असम : एक पंचायत, दो सांसद और तीन विधायक
असम के परिसीमन से संप्रदाय आधारित हेरफेर के जरिये मुसलमानों और अन्य प्रमुख अल्पसंख्यक समुदायों के राजनीतिक प्रभाव को कम करने का वह उद्देश्य हासिल कर लिया गया, जो बेशक साफ तौर पर नहीं कहा गया, लेकिन जगजाहिर था।

बरपेटा के 10 गांवों वाली एक पंचायत का प्रतिनिधित्व पहले लोकसभा में एक सांसद और विधानसभा में एक विधायक करते थे। अब इसी पंचायत का प्रतिनिधित्व दो सांसद और तीन विधायक करेंगे। ‘स्क्रॉल’ को दिए एक वीडियो इंटरव्यू में पत्रकार रोकिबुज जमान ने बताया कि यह अजीबोगरीब स्थिति 2023 में असम में चुनाव आयोग द्वारा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से बनी है।
पिछले दिशानिर्देश में तय किया गया था कि एक ब्लॉक या तहसील को जो सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई होती है, तोड़ा नहीं जाना चाहिए। लेकिन 2023 में चुनाव आयोग ने इसे नजरअंदाज करते हुए गांव को सबसे छोटी इकाई बना दिया और पंचायतों को बांटने का फैसला किया। है न अजीब बात!
असम के नक्शे पर नजर डालें तो आपको दिखेगा कि राजनीतिक सीमाएं इस तरह बदली गई हैं कि उनमें प्राकृतिक और प्राकृतिक बाधाओं को नजरअंदाज कर दिया गया है। हालांकि, इसका मकसद हर निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या को ‘संतुलित’ करना है, ताकि हर वोट का महत्व लगभग बराबर बना रहे; लेकिन, परिसीमन से किसी एक राजनीतिक दल या लोगों के किसी समूह को राजनीतिक फायदा भी तो मिल सकता है। अमेरिकी शब्द का इस्तेमाल करें तो, 2023 में असम और जम्मू-कश्मीर, दोनों ही जगहों पर ‘जेरीमैंडरिंग’ (चुनाव क्षेत्र की सीमाओं को चालाकी से बदलना) की गई। इस प्रक्रिया के खिलाफ कोई कानूनी चुनौती नहीं दी जा सकती थी। असम में इसे आजमाने के बाद भाजपा इसे बाकी देश पर भी थोप देती, अगर वह 17 अप्रैल 2026 को संसद से परिसीमन विधेयक पारित करवाने में असफल नहीं हुई होती।
विशेषज्ञों ने असम के संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों के 2023 के परिसीमन को ‘राज्य के हालिया राजनीतिक इतिहास में सबसे अधिक असर डालने वाला और विवादास्पद’ बताया है। उनका मानना है कि 9 अप्रैल को हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में यह कवायद भाजपा के पक्ष में रही।
असम में परिसीमन की प्रक्रिया की असली पेचीदगी उसकी बारीकियों में छिपी है। पहली नजर में, राज्य ने केवल एक संवैधानिक आदेश का पालन करते हुए अपनी चुनावी सीमाओं को फिर से निर्धारित किया है, ताकि जनसांख्यिकीय बदलावों को समायोजित किया जा सके। संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 में हर जनगणना के बाद इस तरह के समायोजन का प्रावधान है। हालांकि, 2001 और 2003 में हुए संवैधानिक संशोधनों ने विधानसभा में सीटों की कुल संख्या को 126 पर स्थिर कर दिया था, और केवल 2001 की जनगणना के आधार पर सीटों के आंतरिक पुनर्गठन की ही अनुमति दी थी। इसका मतलब यह हुआ कि असम का परिसीमन- जो 1976 में हुई पिछली प्रक्रिया के लगभग 50 साल बाद किया गया-पुराने जनसांख्यिकीय आंकड़ों का इस्तेमाल करके पूरा किया गया।
