दिल्ली की सड़कों पर स्त्री शक्ति का असाधारण सैलाब

कोई तंत्र कितना खराब हो सकता है कि महिलाएं पुलिस की बसों से बाहर न निकलने का विकल्प चुनने लगें? कुछ महिलाओं ने घर जाने के लिए हिरासत वाली बसों को ही बेहतर समझा, उनका कहना था कि रात में दिल्ली की सड़कों के मुकाबले ये बसें उन्हें ज्यादा सुरक्षित हैं।

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दिल्ली में अक्टूबर के विरोध-प्रदर्शनों की शुरुआत चुनावी जवाबदेही की मांग के साथ हुई, लेकिन जल्द ही यह महिलाओं की सार्वजनिक मौजूदगी के अधिकार, और उससे भी आगे, अपनी शर्तों पर वहां होने के हक़ के एक मुखर आंदोलन में तब्दील हो गया।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और ध्वस्त चुनावी तंत्र के खिलाफ शुरू हुआ यह प्रतिरोध, राजधानी में यौन हिंसा के खिलाफ और महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक समानांतर आंदोलन में तब्दील हो गया। इसने वोट देने के अधिकार को, घर तक सुरक्षित वापसी, विरोध करने, खुलकर हंसने, पसंदीदा कपड़े पहनने या महज़ खुलकर गुस्से का इज़हार करने के अधिकारों के साथ जोड़ दिया।

यह ‘फेमिनिनोमेना’ (अमेरिकी सिंगर चैपल रोआन के 2022 के प्रसिद्ध पॉप गीत से लिया गया शब्द) अपने आप में एक बड़ी सांस्कृतिक परिघटना बनकर उभरा, जब दिल्ली की सड़कों पर ऐसी महिलाएं, क्वीयर और नॉन-बाइनरी (पुरुष या महिला की महज़ दो श्रेणियों में न बंटने वाले) लोग, छात्र, पत्रकार और पहली बार वोट देने वाले युवा एक साथ नज़र आए जो खुद की उपेक्षा से तंग आ चुके थे।

यह विरोध प्रदर्शन एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया में हुई गड़बड़ियों को लेकर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के साथ शुरू हुए थे, जिसमें करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। लेकिन जब 3 अक्टूबर को प्रदर्शनकारी दिल्ली में इकट्ठा हुए, तो तीन महिला पत्रकारों के साथ यौन उत्पीड़न के आरोप सामने आए। 10-11 अक्टूबर के सप्ताहांत पर यह कार्रवाई अपने चरम पर पहुंच गई, जब दिल्ली पुलिस ने हजारों लोगों को हिरासत में ले लिया और नई दंड संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 के तहत मिले आदेशों का हवाला देते हुए जंतर-मंतर की हर तरफ से घेराबंदी कर दी।

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विरोध प्रदर्शनों का यह दौर ‘जंतर मंतर 1.0’ (जिसके कारण धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा) की तुलना में कहीं ज्यादा स्पष्ट रूप से लिंग-आधारित था। एक महिला पत्रकार ने हिरासत में लेने की कोशिश करते समय दिल्ली पुलिस के एसीपी विवेक भगत पर उनके साथ मारपीट का आरोप लगाया। आरोप के अगले ही दिन एसीपी भगत का प्रमोशन आदेश आ गया, हालांकि बाद में जांच पूरी होने तक इस आदेश को रोक दिया गया।

प्रदर्शन में शामिल अन्य कई महिलाओं ने भी पुलिसिया बर्ताव को लेकर आरोप लगाए। महिलाएं चाहे वह आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा हों, कैमरे के सामने पुलिसिया छेड़छाड़ का शिकार हुईं पत्रकार, या सड़कों पर गुंडों द्वारा पीछा की जाने वाली, धमकाई जाने वाली और दुर्व्यवहार झेलने वाली महिलाएं, सब उन्हीं खतरों का सामना कर रही थीं, जिनसे बचने की सीख उन्हें बचपन से मिलती है। पुलिसिया बर्ताव बता रहा था, मानो प्रतिरोध करना ही अपने आप में अपराध था, जिसके लिए उन्हें सजा मिलनी चाहिए।

