सीमा पर ‘सैन्य युद्ध’ के अलावा चीन और नेपाल अगर भारत के साथ ‘जल युद्ध’ भी करें तो आश्चर्य नहीं!

नेपाल हमें पानी बढ़ने की सूचना देकर अलर्ट तो करता रहा है लेकिन उसने पहले भी नियंत्रित मात्रा में पानी छोड़ने की कोशिश कभी नहीं की। ऐसे में, सभी मान रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में आई खटास का खामियाजा आम लोगों को भी भुगतना पड़ सकता है।

फोटो: सोशल मीडिया
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शिशिर

सीमा पर सैनिकों के अलावा चीन और नेपाल अगर भारत के साथ ‘जल युद्ध’ भी करें, तो आश्चर्य नहीं। चीन में ज्यादा बारिश के बाद ब्रह्मपुत्र में बाढ़ का खामियाजा अरुणाचल और असम हर साल झेलते ही हैं। इतने वर्षों बाद भी चीन के साथ मिलकर कोई ऐसी व्यवस्था अब तक नहीं की जा सकी है कि वह पानी बढ़ने की सूचना देकर हमें अलर्ट करे। इसलिए चीन उस फ्रंट पर कुछ करे, तो हम अचकचाने के अलावा कुछ नहीं कर सकते। रही बात नेपाल की। नदियों में पानी बढ़ने पर नेपाल वैसे ही पानी छोड़ने में बहुत मुरव्वत नहीं करता था, इस बार उसके साथ जैसी तनातनी चल रही है, उसमें क्या होगा, इसे लेकर सब डरे हुए हैं। नेपाल हमें पानी बढ़ने की सूचना देकर अलर्ट तो करता रहा है लेकिन उसने पहले भी नियंत्रित मात्रा में पानी छोड़ने की कोशिश कभी नहीं की। ऐसे में, सभी मान रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में आई खटास का खामियाजा आम लोगों को भी भुगतना पड़ सकता है।

वैसे, बिहार, अरुणाचल और असम में बाढ़ सालाना रूटीन है। स्थिति से निबटने की तैयारी इस बार भी नहीं है इसलिए सब सिर्फ बर्बादी की सूचनाओं की शुरुआत की प्रतीक्षा है। कोढ़ में ऊपर से खाज यह कि बिहार की नीतीश सरकार ने शहरों में जलभराव से निबटने की तैयारी अब भी शुरू नहीं की है जबकि पिछले साल पटना समेत कई शहर कई दिनों तक डूबे रहे थे।

पिछले साल सितंबर के अंतिम तीन दिनों की बारिश में ही 15 दिनों तक पटना की दुर्गति हो गई थी। उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी तक को रेस्क्यू कर घर से निकालना पड़ा था। जलजमाव के कारण कई बीमार लोगों को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका था। राजधानी में रहने वाले लोगों के करोड़ों रुपये के सामान पानी में सड़ गए। छह-छह फीट पानी दो हफ्ते तक जमा रहने के कारण पटना की ज्यादातर आबादी घर के पहले फ्लोर पर रहने को विवश हुई थी।

इसके बाद अक्टूबर में ही विकास आयुक्त और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के स्तर पर अलग-अलग दिशा निर्देश जारी किए गए। इसमें राजधानी के सभी संप हाउसों की क्षमता को बढ़ाना था। यहां लगे संपों को जमीन से इतना ऊपर करना था कि जलजमाव में ये डूबें नहीं। नालों को गाद से मुक्त करना था। नालों की कनेक्टिविटी को सुधारते हुए इसमें पानी के बहाव की बारिश से पहले जांच करनी थी। इन सभी के साथ बारिश के पानी की निकासी के लिए अस्थायी संप, नाला आदिका प्रावधान करना था। विकास आयुक्त के इन निर्देशों से अलग आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने पूरी तरह डूबे सरकारी अस्पताल- एनएमसीएच, के साथ ही बुरी तरह प्रभावित पीएमसीएच, आईजीआईसी, आईजीआईएमएस, नेत्र अस्पताल और गर्दनी बाग अस्पताल में सामने आई समस्याओं के हिसाब से अलग-अलग समाधान बताते हुए स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए थे।

मान भी लें कि अप्रैल से अब तक कोरोना के कारण काम काज प्रभावित हुआ हो, तब भी अक्टूबर से मार्च तक के छह महीने में भी नहीं के बराबर काम किए गए। बुरी तरह प्रभावित कंकड़बाग निवासी डॉ. दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि “पटना नगर निगम के पास नालों की उड़ाही के अलावा राज्य सरकार के पास बताने के लिए कुछ नहीं है। उड़ाही से क्या कुछ हासिल हुआ होगा, यह तो बरसात में पता चल जाएगा। वैसे, मानसून के आगाज के साथ शहर के विभिन्न इलाकों में जलजमाव की तस्वीर देखकर एक बार फिर डर ही लग रहा है।” इस तरह का डर कदमकुआं, राजेंद्रनगर, पाटलिपुत्रा कॉलोनी के लोगों को तो है ही, बाइपास से सटे 10 साल के अंदर बसे इलाकों में इस आशंका से खौफ की स्थिति है।

