जम्मू में भी फूटने को है गुस्सा, क्या यहां उल्टा पड़ेगा केंद्र का दांव ! 

राजनीतिक मोर्चे पर जम्मू के अपने गढ़ में बीजेपी के लिए चुनौती अभी शुरू ही हुई है। हालांकि विशेष दर्जे की समाप्ति ‘कश्मीर में अलगाववाद और ब्लैकमेल की राजनीति की समाप्ति’ के तौर पर प्रचारित की जा रही है, फिर भी, लोग असमंजस में हैं कि उन्हें क्या हासिल हुआ है।

फोटो: सोशल मीडिया
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आशा खोसा

न तो जम्मू के घरों के ड्राइंग रूम्स में बहुत बड़े बदलाव को लेकर कोई बातचीत हो रही है, न सड़कों पर उत्साह और उल्लास का कोई भाव है। वजह भी है। एक वकील ने इसे इस तरह बताया, “हमारे जीवन में एक तरह की अनिश्चितता का भाव है।“ करीब तीसेक साल की उम्र में इन अधिवक्ता महोदय को तब अपने अभिभावकों के साथ कश्मीर छोड़ना पड़ा था जब आतंकियों ने उनके एक निकट संबंधी की हत्या कर दी थी और हाथ से लिखी एक लिस्ट उनके घर की दीवार पर चिपकी मिली थी जिसमें इन अधिवक्ता महोदय के पिता का नाम भी था।

उन्होंने जम्मू से टेलीफोन पर बताया, “हमने बड़ी मेहनत की और काफी जद्दोजहद के बाद यहां बसे, ऐसे में, अनुच्छेद 370 हटाए जाने के फैसले के बाद मैं भरोसे के साथ नहीं कह सकता कि स्थानीय (जम्मू डोगरा) लोगों के साथ हमारे रिश्ते पहले की तरह ही बेहतर रहेंगे।“

हिंदू बहुल जम्मू में जीवन सामान्य होने लगा है लेकिन इलाके में सुलग रही नाराजगी के फूटने का अभी इंतजार है। इसे अश्विनी शर्मा बताने की कोशिश करते हैं। वह शिमला में रहकर पत्रकारिता करते हैं। उनका घर जम्मू शहर से 25 किलोमीटर दूर कारलूप गांव में है। वह इन दिनों अपने परिवार वालों से मिलने आए हुए हैं। उनका कहना है, “मेरा परिवार चिंतित है कि पंजाब से धनी-मानी लोग आएंगे और हमारी जमीन खरीद लेंगे और हमारा रोजगार भी ले लेंगे।“ उनके गांव में भी अनुच्छेद 370 हटाने का उत्सव नहीं मनाया गया।

अश्विनी के पिता 89 साल के हैं। वह उन दिनों की याद करते हैं जब शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह सरकार के भूमि सुधार-संबंधी आदेश से उनके परिवार ने धान उपजाने वाली 70 फीसदी जमीन खो दी थी। उस बुजुर्ग ने अपने बेटों से कहा कि जो बची हुई जमीन है और जिस पर वे लोग खेती करते हैं, अब आशंका है कि यह भी उन लोगों को खोना पड़ सकती है।

नरेंद्र मोदी सरकार को यह बात फिर से देखनी होगी कि उसने जो ऐतिहासिक फैसला किया है, उसे लागू करने में अलगाववादियों और आतंकियों की वजह से सिर्फ कश्मीर में ही दिक्कतें आएंगी। जमीनी स्थिति यह है कि जम्मू और लद्दाख पर भी समान रूप से नजर रखनी होगी। भंग विधानसभा के स्पीकर रहे निर्मल सिंह-जैसे वरिष्ठ बीजेपी नेता भी जम्मू के लोगों के जमीन पर अधिकार और उनके रोजगार को लेकर गारंटी और सुरक्षा की बात उठाने लगे हैं। उन्होंने इस लेख की लेखिका से कहा, “हम जानते हैं कि बंदूक के भय से निवेशक तुरंत कश्मीर नहीं जाएंगे और वहां हिंसा होती रहेगी; वे जम्मू में झुंड लगा देंगे और ऑफिस बनाने तथा बिजनेस खड़ा करने के लिए जमीन खरीदने की कोशिश करेंगे। इसलिए यह इस इलाके के लिए मिश्रित स्थिति वाला फैसला है।“ वैसे, उन्हें यह भी लगता है कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने से जम्मू के लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। इसलिए अगर स्थिति स्पष्ट नहीं होती है, तो बीजेपी को चुनावों में भारी शर्मिंदगी भी उठानी पड़ सकती है।