यह मुहिम चल रही थी, उसी समय दिल्ली विश्वविद्यालय के महिला कॉलेजों की छात्राएं आस्था कुंज पार्क में 17 साल की एक लड़की के साथ उसके जन्मदिन पर हुए गैंगरेप के खिलाफ सड़कों पर थीं। हालांकि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कमियां मानीं, लेकिन छात्राएं जानती थीं कि कागज़ों पर मौजूद ‘पिंक फोर्स’ ज़्यादा कुछ नहीं करने वाली। इसी का नतीजा नारों की वह नई ईजाद थी जो ‘एक कचौरी, दो समोसा/ इन मर्दों का क्या भरोसा’ जैसे शब्दों में अचानक फ़िज़ा में छा गई।

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एक युवा प्रदर्शनकारी के हाथ की वह तख्ती याद है जिस पर लिखा था, ‘सबसे धाकड़ लड़कियां बदलाव चाहती हैं।’ 

तर्क दिया जा सकता है कि संदर्भ से काटकर देखने पर, सामान्यीकरण करने वाले ऐसे नारे सभी पुरुषों को अनुचित तरीके से लक्षित करते हैं, लेकिन फिर महिलाओं का जवाब शायद यह होगा कि वे तो असल में नरमी ही बरत रही हैं, क्योंकि बरसों से सड़क पर होने वाले उत्पीड़न, यौन हमले, पीड़ित को ही दोषी ठहराने, नैतिक पहरेदारी और संस्थागत उदासीनता जैसी बातों को कुछ रोचक तुकबंदियों के साथ इन पीले पुलिसिया बैरिकेड्स पर खड़े होकर नारे ही तो लगा रही हैं।

ये वही पुरुष हैं जो महिलाओं के प्रति नफरती बकवास और उन्हें नीचा दिखाने वाली एआई जनित तस्वीरें फैलाते हैं और महिलाओं के ऐतराज जताने पर ऐसा नाटक करते हैं जैसे उन्हें कुछ पता ही न हो। उस वीडियो पर नज़र डालें जहां गले में केसरिया कपड़ा डाले एक शख़्स ऐसे नारे लगाने वाली महिलाओं को ‘सस्ती’ बता रहा है, जो ‘खुद को 300 रुपये में बेच देती हैं’।

जुलाई के आखिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विरोध-प्रदर्शनों के दौरान महिलाओं द्वारा अपशब्दों के इस्तेमाल को एक ‘सांस्कृतिक आघात’ बताया और फिर उन्होंने उन्हें ‘माफ़’ भी कर दिया। पुणे में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ऐसे अहंकारी रवैये इस प्रतिगामी / दकियानूसी सोच पर सवाल उठाते हुए, महिलाओं के प्रति इन विचारों की जड़ में ‘मनुस्मृति’ को बताया।

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युवा महिलाएं मोदी की थोपी गई माफी और राहुल गांधी के ‘पितृसत्ता को ध्वस्त करने’ के आह्वान से आगे देख रही हैं। वे किसी भी राजनीतिक पार्टी की ‘पोस्टर गर्ल’ बनने को तैयार नहीं हैं। उन्हें पता है कि नारीवादी शब्दावली का इस्तेमाल चुनावी प्रचार के लिए किस तरह होता है, जबकि सरकार असहमति पर नज़र रखने के लिए एआई-युक्त कैमरों और निगरानी के अन्य तरीके अपनाती है। उनका सबसे ज़्यादा ग़ुस्सा उत्पीड़न और यौन हिंसा की रिपोर्टों पर कोई ठोस प्रतिक्रिया न मिलने पर है। इसलिए, वाई2के स्टाइल के कपड़ों और बड़ी-बड़ी चूड़ियों में सजी ये ‘बैडीज़’ सड़कों पर उतरी हैं, ताकि किसी भी राजनीतिक दल में मौजूद पितृसत्ता को चुनौती दे सकें।

