असम डायरी: अपनी पहचान के धागे सुलझाता लाहे-लाहे चलने वाला असम, लेकिन सांप्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं है नुस्खा

असमिया लोगों की लड़ाई पहचान की लड़ाई है और इसमें सांप्रदायिकता का अंश लगभग नहीं है। सांप्रदायिकता सिर्फ बीजेपी के एजेंडा का हिस्सा है। न ही यह सिर्फ सांस्कृतिक पहचान की या बाहरियों के खिलाफ लड़ाई है जैसा ऊपर से दिखाई देता है। इसके आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक कई आयाम हैं जो बहुत जटिल धागों से उलझे हैं।

रेखांकन : राजेंद्र घोड़पकर
रेखांकन : राजेंद्र घोड़पकर
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राजेंद्र धोड़पकर

हमें उत्तर भारत में जैसी आदत है उसके चलते असम जाने पर कहीं से यह महसूस नहीं होता कि यहां कहीं चुनावी माहौल है। उत्तरी असम के डिब्रूगढ़ में जीवन की गति मंथर है। हमारे यहां माननीय गुड्डू भैया को जिला व्यापार प्रकोष्ठ का महामंत्री बनाए जाने पर जितने होर्डिंग और बैनर लग जाते हैं, उतने यहां विधानसभा चुनावों में नहीं लगते। ध्यान से देखने पर कुछ छोटे-छोटे पोस्टर और पार्टियों के झंडे दिख जाते हैं, बाकी कोई तड़क-भड़क, शोर-शराबा नहीं। यह हम लोगों के लिए एक कल्चरल शॉक की तरह है। असम में एक मुहावरा हमारे छत्तीसगढ़ी मित्रों ने सुनाया- लाहे-लाहे; मतलब असम में सब खरामा- खरामा चलता है; हड़बड़ी और आक्रामकता यहां के स्वभाव में नहीं है।

होटल में हमारी मुलाकात हमारे मित्र छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के प्रेस सलाहकार रुचिर गर्ग से होती है। वह लगभग ढाई महीने से डिब्रूगढ़ में मोर्चा संभाले बैठे हैं। रुचिर का कहना है कि सादगी और शालीनता असम के स्वभाव में है। उनके लिए भी यह कल्चरल शॉक था कि इतने दिनों में उन्होंने सड़क पर किसी को अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते नहीं सुना। अगर राजनीति के बारे में बात की जाए तो भी असमिया लोग बहुत संकोच के साथ ही बोलते हैं, हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि लोग अराजनीतिक हैं- एक हद से आगे उनका राजनीतिक स्वभाव विस्फोटक भी हो सकता है।

उत्तरी असम सबकी दिलचस्पी का केंद्र बना हुआ है। पिछले विधानसभा चुनावों में यहां इक तरफा बीजेपी का जोर था और इसी वजह से उसकी सरकार बनी थी। लोग मान रहे हैं कि अब स्थिति वैसी नहीं है, कांग्रेस बहुत मजबूत है। अगर कांग्रेस उत्तरी असम में ठीकठाक प्रदर्शन कर ले तो फिर उसकी सरकार बनना तय है। कांग्रेसी इस बात के लिए आश्वस्त हैं और जो बहुत सतर्क और तटस्थ लोग हैं, वे भी यह मानते हैं कि कांग्रेस कहीं भी कमजोर नहीं है। मैं मित्र निधीश त्यागी के साथ आया हूं।