इस प्रक्रिया को परिसीमन अधिनियम के तहत करने के बजाय, ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950’ की धारा 8ए के तहत पूरा किया गया। यह प्रावधान, जिसे विशेष रूप से पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों के लिए बनाया गया था, चुनाव आयोग को यह अधिकार देता है कि राष्ट्रपति के आदेश द्वारा पिछली रोक हटाए जाने के बाद वह परिसीमन की प्रक्रिया को पूरा करे। फरवरी 2020 में, राष्ट्रपति ने इस रोक को हटा दिया, जिससे इस प्रक्रिया का रास्ता साफ हो गया।
असम के लिए इसका मतलब यह था कि वहां कोई स्वतंत्र परिसीमन आयोग नहीं था, जिसकी अध्यक्षता आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट का कोई सेवानिवृत्त न्यायाधीश करता। इसके बजाय, चुनाव आयोग ने ही असम का परिसीमन किया। किसी भी न्यायिक निगरानी के अभाव में, असम की परिसीमन प्रक्रिया में हेर-फेर की गुंजाइश बनी हुई थी।
इस प्रक्रिया में असम के जिलों को जनसंख्या घनत्व के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया। इसमें हर निर्वाचन क्षेत्र के लिए राज्य की औसत जनसंख्या से दस प्रतिशत तक के विचलन की अनुमति दी गई। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि कम जनसंख्या वाले पहाड़ी जिलों का प्रतिनिधित्व कम न हो, और ज्यादा जनसंख्या वाले क्षेत्रों का दबदबा न रहे। इस दौरान व्यापक विचार-विमर्श हुआ, जिसमें 1,200 से ज्यादा सार्वजनिक प्रतिवेदनों पर चर्चा शामिल थी। इसने अनुसूचित जनजातियों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया और स्वायत्त तथा जनजातीय क्षेत्रों की मांगों को भी पूरा किया। राज्य सरकार ने एससी और एसटी के लिए आरक्षित सीटों में हुई वृद्धि को सामाजिक न्याय और समावेशन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के तौर पर पेश किया।
राज्य सरकार के एक रिटायर्ड अधिकारी के मुताबिक, असम के परिसीमन की एकमात्र अनोखी बात प्रक्रिया से हटकर काम करना ही नहीं थी। इसने एक ऐसे अलिखित लेकिन साफ मकसद को भी पूरा किया, जिसके तहत ‘सांप्रदायिक हेरफेर’ के जरिये मुसलमानों और अन्य प्रमुख अल्पसंख्यक समुदायों के राजनीतिक प्रभाव को कमजोर किया गया। यह काम तीन तरीकों से किया गया: ‘क्रैकिंग’ (अल्पसंख्यकों की घनी आबादी को बांटना), ‘पैकिंग’ (उन्हें कुछ ही सीटों में समेट देना), और ‘स्टैकिंग’ (उन्हें बहुसंख्यकों की बड़ी आबादी के साथ मिला देना, ताकि चुनाव में उनकी हार पक्की हो जाए)।
बरपेटा जैसी सीटों में काफी बदलाव किए गए; इनमें मुस्लिम-बहुल इलाकों को हटाना और उस सीट को एससी आरक्षित सीट में बदलना शामिल था। नाओबोइचा में, जो पहले एक मुकाबले वाली सीट थी और जहां अल्पसंख्यकों की अच्छी-खासी नुमाइंदगी थी, आरक्षण ने चुनावी माहौल को पूरी तरह बदल दिया। काटीगोराह में, आबादी के नए बंटवारे की वजह से कथित तौर पर सीट का पलड़ा हिन्दुओं के पक्ष में झुक गया। इसका कुल नतीजा यह हुआ कि उन सीटों की संख्या में भारी कमी आ गई, जहां मुस्लिम वोटरों का असर और नुमाइंदगी थी। और जब सीटों के नए बंटवारे की वजह से समुदायों का असर कम हुआ, तो नेताओं का भी असर कम हो गया- खासकर उन नेताओं का, जिन्हें इसका सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा।