10 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में दक्षिणपंथी सोच वाले कुछ पुरुषों ने विरोध प्रदर्शन कर रही महिलाओं को परेशान कर वहां से खदेड़ दिया, लेकिन उन्हें बिना किसी बाधा के निकल जाने दिया गया। गनीमत रही कि आस्था कुंज में एक बच्ची से बलात्कार करने वाले 30-35 साल के पुरुषों को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन महिलाएं, चाहे वे युवा हों या बुजुर्ग, मांग कर रही हैं कि इससे पहले कि ऐसे मौखिक उत्पीड़न यौन हमले में बदल जायें, सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

बीएनएसएस (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता), 2023 की धारा 43(5) कहती है कि आम तौर पर महिलाओं को सूर्यास्त और सूर्योदय के बीच गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। ऐसा केवल विशेष परिस्थितियों में और प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति से ही हो सकता है। यह भी कि गिरफ्तारी महिला पुलिस अधिकारी को ही करनी चाहिए।

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इसके बावजूद, एक वायरल रील में विरोध प्रदर्शन करते-करते गला ख़राब कर चुकी एक युवती रात 11 बजे अपने बिस्तर पर बैठी दिखी, जिसका परिवार इस बात से चिंतित था कि बाहर खड़ी पुलिस गाड़ी उसे उसके लोकतांत्रिक अधिकार, विरोध प्रदर्शन करने के लिए गिरफ्तार करने आई है। अब यह ऐसा काम तो नहीं जिसे ‘विशेष परिस्थिति’ कहा जा सके।

फिर भी, कोई तंत्र कितना खराब हो सकता है कि महिलाएं पुलिस की बसों से बाहर न निकलने का विकल्प चुनने लगें? कुछ महिलाओं ने घर जाने के लिए हिरासत वाली बसों का सहारा लेना बेहतर समझा; उनका कहना था कि रात में दिल्ली की सड़कों की तुलना में ये बसें उन्हें ज्यादा सुरक्षित लगीं।

इस बीच, जंतर-मंतर जा रही कुछ महिलाओं को दिल्ली पुलिस ने कथित रूप से रोका लेकिन इनमें से सिर्फ हिजाब वाली महिलाओं को हिरासत में लेते हुए उनके फोन जमा करा लिए गए, हालांकि कुछ पत्रकारों के पहुंचने पर इन्हें छोड़ दिया गया। ट्रांस और नॉन-बाइनरी लोगों, जिनमें अरुणाचल प्रदेश की ‘प्रोटेस्ट दिवा’ लोबसांग रिबा भी शामिल थीं, ने इन प्रदर्शनों में एक नया रंग, विविधता और एक बिल्कुल नया आयाम जोड़ दिया।

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विरोध प्रदर्शनों की कुछ सबसे विचलित करने वाली तस्वीरों में महिला पुलिस अधिकारियों द्वारा महिला प्रदर्शनकारियों को सड़क पर घसीटते हुए देखना है। उनकी मौजूदगी पितृसत्ता को चुनौती तो क्या, उसे खत्म करने की दिशा में भी कोई भूमिका नहीं निभाती; सिंदूर लगाए ये महिला पुलिस अधिकारी खुद एक पुरुष-प्रधान व्यवस्था का हिस्सा हैं, और इनकी मौजूदगी असल में उसी व्यवस्था को और मजबूत करती है।

इसी तरह, ‘नॉट.ए.जर्नलिस्ट’ (not.a.journalist) के पत्रकार समदीश भाटिया द्वारा जारी एक वीडियो में, खासी घबराई हुई एक महिला, जिसकी कुर्ती पुलिसिया सख्ती में फट गई है- हताशा में चिल्लाकर कहती है: “हम विरोध ऐसे ही तो नहीं करते हैं।”

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