मोदी सरकार का 'आपदा में अवसर' का एक और कुत्सित खेल!
सुरक्षा के नाम पर बनी विकास की वेदी पर निकोबार के आदिवासियों का अस्तित्व ही खत्म किया जा रहा है।
ग्रेट निकोबार द्वीप समूह हिन्द महासागर के नीले पानी के बीच है। यह हिन्द महासागर में बंगाल की खाड़ी के दक्षिण पूर्वी भाग में स्थित 572 द्वीपों का समूह है। ये द्वीप इंडोनेशिया और थाईलैंड के पास हैं। 2013 में इसे यूनेस्को के जैवमंडल कार्यक्रम (ह्यूमन एंड बायोस्पियर प्रोग्राम) में शामिल किया गया था। यह समृद्ध जैव विविधता और वन्यजीवों की एक असाधारण विविधता का घर है। यह दुनिया में सबसे अच्छी तरह से संरक्षित उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों में से एक है। यहां धरती की सबसे पुरानी आदिवासी आबादी रहती है। इस समय द्वीप की आबादी मात्र करीब 8,000 है।
2004 में सुनामी आने पर सुरक्षा कारणों की दृष्टि से प्रशासन ने तटीय गांवों- खास तौर पर, चिनगेनह, पुलो बाहा, और कोकेओन- के लोगों को अस्थायी शिविरों और पुनर्वास बस्तियों में भेज दिया गया था। यह पूरी तरह अस्थायी व्यवस्था थी। यह भूमि 2004 के सुनामी तक 27 गांवों में निकोबारी लोगों द्वारा आबाद थी जिसके बाद उन्हें फिर से बसाया गया और कैंपबेल बे के पास ऊपरी पूर्वी तट पर राजीव नगर और न्यू चिंगेनह बस्तियों में भेज दिया गया। उस समय इनसे वादा किया गया था कि समय अनुकूल होने, मतलब सभी चीजें व्यवस्थित होने पर वे वापस अपनी जमीन पर आ जाएंगे।
अब सरकार यहां 'आपदा में अवसर' की कुत्सित योजना का खेल खेलने पर आमादा है। केन्द्र सरकार यहां 'ग्रेट निकोबार होलिस्टिक डेवलपमेंट प्रोजेक्ट' शुरू करने पर आमादा है। इसमें यहां दुनिया के सबसे व्यस्त माल परिवहन बंदरगाहों में से एक के रूप में परिकल्पना की गई है। इस परियोजना में एक ऐसा हवाई अड्डा शामिल है जो सबसे बड़े वाणिज्यिक विमानों को भी उतरने की सुविधा प्रदान करेगा, साथ ही 35 लाख की प्रारंभिक आबादी के लिए एक टाउनशिप, एक विद्युत संयंत्र और 'पर्यटक रिसॉर्ट्स’ के लिए निर्धारित क्षेत्र भी शामिल हैं। इसकी लागत 92,000 करोड़ बताई गई है। बाहर से लाकर यहां की आबादी बढ़ाकर 6.5 लाख करने की योजना है। यही नहीं, यहां 130 वर्ग किलोमीटर का जंगल काटकर उसकी भरपाई हरियाणा या मध्य प्रदेश में पेड़ लगाकर की जाएगी।
पर्यावरण की चिंता को ध्यान में रखते हुए, नाजुक अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के लिए यह परियोजना अकल्पनीय है। इस परियोजना में पर्यावरण संबंधी स्वीकृतियां को चुनौती देने वाली याचिकाएं राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) की एक पीठ के समक्ष लंबित हैं। पीठ ने पिछले साल नवंबर में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। वन संबंधी स्वीकृतियों को कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है जहां इस मामले की अंतिम सुनवाई 30 मार्च से शुरू होने वाले सप्ताह में होगी।
यहां ग्रेट निकोबार जनजातीय परिषद बने हैं। समुदाय के कल्याण के लिए ये किसी भी आदिवासी समूह की चुनी हुई स्वशासित इकाइयां हैं। स्थानीय स्तर पर बहुतेरी आवाज उठाने के बावजूद न सुने जाने पर इन परिषदों के अध्यक्षों ने दिल्ली आकर मीडिया को बताया कि उनलोगों से द्वीप के पश्चिमी तट पर अपनी पुश्तैनी जमीनें छोड़ देने के प्रमाण-पत्रों पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा जा रहा है, ताकि ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना के विकास को अनुमति दी जा सके। जनजातीय परिषदों की तरफ से बरनबास मंजू ने बताया कि प्रशासन ने उनलोगों को 7 जनवरी को एक बैठक के लिए बुलाया और फिर द्वीप के विकास के समर्थन के रूप में दिखाने के लिए उन्हें सरेंडर प्रमाण-पत्रों पर हस्ताक्षर करने को कहा गया। ऐसा करने से वे 2022 से विरोध कर रहे हैं।