रुचिर गर्ग की सलाह है कि हम दोपहर के भोजन के बाद ब्रह्मपुत्र नदी और उस पर बना विशाल पुल देख आएं। निधीश त्यागी बताते हैं कि नक्शे में ब्रह्मपुत्र का पाट डिब्रूगढ़ शहर से ज्यादा चौड़ा है। निधीश त्यागी का यह भी आग्रह है कि ठेठ असमिया भोजन किया जाए। उसकी तलाश में थोड़ा वक्त लगता है और फिर जिस रेस्टोरेंट में हम खाना खाते हैं, वहां बहुत वक्त लगता है। ब्रह्मपुत्र का पाट सचमुच जितना चौड़ा है, उसे देखकर आंखें फट जाती हैं। मेरे अंदर का भोपाली जाग उठता है और मैं निधीश को भोपाल का एक पुराना किस्सा सुनाता हूं। भोपाल नवाब के एक रिश्तेदार थे सद्दा मियां। बहुत सीधे आदमी थे और वह कई किंवदंतियों के नायक हैं। कहते हैं कि वह एक बार नवाब साहब के साथ मुंबई गए तो उन्होंने पहली बार समुद्र देखा। देखते ही उनके मुंह से निकला- अमां खां, यह तो भोपाल के तालाब से भी बड़ा है।

शाम को भूपेश बघेल की प्रेस कॉन्फ्रेंस है जिसमें कई स्थानीय पत्रकारों के अलावा दिल्ली से आए वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार भी मिल जाते हैं। मुकेश कुमार गंभीर, पढ़ने-लिखने वाले पत्रकार हैं। वह काफी समय असम में रहे हैं और असम को अच्छी तरह जानते हैं। वह इसलिए भी चर्चा में हैं कि दो-तीन दिन पहले राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने अपना परिचय इस तरह दिया थाः मैं मुकेश कुमार हूं और मैं गोदी मीडिया से नहीं हूं। आज के दौर में यह सुनना कितना सुखद लगता है। मुकेश कुमार और मैं एक-दूसरे को बरसों से जानते हैं और गाजियाबाद में करीब एक किलोमीटर की दूरी पर रहते हैं लेकिन हमारी पहली मुलाकात यहां डिब्रूगढ़ में होती है। तय होता है कि दिल्ली लौट कर उनसे मिला जाए और असम की स्थिति को समझा जाए।

भूपेश बघेल पूरे आत्मविश्वास से बोल रहे हैं और उनका जोर इस बात पर है कि कांग्रेस जो भी चुनावी वादे कर रही है, उनकी विश्वसनीयता है। इसका प्रमाण छत्तीसगढ़ में उनकी सरकार का ट्रैक रिकॉर्ड है। इसके उलट बीजेपी ने पांच साल पहले किए अपने वादे पूरे नहीं किए और अब नए वादे ले कर आ गई है। कांग्रेस की कोशिश बीजेपी को संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) पर घेरने की भी है। कांग्रेस की पांच गारंटी में से एक सीएए को लागू न करना भी है। बीजेपी के अपने एजेंडा में सीएए तो है और उसे वह पश्चिम बंगाल में बड़ा मुद्दा बना रही है लेकिन असम में वह ऐसा दिखा रही है जैसे सीएए किस चिड़िया का नाम है, उसे पता ही नहीं। वह यह भी जताने की कोशिश कर रही है कि असम की जनता भी इस मुद्दे को भूल गई है। भूपेश बघेल मजे लेते हुए कहते हैं कि जो आदमी दो जुबानों से बोलता है, उसे दोगला कहते हैं। यहां बीजेपी तीन गलों से बोल रही हैः पश्चिम बंगाल में कह रही है कि सीएए लागू करेंगे, असम में सीएएए लागू करने की बात नहीं है और तमिलनाडु में उस पार्टी के साथ है जो सीएए के खिलाफ है।

अगले दिन कार से गुवाहाटी जाने का कार्यक्रम है। आइडिया यह है कि सड़क पर से माहौल ज्यादा समझ में आएगा। करीब साढ़े चार सौ किलोमीटर का फासला ग्यारह घंटे में तय होता है क्योंकि आधे रास्ते में विकास हो रहा है और जगह-जगह खुदा पड़ा है। आसपास का दृश्य सुंदर है- खेत, छोटे-छोटे मकान, सुपारी के पेड़। सड़क के किनारे सारे रास्ते बस्ती है, सिर्फ बीच में काजीरंगा का इलाका है जहां जंगल है। जगह-जगह छोटे-छोटे झंडे और बैनर दिखते हैं, न बड़ा होर्डिंग, न लाउडस्पीकर।

