विवादित कृषि कानूनों का आंकलन जरूरी, संशोधन से नहीं चलेगा काम, इन्हें वापस लेना ही पड़ेगा!

तीन कृषि कानूनों का व्यापक विरोध होने पर यह सवाल उठा कि इन्हें वापस लिया जाए या इनमें मात्र कुछ संशोधन करने से काम चल जाएगा। अभी तक आंदोलनकारी किसान संगठनों ने सरकार से अपनी वार्ता में और अन्यत्र बयानों में कई बार दोहराया है कि संशोधन से काम नहीं चलेगा, इन कानूनों को वापस ही लेना चाहिए।

फोटो: Getty Images
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भारत डोगरा

2020 में जल्दबाजी में पास किए गए कृषि कानूनों का जितना विरोध देश में हुआ है वैसा बहुत कम देखा गया है। इन्हें ‘काले कानून’ बताते हुए किसानों ने इनके विरुद्ध बहुत व्यापक आंदोलन किया है जिसे देश के अनेक तबको का समर्थन भी मिल रहा है। यह कानून कृषि उत्पादन पद्धति में कांट्रेक्ट पद्वति की राह प्रशस्त करते हैं जबकि कृषि उपज भंडारण और बिक्री में भी महत्त्वपूर्ण बदलाव लाते हैं। किसान आंदोलनों ने इन कानूनों को वापस लेने की मांग की है और कुछ प्रतिष्ठित विशेषज्ञों ने भी इस मांग का समर्थन किया है।

इन कानूनों के उद्देश्य और असर को समझने के लिए भारत और विश्व की कृषि स्थिति और बदलावों के संदर्भ में इनके बहुपक्षीय महत्त्व का अध्ययन होना चाहिए जैसे किसानों पर असर, खाद्य सुरक्षा पर असर, पर्यावरण और टिकाऊ विकास पर असर आदि।

विश्व कृषि और खाद्य व्यवस्था हाल के दशकों में संकट से जूझती रही है जिसका मुख्य पक्ष यह है कि अति शक्तिशाली कारपोरेट तत्त्व इस पर अपना नियंत्रण बढ़ाने का प्रयास निरंतर कर रहे हैं। उनके प्रयास मुनाफा बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं अपितु कृषि और खाद्य व्यवस्था पर अपना नियंत्रण भी बहुत बढ़ाना चाहते हैं। जब विभिन्न देशों की सरकारों और अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानों का समर्थन उन्हें मिलता है तो यह मिलन बहुत शक्तिशाली हो जाता है।

एक ओर तो यह स्वार्थ अपने बीजों और उत्पादों (जैसे रासायनिक कीटनाशक दवाओं) और उनसे जुड़ी तकनीक के प्रसार के लिए दबाव बनाते हैं जिससे खेती मंहगी और निर्भर होती है और पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ने से दीर्घकालीन क्षति भी होती है। दूसरी ओर यह स्वार्थ फसलों की प्रोसेसिंग, व्यापार और बिक्री पर भी अपना नियंत्रण तेजी से इस तरह बढ़ाते हैं जिससे कृषि और खाद्य बाजार में इसकी आमदनी का बड़े से बड़ा हिस्सा उन्हें प्राप्त हो सके।


अपने मुनाफे को बढ़ाने और सुनिश्चित करने की उनकी राह यह है कि कृषि और खाद्य व्यवस्था पर नियंत्रण निरंतर बढ़ाया जाए और इसके लिए कानूनी आधार तैयार किया जाए। अतः हाल के दशकों में विश्व स्तर पर कृषि पेटेंट, व्यापार, कांट्रेक्ट आदि के बहुत कानून बने हैं।

इन स्वार्थों के इन कुप्रयासों से छोटे किसानों और किसान परिवारों पर दोहरा दबाव निरंतरता से बढ़ता रहा है- एक ओर उनके खेती से जुड़े खर्च तेजी से बढ़ते हैं और दूसरी ओर बाजार में आमदनी का उनका हिस्सा घटता जाता है। बड़ी कंपनियों और व्यापारियों का लाभ बढ़ता जाता है और किसानों की स्थिति कठिन होती जाती है।