निकोबारी आदिवासियों के विरोध का सबसे बुनियादी और भावुक मुद्दा उनकी पैतृक भूमि है। निकोबारी जनजातीय परिषद का तर्क है कि दो दशकों से वे अपनी इन पैतृक जमीनों पर लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनके लिए ये जमीनें केवल मिट्टी का टुकड़ा नहीं, बल्कि उनके पूर्वजों की समाधियां, उनके पवित्र नारियल के बागान और उनकी सांस्कृतिक विरासत हैं। परिषद का आरोप है कि उन्हें अपनी ही जमीन से हमेशा के लिए बेदखल करने की साजिश रची जा रही है। सरकार की नई योजना के तहत, इन्ही जमीनों पर अब 'कंटेनर टर्मिनल' और 'हवाई पट्टी' प्रस्तावित है।
जनजातीय परिषद ने स्पष्ट किया है कि सुनामी के बाद उन्हें केवल 'सुरक्षा' के लिए हटाया गया था, न कि उन्होंने अपनी जमीन का मालिकाना हक सरकार को सौंप दिया था। परिषद का कहना है कि प्रशासन यह भ्रम पैदा कर रहा है कि आदिवासी अपनी मर्जी से जमीन छोड़ रहे हैं, जबकि हकीकत में उन्हें डराया-धमकाया जा रहा है या विकास का झूठा लालच दिया जा रहा है।
निकोबारी परिषद के विरोध का सबसे मजबूत कानूनी आधार 'अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वनाधिकारों की मान्यता) अधिनियम (पेसा कानून), 2006' है। इसके अनुसार, किसी भी विकास कार्य के लिए ग्राम सभा की 'स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति' अनिवार्य है। परिषद ने केन्द्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय को लिखे पत्रों में आरोप लगाया है कि प्रशासन ने फर्जी तरीके से यह रिपोर्ट दी कि आदिवासियों के अधिकारों का निपटारा कर दिया गया है।
हालांकि निकोबारी परिषद मुख्य रूप से निकोबारी समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन वे 'शोम्पेन' जनजाति के अधिकारों के लिए भी सबसे मुखर आवाज बनकर उभरे हैं। शोम्पेन एक 'विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह' है। शोम्पेन जनजाति बाहरी दुनिया से संपर्क नहीं रखती। परिषद का कहना है कि सरकार जिस 'होलिस्टिक डेवलपमेंट' की बात कर रही है, वह शोम्पेन के प्राकृतिक आवास को नष्ट कर देगा। इतनी बड़ी संख्या में बाहरी लोगों का आना शोम्पेन की संस्कृति और स्वास्थ्य के लिए 'सांस्कृतिक नरसंहार' जैसा होगा। आदिवासियों का यह भी कहना है कि परियोजना लागू होने के बाद वे अपने ही घरों में अल्पसंख्यक हो जाएंगे। इस वक्त द्वीप की आबादी लगभग 8,000 है जबकि परियोजना के तहत इसे बढ़ाकर 6.5 लाख करने की योजना है।
वैसे भी, यह विरोध सिर्फ जमीन या केवल पर्यावरण बचाने का नहीं है। यह पूरा मसला एक प्राचीन सभ्यता के अस्तित्व की पुकार है, यह उनकी पहचान, संस्कृति और कानूनी अधिकारों को बचाने की अंतिम लड़ाई है। केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव को पिछले साल 27 अक्तूबर को लिखे सामूहिक पत्र में 70 विद्वानों, पर्यावरणविदों, पूर्व नौकरशाहों, एक्टिविस्ट और अधिवक्ताओं ने भी कहा था कि इस परियोजना से स्थानीय आबादी को ही नुकसान नहीं होगा, इस इलाके का कोमल इकोसिस्टम नष्ट हो जाएगा, जंगल काटे जाने से प्राचीन प्राकृतिक पर्यावास खत्म हो जाएगा और तरह-तरह के विशालकाय निर्माण से भूगर्भीय तनाव पर गंभीर असर होगा।
सरकार का हास्यास्पद तर्क है कि यहां 130 वर्ग किलोमीटर जंगल के 8.5 लाख से 1 करोड़ तक के जो पेड़ काटे जाएंगे, उसकी भरपाई हरियाणा या मध्य प्रदेश में पेड़ लगाकर की जाएगी। निकोबारी परिषद का कहना है कि निकोबार के वर्षावन वहां की प्रजातियों और समुदायों के साथ लाखों वर्षों के सह-अस्तित्व का परिणाम हैं। हरियाणा का जंगल निकोबार के आदिवासियों को न तो पंडानस का फल दे सकता है और न ही उनके पारंपरिक देवताओं का वास स्थान बन सकता है। सरकार इस परियोजना को चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने और हिन्द महासागर में भारत की शक्ति बढ़ाने के लिए 'अति-महत्वपूर्ण' मानती है। लेकिन जनजातीय परिषद का प्रश्न सीधा है कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा अपने ही नागरिकों के विनाश की कीमत पर हासिल की जानी चाहिए? परिषद ने सुझाव दिया है कि विकास की योजनाओं को उन क्षेत्रों तक सीमित रखा जाए जो जनजातीय रिजर्व से बाहर हैं जबकि मेगा-प्रोजेक्ट के वर्तमान डिजाइन में आदिवासियों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी गई है।
असली सवाल वही है कि विकास किस कीमत पर?
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