वैसे, जम्मू में ईद उत्साह से मनाई गई। डोडा और पुंछ में भी सामान्य स्थितियां रहीं। इनसे प्रशासन ने राहत की सांस ली। ये दोनों ऐसे इलाके रहे हैं जिन्हें अलगाववादी और मुख्यधारा के नेता मुसलमानों और हिंदुओं को अपने-अपने खेमे में शामिल करने के लिए लुभाने की प्रयोगशाला बनाते रहे हैं। इस वजह से समय-समय पर झड़पें होती रही हैं और तनाव भी फैलता रहा है। लेकिन राजनीतिक मोर्चे पर जम्मू के अपने गढ़ में बीजेपी के लिए चुनौती अभी शुरू ही हुई है। हालांकि विशेष दर्जे की समाप्ति ‘कश्मीर में अलगाववाद और ब्लैकमेल की राजनीति की समाप्ति’ के तौर पर ही देखी जा रही है, फिर भी, लोग असमंजस में हैं कि उन्हें क्या हासिल हुआ है।

बीजेपी के एक नेता ने अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, “जम्मू अलग राज्य बनना चाहता था- कश्मीर से अलग, लेकिन अब हम केंद्र शासित प्रदेश का हिस्सा हैं और हमारा भाग्य कश्मीर से जुड़ा हुआ है।“ सूत्रों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर पर हाल में उठाए गए कदमों पर मोदी-अमित शाह की मुहर लगी तो है लेकिन ‘जम्मूके प्रति अन्याय’ के कारण बीजेपी कार्यकर्ता दुखी हैं।

अगर मोदी सरकार की योजना जमीन पर उतरती है, तो जम्मू-कश्मीर विधानसभा में जम्मू की 5 से 7 सीटें तक बढ़ेंगी। तब यह कश्मीर के बराबर हो जाएंगी। अभी जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 87 सीटें हैं, जिनमें 4 लद्दाख की हैं। लद्दाख अलग केंद्र शासित प्रदेश बन गया है, तो ये सीटें नहीं होंगी। जम्मू के पास अब 2.5 लाख अधिक वोटर होंगे। ये पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थी हैं। नए कानून के मुताबिक, उन्हें राज्य विधानसभा चुनावों में भी वोट देने के अधिकार होंगे। इन शरणार्थियों में अधिकतर संख्या अनुसूचित जाति के लोगों की है। इसलिए उनके लिए एक सीट सुरक्षित किए जाने की संभावना है। कुल मिलाकर, यह फॉर्मूला कश्मीर और जम्मू के बीच संतुलन साधने के प्रयास वाला है और क्षेत्रीय हितों पर आधारित नेताओं और लोगों के बीच रस्साकशी की उम्मीद है।

वैसे, लद्दाख में अनुच्छेद 370 हटाने और उसे अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने के फैसले से उत्साह और उत्सव का माहौल है। फिर भी, मुस्लिम बहुल जिले करगिल ने इसमें भाग नहीं लिया है। ऐसे में, केंद्र शासित प्रदेश के इन दो हिस्सों में आने वाले दिनों में तनाव की आशंका है। राजनीतिक शक्तियों, पदों और संसाधनों में भागीदारी की रस्साकशी जारी रहेगी और लद्दाख के नए क्षेत्र के तौर पर उभरने को प्रभावित करती रहेगी।

मोदी सरकार के लिए प्रमुख चुनौती कश्मीर क्षेत्र से आएगी जहां स्थिति सुरक्षाबलों की भारी उपस्थिति के कारण नियंत्रण में है। वैसे, मोदी सरकार के निर्णय का एक पक्ष है जिसे पूरे इलाके के सभी हिस्सों में लोगों ने पसंद किया है और वह है यह दांव कि ‘भ्रष्टऔर भाई-भतीजावाद को बढ़ाने वालों’ के तौर पर मुख्यधारा के नेताओं को पूरी तरह नकारना। लोग उमर अब्दुल्ला-जैसे नेशनल कॉन्फ्रेंस और महबूबा मुफ्ती-जैसी पीडीपी नेताओं की कमी महसूस नहीं कर रहे हैं। ये लोग हिरासत में रखे गए हैं। वैसे, यह दहशतपूर्ण भी है क्योंकि सरकार ने दोनों पार्टियों की दूसरी पंक्ति के नेताओं को भी गिरफ्तार कर लिया है। इससे लोगों की आवाज उठाने वाला कोई नहीं है। पीडीपी और एनसी नेताओं पर इस तरह की कार्रवाई भगवा पार्टी के लिए खुद को हराने वाला खेल भी हो सकता है।

कश्मीर में कोई राजनीतिक नेतृत्व नहीं होने से इस आशंका की अनदेखी नहीं की जा सकती है कि युवा अपने गुस्से को प्रकट करने के लिए आवेश में सड़कों पर निकल पड़ें। कश्मीर में उबल रहे गुस्से को पाकिस्तान गरमाए रखना चाहेगा और ऐसे में, घाटी पाकिस्तान-समर्थित इस्लामी आतंकी संगठनों के लिए उपजाऊ जमीन बनी रहेगी।

जिस तरह रोम एक दिन में नहीं बना था, जम्मू- कश्मीर और साथ ही लद्दाख में भी, योजनाबद्ध विकास और रोजगार सृजन एकदम से अचानक नहीं होने वाला। क्या बीजेपी के पास उस इलाके के युवाओं के बीच असंतोष से निबटने के लिए कोई कार्ययोजना है जहां बेरोजगारी की दर 40 प्रतिशत तक है? वैसे, यह देश में सबसे ज्यादा है।

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