अहोम समुदाय के वरिष्ठ नेता और बीजेपी के पूर्व सांसद राजेन गोहेन कहते हैं, ‘परिसीमन ने मेरी सीट को जीतना नामुमकिन बना दिया है।’ गोहेन ने 2025 के अंत में भाजपा छोड़ दी थी; वह पार्टी में 30 साल रहे और इस दौरान उन्होंने लगातार चार बार लोकसभा में नगांव का प्रतिनिधित्व किया। गोहेन मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ मुखर रहे हैं; उन्होंने सरमा पर राज्य को एक ‘व्यावसायिक उद्यम’ की तरह चलाने और हाशिये पर पड़े तथा मूल निवासी समुदायों की उपेक्षा करने का आरोप लगाया है। गोहेन को पूरा यकीन है कि वह 2026 के विधानसभा चुनावों में बरहमपुर सीट से असम जातीय परिषद (एजेपी) के उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल करेंगे।
4 मई को होने वाली वोटों की गिनती से पहले ‘नवजीवन’ से हुई बातचीत में गोहेन ने कहा, ‘असम में विपक्षी गठबंधन सत्ता में आ रहा है। हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ असंतोष की लहर अब उफान पर है।’
असम में परिसीमन से बने नए राजनीतिक समीकरण असम भाजपा के अंदरूनी झगड़ों के रूप में सामने आए, जहां बिस्वा सरमा ने एक मजबूत विपक्ष का मुकाबला करने के लिए नेताओं के एक नए समूह को पार्टी में शामिल किया और उन्हें पार्टी का टिकट दिया है। गुवाहाटी में तैरती चर्चाओं के मुताबिक, एक आंतरिक बैठक के दौरान अमित शाह की यह टिप्पणी कि कांग्रेस से बीजेपी में आए नेता और मंत्री पीयूष हजारिका ने बीजेपी द्वारा लड़ी गई 90 सीटों में से अपने 15 समर्थकों के लिए टिकट हासिल कर लिए थे, बिस्वा सरमा को रास नहीं आई।
हजारिका के बढ़ते कद को कम करने के लिए बिस्वा सरमा ने जयंत मल्ला बर्मन को बढ़ावा देना शुरू कर दिया जो एनएसयूआई के दिनों से ही हजारिका के कट्टर विरोधी थे। सरमा ने बर्मन को बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ) और एजीपी (असम गण परिषद) जैसे गठबंधन सहयोगियों के लिए संपर्क सूत्र बना दिया। हजारिका की भूमिका को घटाकर सिर्फ फंड और मीडिया मैनेजमेंट तक सीमित कर दिया गया। बीजेपी के बीपीएफ से गठबंधन का मतलब यह भी था कि पश्चिम बंगाल-असम सीमा पर श्रीरामपुर प्रवेश द्वार से होने वाले यातायात के प्रवाह को नियंत्रित करने वाले सिंडिकेट्स पर बीपीएफ का ज्यादा दबदबा होगा- एक ऐसी भूमिका जिसे हजारिका ने कथित तौर पर बड़े शानदार ढंग से निभाया था। असम के पुराने नेताओं ने अपनी नाराजगी जाहिर करने में कोई संकोच नहीं किया; गौतम दास जैसे अनुभवी बीजेपी नेताओं ने तो बिस्वा सरमा के खिलाफ खुलकर विद्रोह करते हुए निर्दलीय उम्मीदवारों के तौर पर चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया।
जहां एक ओर असम में अपनी स्पष्ट जीत को लेकर बीजेपी में जबरदस्त उत्साह है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष की संभावित जीत-जिसे कई एग्जिट पोल में दिखाया गया है- को लेकर चर्चा गर्माती जा रही है। हिमंत बिस्वा सरमा साफ तौर पर एक ऐसी राजनीतिक पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं जो आपस में बंटी हुई है, कमजोर पड़ चुकी है और राज्य के लिए किसी बड़े विजन के बजाय सिर्फ स्थानीय हितों के सहारे टिकी है।
अगर चुनावी सूचियों में की गई हेर-फेर और सीटों के नए सिरे से तय किए गए नक्शे- साथ ही तीखी सांप्रदायिक बयानबाजी- के बावजूद भाजपा को मनचाहे नतीजे नहीं मिलते हैं, तो बहुत जल्द असम के ‘प्यारे मामा’ के खिलाफ ही तलवारें खिंच जाएंगी।
सौरभ सेन कोलकाता में रहने वाले टिप्पणीकार हैं
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