मुनाफा निरंतर बढ़ाने की कारपोरेट प्रवृति का भूख और कुपोषण दूर करने, खाद्य गुणवत्ता बनाए रखने के उद्देश्यों पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। कृषि विकास के नाम पर बहुत चालाकी से इस तरह की हानिकारक प्रवृत्तियों को बढ़ाया गया है। इनकी स्वीकृति बढ़ाने के लिए कुछ बड़े किसानों और उनके प्रतिनिधियों को भी इस प्रक्रिया से जोड़ा जाता है और समय-समय पर सरकारें कुछ राहत की घोषणा भी करती हैं। इसके बावजूद नियंत्रण बढ़ाने की मूल प्रवृत्ति बढ़ती रहती है और किसानों की मांगें भी प्रायः कुछ तत्कालीन राहत (जैसे कुछ कर्ज समाप्त करना) तक ही सिमट कर रह जाती है।

इसके अतिरिक्त बहुपक्षीय और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों में भी प्रायः धनी देश और कारपोरेट हित हावी होने का और ऐसे प्रावधान रखवाने का प्रयास करते हैं जो विशेषकर विकासशील देशों के छोटे और मध्यम किसानों के लिए हानिकारक होते हैं।

इन सभी प्रवृत्तियों का असर भारत के किसानों पर भी देखा जा रहा है। यहां अधिकांश किसान छोटे और मध्यम किसान हैं और उनपर इन विभिन्न प्रवृत्तियों का बढ़ता और प्रतिकूल असर बढ़ते कृषि खर्च, कर्ज और बिक्री की कठिनाई के रूप में नजर आता रहा है। पर दूसरी ओर किसान समर्थन के चुनावी महत्त्व के बीच किसानों की आजीविका सुरक्षा के कुछ प्रयास भी हुए हैं, जैसे न्यूनतम मूल्य सुनिश्चित करना, जो कुछ राज्यों में मजबूत है तो कुछ राज्यों में कमजोर है। दूसरी ओर इन सुरक्षा व्यवस्थाओं को कमजोर करने के प्रसार भी अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों और संगठनों (जैसे विश्व व्यापार संगठन) और कारपोरेट स्वार्थों की ओर से होते रहते हैं।

कारपोरेट हित चाहते हैं कि उनके नियंत्रण और मजबूत स्थिति को कानूनी मान्यता भी प्राप्त हो और तभी वे अपने निवेश को और तेजी से बढ़ाएं। इस व्यापक संदर्भ में ही वर्ष 2020 के तीन विवादित कृषि कानूनों की बहस को देखना चाहिए, यह भी देखते हुए कि मौजूदा केन्द्रीय सरकार विशेषकर कुछ बड़े कारपोरेट हितों से अधिक नजदीकी के लिए चर्चित रही है।

इनमें से एक कानून कांट्रैक्ट खेती के लिए अधिक बड़ी भूमिका को आगे बढ़ाता है। किंतु विश्व स्तर पर कांट्रैक्ट खेती का अनुभव प्रायः छोटे और मध्यम किसानों के लिए प्रतिकूल रहा है। प्रायः कांट्रैक्ट वाली कंपनी अपने महंगे उत्पादों, तकनीकों को किसानों पर लादती रहती हैं जिससे उनका खर्च बढ़ जाता है और स्वतंत्रता कम हो जाती है। खरीद के समय फसल का उचित वर्गीकरण न कर, गुणवत्ता कम आंक कर प्रायः किसानों को कम मूल्य दिया जाता है। हाल ही में बनाए गए कांट्रैक्ट कृषि कानून की इस आधार पर भी आलोचना हुई है कि इसके कुछ प्रावधान बहुत स्पष्ट नहीं हैं, कंपनियों के हित में हैं और इसे सिविल कोर्ट की सामान्य परिधि से बाहर रखा गया है।

