विरोधियों को निशाना बनाने को एक और कानून?
जेल से शासन चलाने की प्रथा खत्म करने के मकसद से लाए जा रहे विधेयक में तमाम तरह की कमियां हैं जो वांछित परिणाम नहीं देने जा रहा।

फरवरी के अंत में दिल्ली की एक अदालत ने आबकारी नीति मामले में सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इस नीति के पीछे ‘कोई साजिश या आपराधिक इरादा नहीं था।’ आरोपियों में से एक ने बरी होने से पहले जेल में 530 दिन बिताए। इस मामले में अभियोजन पक्ष की कार्रवाई को दिशा देने वाले ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) ने पिछले दस सालों में नेताओं के खिलाफ 193 मामले दर्ज किए लेकिन कुल जमा दो मामलों में सजा करा पाया, यानी सफलता की दर बामुश्किल एक फीसद!
अब इस पर गौर करें: हलफनामों में अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी देने वाले सांसद 2004 में 24 फीसद थे जबकि 2024 में इनका प्रतिशत बढ़कर 46 हो गया। देश में मौजूदा विधायकों में 45 फीसद पर आपराधिक आरोप हैं; इनमें से 29 फीसद पर हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर आरोप हैं। राजनीति का यह अपराधीकरण एक कड़वी सच्चाई है, जो हमारे लोकतांत्रिक जीवन को खोखला कर रहा है।
यह संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025 अभी संयुक्त संसदीय समिति के पास है। यह विधेयक अनिवार्य करता है कि अगर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्रियों को ऐसे आरोपों में लगातार 30 दिनों तक गिरफ्तार कर हिरासत में रखा जाता है, जिनके लिए पांच साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो तो उनका पद स्वतः जाता रहेगा। इसका उद्देश्य जेल से शासन चलाने की प्रथा को समाप्त करना है। हालांकि, इसका तरीका बेहद गलत है।
लंबित मामले का मतलब
याद रखें कि अदालत में लंबित कोई मामला न तो पुलिस की एफआईआर है, न ही किसी हिस्ट्री-शीटर की फाइल में दर्ज कोई टिप्पणी, और न ही किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी द्वारा दर्ज कराई गई कोई शिकायत। आरोप तभी तय किए जाते हैं, जब जांच-पड़ताल पूरी हो जाए, अदालत ने अपराध का संज्ञान ले लिया हो, और कोई न्यायाधीश स्वतंत्र रूप से यह निर्धारित कर ले कि प्रथमदृष्ट्या मामला बनता है। यह न्यायिक विवेक का विषय होता है। किसी भी ऐसे आपराधिक दाग वाले आम नागरिक को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती।
फिर भी, अलग-अलग पार्टियों के नेता अक्सर तर्क देते हैं कि उनके खिलाफ ऐसे सभी मामले झूठे या राजनीति प्रेरित हैं। बलात्कार, हत्या, अपहरण और जबरन वसूली जैसे जघन्य अपराधों के मामलों में भी ऐसा कैसे हो सकता है?
गलत आधार
इस बिल के साथ दिक्कत यह है कि यह किसी को पद से हटाने के लिए अदालत द्वारा आरोप तय किए जाने के बजाय, गिरफ्तारी- जो कि एक प्रशासनिक कार्रवाई है- को आधार बनाता है। जांच एजेंसियां किसी को दोषी ठहराए बिना या औपचारिक सुनवाई के बिना भी गिरफ्तार कर सकती हैं। मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत, जमानत की शर्तें लगभग नामुमकिन होती हैं। धारा 45 रिहाई के लिए दोहरी शर्तें लगाती है और धारा 24 सबूत देने का बोझ आरोपी पर डाल देती है। गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत तो मुश्किलें और भी ज्यादा हैं। 30 दिनों में जमानत मिलना लगभग असंभव होता है।
इससे एक ऐसी ढांचागत कमजोरी पैदा होती है जिसका फायदा कोई भी सरकार अपने विरोधियों के खिलाफ उठा सकती है। विरोधी मंत्रियों को गिरफ्तार करके, उन्हें जमानत-विरोधी कानून के तहत 30 दिनों तक हिरासत में रखकर उन्हें पद से हटाया जा सकता है। यह तब भी हो सकता है जब किसी अदालत ने मामले की मेरिट की जांच भी न की हो। इस बिल में ऐसे दुरुपयोग के खिलाफ कोई सुरक्षा उपाय नहीं। 244वें विधि आयोग की रिपोर्ट में यह सिफारिश थी कि अयोग्यता तब लागू हो जब किसी सक्षम अदालत द्वारा आरोप तय किए जाएं।
ईडी के ही आंकड़े बता देते हैं कि यह क्यों जरूरी है। एजेंसी की पिछले एक दशक में दोषसिद्धि दर सिर्फ 1 फीसद रही। 2019 से इसकी पीएमएलए दोषसिद्धि दर मुश्किल से 6 फीसद फीसद रही। साफ है, ऐसी एजेंसियों की गिरफ्तारी को किसी के दोषी होने का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता।
दोषसिद्धि दर का विरोधाभास
इसका एक जवाबी तर्क भी है। एनसीआरबी (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) के आंकड़े बताते हैं कि निचली अदालतों में दोषसिद्धि दर चिंताजनक रूप से कम है। पुणे की निचली न्यायपालिका में 2023 में दोषसिद्धि दर केवल 8.8 फीसद थी। जिनपर आपराधिक मुकदमा चला, उनमें से 91 फीसद को बरी कर दिया गया। यदि यह प्रवृत्ति बनी रहती है, तो कोई भी ऐसा कानून जो लंबित अदालती मामलों वाले व्यक्तियों को सार्वजनिक पद धारण करने से रोकता है, बेमानी होगा।
यह कोई मामूली बात नहीं। यह इसके मूल तक जाती है कि भारतीय न्यायिक संदर्भ में एक लंबित मामला वास्तव में किस बात का संकेत है। क्या यह वास्तविक अपराध को दर्शाता है, या अभियोजन और जांच की एक टूटी हुई व्यवस्था को?
