सोना झरिया का कुलपति बनना बड़ी सामाजिक घटना, केवल आदिवासी नहीं, तमाम वंचितों में जगी उम्मीद

प्रो. सोना झरिया के कुलपति नियुक्त होने का महत्व सोशल मीडिया पर आई प्रतिक्रियाओं से समझा जा सकता है। सोना झरिया की नियुक्ति से यह तथ्य भी सामने आता है कि साढ़े सात प्रतिशत आबादी वाले आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व भी हमारी प्रणाली में संभव नहीं हो सका।

फोटोः सोशल मीडिया
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अनिल चमड़िया

देश के मौजूदा हालात में विश्वविद्यालयों के कुलपति के रुप में एक नियुक्ति एक सामाजिक खुशी की घटना का रुप ले रही है तो इसके क्या मायने निकाले जाने चाहिए ? झारखंड सरकार ने दूमका स्थित सिद्धु कानू मुर्मू विश्वविद्यालय में नई कुलपति के रुप में प्रो सोना झरिया को नियुक्त किया है।

झारखंड जैसे पिछड़े राज्य के दूमका जैसे अपरिचित से जिला मुख्यालय में साधारण से विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति क्या इतनी बड़ी घटना हो सकती है कि सोशल मीडिया के मंचों पर यह एक बड़ी खबर के रुप में छाई रही। देश में विश्वविद्यालयों की संख्या लगभग 800 है, लेकिन शायद ही किसी विश्वविद्यालय में कुलपति के पद पर किसी की नियुक्ति की खबर भी मिलती हो, जब तक कि वह नियुक्ति विवादस्पद न हो।

दरअसल प्रो. सोना झरिया का कुलपति होना वास्तव में एक सामाजिक खबर है । ऐसी खबर जिस पर हजारों हजार की तादाद में प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। बड़ी तादाद में उनकी नियुक्ति की खबर को शेयर किया गया या फारवर्ड किया जा रहा है। लोगों ने मध्यवर्ग के बीच लोकप्रिय किसी नेता और अभिनेता की तरह सोना झरिया की तस्वीरों से सोशल मीडिया को पाट दिया है।

प्रो सोना झरिया जेएनयू की कम्प्यूटर साइंस विभाग की प्रोफेसर हैं। वे अपने विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। लेकिन उनकी कुलपति के रुप में नियुक्ति एक बड़ी सामाजिक खबर इसलिए है, क्योंकि यह दावा किया जा रहा है कि वे देश की पहली आदिवासी महिला हैं, जो कि कुलपति बनी हैं। भारत में कुलपतियों के इतिहास में यह तथ्य शोध का विषय हो सकता है लेकिन मौजूदा दौर का यह एक सच जरूर है कि वे एकलौती आदिवासी महिला कुलपति हैं।

यहां एक सवाल यह किया जा सकता है कि आखिर भारत में विश्वविद्यालयों के कुलपति के लिए आदिवासी और खासतौर से आदिवासी महिलाओं की क्या कभी कल्पना भी नहीं की गई? यहां तक कि आदिवासी महिलाओं की नियुक्ति आदिवासी बाहुल्य राज्यों में भी एक सपना बना रहा है। जैसे दुनिया में महाशक्ति माने जाने वाले अमेरिका जैसे देश में किसी महिला का राष्ट्रपति होना।

प्रो. सोना झरिया के कुलपति नियुक्त होने का क्या महत्व है, यह सोशल मीडिया पर उनकी नियुक्ति के बाद आई प्रतिक्रियाओं में पढ़ा और देखा जा सकता है। विकास की जो परिभाषा है, उसमें वर्चस्व कायम करने की एक धारा चलती रहती है और उसमें समाज की छोटी-छोटी आकांक्षाएं और अपेक्षाएं दफन होती रहती हैं। साढे सात प्रतिशत आबादी वाले आदिवासी समुदाय का भिन्न स्तरों पर प्रतिनिधित्व भी भारत की प्रतिनिधित्व प्रणाली में संभव नहीं हो सका है। यह तथ्य सोना झरिया की नियुक्ति के साथ भी सामने आता है।

झारखंड आदिवासी बहुल राज्य के रुप में बिहार से विभाजित होकर बना और अलग झारखंड राज्य की मांग का आंदोलन भारत की आजादी के आंदोलन जैसा ही पुराना है। झारखंड के गठन के लिए महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, लेकिन सत्ता में भागीदारी के वक्त वे पीछे घकेल दी गईं। अलग राज्य बनने के बाद सत्ता की बागडोर झारखंड में आदिवासी समुदाय के राजनीतिक नेतृत्वों को तो मिली, लेकिन उनमें भी किसी ने आदिवासी महिला को शैक्षणिक संस्थान की बागडोर देने की जरूरत नहीं समझी।

सोना झरिया की नियुक्ति झारखंड की आदिवासी राजनीति में जमीनी स्तर पर आ रहे बदलाव का एक सूचक भी है। केवल राजनीतिक स्तर पर प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व ही किसी समुदाय की बेहतरी के लिए काफी नहीं माना जा सकता है। राजनीतिक प्रतिनिधित्व का यह दायरा विभिन्न स्तरों पर विकेन्द्रित होने की आवश्यकता है और झारखंड की राजनीति में यह बदलाव दिखाई दे रहा है। आदिवासी महिलाओं की सृजनात्मक झमताओं का विभिन्न स्तरों पर उपयोग आदिवासी समुदाय की राजनीतिक सरोकारों का हिस्सा नहीं रहा है।

सोना झरिया की नियुक्ति से केवल आदिवासी महिलाओं के उस हिस्से में ही एक नई आशा नहीं जगी है जो कि विभिन्न स्तर पर नेतृत्व की क्षमता रखती हैं बल्कि विभिन्न आधारों पर तमाम वंचितों के भीतर भी इस नियुक्ति ने एक उत्साह पैदा किया है। यही कारण है कि सोना झरिया की कुलपति के रुप में नियुक्ति एक बड़ी सामाजिक घटना के रुप में सतह पर दिखाई दे रही है।

भारतीय समाज में एक हलचल सी होती है जब कभी समाज का कोई राजनीतिक और सामाजिक कारणों से उपेक्षित वर्ग, समुदाय या समूह के प्रतिनिधित्व के लिए पहल की जाती है। लोकसभा में जब मीरा कुमार को अध्यक्ष बनाया गया, तब उनकी नियुक्ति को लेकर उन लोगों के बीच तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी जो कि वर्चस्व की संस्कृति के पोषक रहे हैं। लेकिन मीरा कुमार और सोना झरिया के बीच एक बड़ा फर्क यह दिखाई दे रहा है कि समाज में वंचित, उपेक्षित वर्ग का हिस्सा संगठित और चेतनाशील हुआ है और उसकी वजह से वर्चस्व की संस्कृति के पोषक का तीखापन अभिव्यक्त होने से बचने लगा है। सोना झरिया की नियुक्ति पर सामाजिक प्रतिक्रियाएं वंचितों की राजनीति के लिए भी संकेत हैं।

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