नेपाल के साथ तनाव से सहमे हैं 7 जिले

बिहार का आपदा प्रबंधन विभाग भी राज्य के कुल भूमि क्षेत्र के 73 प्रतिशत हिस्से को बाढ़ के नजरिये से कमजोर मानता है। देश में बाढ़ से क्षति का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा बिहार को झेलना पड़ता है और देश की कुल बाढ़ प्रभावित आबादी का 22.1 प्रतिशत हिस्सा इसी राज्य में है। राज्य के 28 जिलों तक बाढ़ पहुंचती है। और, इन सभी के पीछे मूल कारण नेपाल से आया पानी होता है। नेपाल से सटे बिहार के सात जिले- सीतामढ़ी, पूर्वी चंपारण, पश्चिम चंपारण, अररिया, किशनगंज, सुपौल और मधुबनी सबसे पहले इस बाढ़ को झेलते हैं। शिवहर, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मधेपुरा, सहरसा, पूर्णिया, कटिहार से खगड़िया-बेगूसराय तक इसका प्रभाव अक्सर आ जाता है। भारी बारिश की स्थितिमें नेपाल बिहार की कई बारहमासी और गैर-बारहमासी नदियों में जाने के लिए पानी छोड़ता रहा है।

एक निजी बैंक की सीतामढ़ी शाखा में कार्यरत निशांत कुमार कहते हैं कि“गांवों से आने वाले लोग हर साल बाढ़ की चर्चा करते थे लेकिन इस बार लोगों को ज्यादा डर है। लोग कह रहे हैं कि वैसे तो भारत से अच्छे संबंध के कारण नेपाल पानी को कुछ हद तक नियंत्रित कर भी भेजता था लेकिन इस बार क्या होगा- किसी को कुछ नहीं पता।”

चनपटिया के राजीव केसरी भी कहते हैं कि “हमें बाढ़ से बचाव के लिए किसी अच्छी प्लानिंग के जमीन पर उतरने का इंतजार हर साल रहता है लेकिन सरकार अपने स्तर से सिर्फ राहत कार्य में ही पैसे खर्च करती है। राहत के नाम पर क्या होता है, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। यह प्रदेश तो बाढ़ राहत घोटाले के लिए भी जाना जाता है। बाढ़ नहीं रहेगी तो राहत कार्य का बजट भी तो नहीं बन सकेगा।”

दरअसल, जब केंद्र में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार थी तो बिहार के तत्कालीन जल संसाधन मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह कई बार कहते थे कि नदियों को जोड़ने की योजना में केंद्र सरकार मदद नहीं कर रही जिसके कारण बाढ़ का प्रभाव नहीं घट रहा। लेकिन वर्षों से दोनों जगह एक ही सरकार रहने के बावजूद कुछ होता हुआ तो नहीं दिख रहा है।

2016 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण(एनडब्लूडीए) के पास बिहार की तीन परियोजनाओं कोसी-मेची, सकरी-नाटा और बूढ़ी गंडक-नून-बाया गंगा लिंक योजना का मामला अटका था। फिर 2019 की शुरुआत में इस पर भी बात आगे बढ़ने की जानकारी सार्वजनिक की गई। लेकिन अगस्त, 2019 में बिहार की एनडीए सरकार को एक बार फिर कोसी-मेची नदी लिंक योजना को राष्ट्रीय योजना घोषित करने और इस परियोजना के लिए निवेश की स्वीकृति देने की मांग उठानी पड़ी। पूरे 2019 इसी में बीत गया। फिर फरवरी, 2020 में कोसी-मेची लिंक और सकरी-नाटा के लिए प्राक्कलित खर्च करीब 6,100 करोड़ में से 90 फीसदी हिस्सा केंद्र से देने की मांग दोहराई गई। राज्य सरकार का तर्कधरा रह गया कि बाढ़ राष्ट्रीय आपदा है और नदियों को जोड़ने की महत्वाकांक्षी योजना अटल बिहारी वाजपेयी सरकार लाई थी इसलिए केंद्र को इसके लिए 90 फीसदी राशि स्वीकृत करनी चाहिए। अब तक राज्य की एनडीए सरकार केंद्र की एनडीए सरकार से ऐसी घोषण की उम्मीद में ही बैठी हुई है।

Published: 19 Jun 2020, 4:56 PM
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