इस विरोधाभास का सही जवाब यह नहीं है कि दागी उम्मीदवारों को सार्वजनिक जीवन से बाहर रखने के प्रोजेक्ट को ही छोड़ दिया जाए। सही जवाब यह है कि जो चीजें खराब हो गई हैं, उन्हें ठीक किया जाए। मौजूदा विधायकों के खिलाफ मुकदमों की सुनवाई तेजी से हो, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में और फिर 2017 में कहा था। सीआरपीसी की धारा 321 के तहत ताकतवर नेताओं के खिलाफ केस वापस लेने की सरकार के अधिकार पर रोक लगनी चाहिए। साथ ही, जांच एजेंसियों को अदालतों के सामने सबूतों के मानकों पर खरा उतरना होगा, न कि राजनीतिक दबाव का औजार बनना होगा।
अन्य कमियां
यह बिल अपने ही बताए तर्क पर भी खरा नहीं उतरता। हिरासत से रिहा होने पर मंत्री पद पर दोबारा नियुक्ति की अनुमति अनुच्छेद 75(5ए) और 164(4ए) के प्रावधानों में है। जेल में 30 दिन बिताने के बाद हटाए गए मंत्री जमानत पर उसी पद पर वापस आ सकते हैं, जबकि उन पर लगे आरोप अभी भी लंबित हों। एक छोटी सी रुकावट के अलावा, कुछ भी नहीं बदला। यह बिल सिर्फ मंत्रियों पर लागू होता है, जबकि उन सैकड़ों सांसदों और विधायकों को छोड़ दिया गया है, जिनपर गंभीर आरोप लगे हों। यह बिल दागी उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतरने से रोकने के लिए भी कुछ नहीं करता।
यह असली सुधार नहीं
25 साल से भी ज्यादा समय से संभावित समाधान को कागजों से बाहर नहीं निकाला गया। वोहरा समिति (1993) की सिफारिशें, 170वें और 244वें विधि आयोग की रिपोर्ट के अलावा संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने (2018 में पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन बनाम भारतीय संघ मामले में) संसद से अनुरोध किया कि वह ऐसे उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित करे, जिनके खिलाफ संबंधित चुनाव से कम-से-कम छह महीने पहले मामले दर्ज किए गए हों, और अदालत द्वारा आरोप तय किए जाने के चरण में ही, पांच साल या उससे ज्यादा की सजा वाले अपराधों के आरोप हों। जघन्य अपराधों में दोषी पाए जाने पर अयोग्यता स्थायी होनी चाहिए। साथ ही, राजनीतिक दलों को आरटीआई एक्ट के दायरे में लाया जाना चाहिए। ‘नोटा’ को और मजबूत किया जाना चाहिए।
एडीआर द्वारा 130वें संशोधन के लिए प्रस्तावित नए मसौदे में कहा गया है कि कोई भी मंत्री, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद या विधायक- जिनके खिलाफ अदालत ने 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' की धारा 8(1), (2) और (3) के तहत अपराधों के लिए, या ऐसे अपराधों के लिए जिनमें कम से कम पांच साल की सजा का प्रावधान हो, आरोप तय कर दिए हैं- उन्हें अपने पद से स्वतः ही मुक्त कर दिया जाना चाहिए। यह एक न्यायिक मानक है। विधि आयोग ने भी बार-बार यही सिफारिश की है।
किसी भी लोकतंत्र को न तो राजनीति के अपराधीकरण का बंधक बनाया जा सकता है, और न ही ऐसे कानूनों का, जिनका इस्तेमाल राजनीतिक स्वार्थों के लिए औजार के तौर पर हो सके। 130वें संशोधन का मौजूदा मसौदा जहां एक ओर, राजनीति के अपराधीकरण से निपटने में पूरी तरह बेअसर साबित हो सकता है वहीं दूसरी ओर, इससे कानूनों का दुरुपयोग खतरनाक हद तक बढ़ सकता है।
(अजित रानाडे जाने-माने अर्थशास्त्री हैं। सौजन्य: द बिलियन प्रेस)
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