असम की राजनीति पर एक नाम छाया हुआ है हिमंत विश्वशर्मा का। वह लगभग एक मिथकीय चरित्र बन गए हैं जिनकी छवि कुछ सुपरमैन जैसी है। उनका प्रभाव भी है, आतंक भी क्योंकि यह माना जाता है कि वह कुछ भी कर सकते हैं। बीजेपी कायदे से उनके बूते ही खड़ी है और अब उन्हें यह लग रहा है कि अगर ऐसा है तो मुख्यमंत्री वह ही क्यों न हों। इसलिए बीजेपी मौजूदा मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल को भावी मुख्यमंत्री की तरह प्रचारित नहीं कर रही है। उसके पोस्टरों पर सोनोवाल के साथ हिमंत और राज्य बीजेपी अध्यक्ष- तीनों के एक साथ चित्र होते हैं। हालांकि गंभीर राजनीतिक लोगों से बातचीत से लगता है कि उनकी सुपरमैन छवि में कुछ अतिशयोक्ति भी है। उनके नाम के साथ कुछ गंभीर आरोप भी जुड़े हैं जिनकी वजह से वे ‘ऊपरी’ दबाव में हैं। बहरहाल, लाहे-लाहे असम में वह एक सुपरफास्ट किरदार हैं और राजनीतिमें अमूमन ज्यादा रफ्तार खतरनाक साबित होती है।

गुवाहाटी में पुराने मित्र और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार विनोद वर्मा मिलते हैं। वह भी करीब ढाई-तीन महीने से यहीं हैं। छत्तीसगढ़ से करीब पांच सौ कार्यकर्ता इसी तरह असम में डटे हैं। स्थानीय कार्यकर्ताओं की वैचारिक ट्रेनिंग से लेकर बूथ स्तर के इंतजाम में ये लोग जुटे हुए हैं। यह भी एक अनोखा प्रयोग है कि किसी राज्य से इस तरह इतनी बड़ी टीम आकर चुनाव प्रचार में पूरी ताकत झोंक दे। भूपेश बघेल पूरी विनम्रता से कोई भी श्रेय लेने से इनकार करते हैं। वह कहते हैं कि पार्टी यहां पहले से मजबूत थी, उसके पास बुनियादी ढांचा, नेता और कार्यकर्ता सभी थे लेकिन तरुण गोगोई-जैसे कद्दावर नेता के जाने से चीजें अस्त-व्यस्त हो गई थीं। हमने सिर्फ आकर चीजों को थोड़ा व्यवस्थित कर दिया है। लेकिन जग्गी रोड विधानसभा क्षेत्र में एक जनसभा में जनता की प्रतिक्रिया देखकर पता चलता है कि यहां भूपेश बघेल कितने लोकप्रिय हैं।

गुवाहाटी में एक अलग असम देखने को मिलता है। उसे देखकर लगता है कि वह कभी सुंदर शहर रहा होगा जो अब ‘विकास’ की चपेट में आकर बदसूरत होता जा रहा है। उसे देखकर शिमला की याद आती है। पहाड़ियों से दीवार के पलस्तर की तरह झरती मिट्टी, सड़कों पर ट्रैफिक जैम, धूल। लोग कहते हैं कि एयरपोर्ट पहुंचने के लिए एक घंटा चाहिए लेकिन ट्रैफिक की वजह से डेढ़ घंटा मान कर चलिए।

असमिया लोगों की लड़ाई पहचान की लड़ाई है और इसमें सांप्रदायिकता का अंश लगभग नहीं है। सांप्रदायिकता सिर्फ बीजेपी के एजेंडा का हिस्सा है। न ही यह सिर्फ सांस्कृतिक पहचान की या बाहरियों के खिलाफ लड़ाई है जैसा ऊपर से दिखाई देता है। इसके आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक कई आयाम हैं जो बहुत जटिल धागों से उलझे हैं। लाहे-लाहे असम को इस जटिल ट्रैफिक जैम से निकालने का कोई सरल नुस्खा नहीं है, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण तो कतई नहीं है।

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