहीं मिली है उसके लिए लोग संघर्ष कर रहे हैं।

हमने यह भी देखा है कि सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर किसी बच्चे को उसके पिता का नाम जाहिर करने के लिए दबाव नहीं डाला जा सकता है।

लोगों के बीच में भेदभाव पैदा करने वाले तमाम तरह के कृत्रिम भेदभाव के खिलाफ चेतना के विस्तार के रुप में आप इन उदाहरणों को देख सकते हैं। यहां तक कि किसी बच्चे को पिता अपना जाति पहचान वाला सरनेम भी लगाने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है। बच्चे अपनी मां का भी सरनेम इस्तेमाल कर सकते हैं।

लेकिन हमने भारतीय समाज में वर्ण/जाति आधारित व्यवस्था में गहरी जड़ता महसूस की है। आपको यह बताने की जरूरत नहीं जान पड़ती है कि भारतीय भूभाग में सामाजिक स्तर पर एक नए तरह के भेदभाव के शिकार तीन हजार वर्षों से ज्यादा समय से है। यहां के लोगों के बारे में माना जाता है कि वे चार वर्णों के बीच हजारों जातियों में विभाजित हैं। उनके बीच जन्म के आधार पर एक दूसरे से ऊंचा-नीचा होने की व्यवस्था भी यथावत बनी हुई है। सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर भारतीय समाज के सदस्य नागरिकों से यह जानकारी पूछी जाती है कि वे किस जाति या जातिवर्ग के हैं। भारतीय संघ की केन्द्र सरकार व प्रदेश सरकारों ने अपने स्तर पर जातियों को चार वर्गो के बीच विभाजित किया है। इनमें सामान्य (जनरल) , अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति हैं। अन्य पिछड़ा वर्ग व अनुसूचित जाति को भी सरकारों ने दो या उससे ज्यादा हिस्सों में बांटा है।


हमने यह महसूस किया है कि किसी भी सरकारी व गैर सरकारी दस्तावेजों में व कई स्तरों पर होने वाले सर्वेक्षणों व जनगणना में यह विकल्प दिया जाता है कि नागरिक किस जाति समूह के सदस्य हैं। सामान्य का भी जो विकल्प है वह वास्तव में उस शब्द के अर्थों के अनुरूप नहीं है । हम यह देखते हैं कि सामान्य की सूची में कुछ जातियों के नाम दर्ज किए जाते हैं ।

बिहार सरकार की एक वेबसाईट पर सामान्य का विकल्प वहां उन जातियों की सूची से भरा है जिनकी आमतौर पर भारतीय समाज में पहचान सवर्ण या ऊंची जाति के रुप में हैं। यानी जो खुद को अन्य पिछड़ा वर्ग का नहीं मानता, खुद को अनुसूचित जाति व अनुसूचित जन जाति का नहीं मानता, उसके सामने सामान्य वर्ग का विकल्प चुनने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।

मैं यह समझता हूं कि सरकारी सूचियों में जातियों के जो नाम दर्शाए गए हैं, उनके अलावा कई जातियां हैं जो कि सरकारी सूची में नहीं है। लेकिन मैं यहां उन जातियों की सूची को लेकर भी कोई बात नहीं करना चाहता।

मैं उन लोगों की बात करना चाहता हूं जो कि इन चारों श्रेणियों में खुद को शामिल नहीं पाते हैं। इसके कई आधार है जो कि आपके समक्ष रखना चाहता हूं।

  • पूरी दुनिया की तरह भारतीय समाज में भी मनुष्य जाति के बीच काफी उथल पुथल हुई है। एक जगह से दूसरी जगह पर जाने का सिलसिला तेज होता चला गया है। खासतौर से आवागमन की सुविधाओं ने इस गति को अकल्पनीय स्तर पर संभव बनाया है। इस तरह भारतीय समाज में एक जाति का दूसरी जाति के साथ मिश्रण की प्रक्रिया तेज हुई है। सामाजिक अध्येता बताते हैं कि शायद ही कोई जाति हो जिसके सदस्य इस मिश्रण की प्रक्रिया से नहीं गुजरे हो। एक अन्य सामाजिक विकास की स्थिति देखने को मिली। मसलन राजस्थान से जो काम धंधे की तलाश में कई जातियों के सदस्य दूसरे प्रदेशों में गए, वह सांस्कृतिक तौर पर राजस्थानी रहे और उन्हें उस प्रादेशिक समाज में एक विशेष सांस्कृतिक जाति के रुप में देखा गया। भाषा, खान पान, पहनावा यानी संस्कृति ही उनकी जाति पहचान हैं। लेकिन सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर जिस वर्ण व्यवस्था आधारित सामाजिक जाति की पहचान जाहिर करने की बाध्यता होती है वहां उनके लिए अपनी यह जातीय पहचान स्थापित करना संभव नहीं होता है।

  • आपको यह भी बताने की जरूरत नहीं है कि भारतीय समाज में जातिवाद के खिलाफ लोगों में जागरूकता बढ़ी है। आंकड़े बताते हैं कि भारतीय समाज में हर वर्ष जितनी शादियां होती है उनमें दस फीसदी शादियां वैसी होती है जिनमें शादी करने वालों की सामाजिक जाति की पहचान एक दूसरे से भिन्न होती है, जिन्हें अंतर जातीय विवाह के रुप में पहचान मिलती है। अंतर धार्मिक विवाहों की भी संख्या लगातार बढ़ रही है। लेकिन हम यह पाते हैं कि अंतरजातीय विवाह करने वाले किसी भी नागरिक के सामने सरकारी सूची के अनुसार चार जाति/वर्ण वर्गों में से किसी एक का चयन करने की बाध्यता होती है। हम उन्हें एक तरह से किसी एक जाति के रुप में अपनी पहचान बनाने की एक बाध्यकारी स्थिति बनाए हुए है।


मैं आपसे यह अपील करता हूं कि आप यह एक तमाम तरह के दस्तावेजों व जनगणना, सर्वेक्षण में प्रावधान करने की व्यवस्था सुनिश्चित करें कि कोई भी व्यक्ति अपनी जाति की पहचान जाहिर करने के लिए बाध्यकारी स्थिति में नहीं हो। यह संविधान की भावनाओं और उद्देश्यों के भी विरुद्ध हैं। अपील यह है कि जहां कहीं भी सरकारी सूची के अनुसार चार वर्गों वाली सूचियों में से किसी एक वर्ग के सदस्य होने की बाध्यकारी व्यवस्था है, उसकी जगह पर अन्य विकल्प दिए जाए।

  • एक इनमें से कोई नहीं। यानी सरकारी सूची के अनुसार चार जाति/वर्णों में विभाजित जातियों से बाहर खुद को कोई भी बताने के लिए स्वतंत्र हो। जैसे कि धर्म की सूची से बाहर होने की स्वतंत्रता है।

  • विकल्प के तौर पर यह भी दिया जा सकता है जिसमें कि कोई खुद को अंतरजातीय जाहिर कर सकें।

आपसे यह आशा करता हूं कि समाज में प्रगतिशील मूल्यों को बनाने और स्वस्थ दिशा में उसकी उन्नति को सुनिश्चित करने के लिए इस तरह के प्रावधानों की तत्काल व्यवस्था करने की दिशा में वैधानिक स्तर पर पहल करेंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शोधकर्ता हैं। इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं)

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