अन्य दो कानूनों ने एक ओर तो निर्धारित ए.पी.एम.सी./कृषि मंडी क्षेत्र से बाहर कर-मुक्त, अनियंत्रित निजी खरीद-बिक्री की व्यवस्था तैयार की है, दूसरी ओर आवश्यक उत्पादों, सबसे महत्त्वपूर्ण खाद्यों सहित विभिन्न कृषि उपज के भंडारण पर लगे नियंत्रणों और सीमाओं को हटा कर इनमें अधिक मुनाफाखोरी के द्वार खोल दिए हैं। इससे किसानों के लिए बनी मंडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य आधारित सीमित सुरक्षा व्यवस्था से दूर हटने का संकेत मिलता है जिसकी तीखी आलोचना किसान आंदोलन ने की है। दूसरी और सरकार का कहना है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य और एपीएमसी. मंडी बने रहेंगे। बेशक यह भी बने रहें, पर इनके महत्त्व और भूमिका को कम करने और निजी क्षेत्र का नियंत्रण बढ़ाने का संकेत तो इन कानूनों में मिलता ही है और उसके बाहर टैक्स रहित, अनियंत्रित बिक्री की जगह बढ़ाई जा रही है, कांट्रैक्ट फार्मिंग से उत्पादन में भी उसकी भूमिका बढ़ाई जा रही है। निजी क्षेत्र का नियंत्रण बढ़ने और सुरक्षित व्यवस्था घटने से किसानों को आज नहीं तो कल हानि सहनी पड़ेगी, यह किसान संगठनों के विरोध का एक बड़ा कारण है। नए बदलावों को सिविल कोर्ट से बाहर रखने के कारण भी संदेह बढ़ रहे हैं।

इसके अतिरिक्त नए कानूनों का भूख, कुपोषण को कम करने और खाद्य सुरक्षा स्थापित करने के बेहद जरूरी उद्देश्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। विशेषकर निर्धनता और अनेक लोगों की कम क्रय शक्ति के माहौल में, बाजार-व्यवस्था स्वतः सबसे जरूरी खाद्यों के उत्पादन और उपलब्धि की गारंटी नहीं देती है और इस कारण समर्थन मूल्य - सरकारी खरीद - सार्वजनिक वितरण प्रणाली - पोषण स्कीमों का ढांचा खड़ा करना आवश्यक हो जाता है। पर यदि सरकारें सुरक्षित खाद्य और कृषि व्यवस्था से हट कर निजी कंपनियों द्वारा नियंत्रित खाद्य और कृषि व्यवस्था की ओर जाती हैं तो मुनाफखोरी और सट्टे की प्रवृत्तियां बढ़ती हैं और खाद्य सुरक्षा कम होती है। नए कानून इस दिशा की ओर ले जाते हैं। यदि कांट्रैक्ट खेती बढ़ जाएगी तो कृषि उत्पादन देश की खाद्य आवश्यकताओं के अनुकूल नहीं होगा अपितु अपने वैश्विक व्यवसाय की आपूर्ति के लिए बड़ी कंपनियां जिन खाद्यों की आपूर्ति चाहेंगी उनको ही देश के खेतों में बढ़ाया जाएगा। इस तरह भूख और कुपोषण दूर करने के लिए खेती नहीं होगी अपितु विश्व बाजार में कंपनियों का मुनाफा बढ़ाने के लिए खेती होगी।


इसके अतिरिक्त जिस दिशा में नए कानून ले जाते हैं, उस राह पर टिकाऊ खेती और पर्यावरण रक्षा के उद्देश्यों की भी क्षति होगी। इस समय भी इस दृष्टि से हमारी कृषि की स्थिति चिंताजनक है, पर यह कानून इस चिंताजनक स्थिति को सुधारने के स्थान पर इसे और बिगाड़ने की दिशा में ले जाते हैं। फसलों का चुनाव और कृषि तकनीक का चुनाव किसी स्थान की मिट्टी, पानी, जैव-विविधता, पर्यावरण आदि के आधार पर इनके संरक्षण को ध्यान में रखते हुए होना चाहिए पर कांट्रैक्ट खेती में फसलों का चुनाव विश्व बाजार में मुनाफा अर्जित करने के आधार पर होता है। किसी स्थान के पर्यावरण की दीर्घकालीन रक्षा से कंपनी का लगाव प्रायः नहीं होता है। वह एक स्थान की मिट्टी, पानी, अन्य संसाधनों का अधिक दोहन कर, यहां की बहुत क्षति हो जाने पर अपनी फसल प्राप्ति के लिए दूसरे स्थान पर चली जाती है। वह लाभ-हानि के आकलन में नकदी को ही देखती है, पर्यावरणीय और सामाजिक क्षति को वह प्रायः महत्त्व नहीं देती है।

इसके अतिरिक्त इन नए कृषि कानूनों के माध्यम से राज्य अधिकारों और विकेन्द्रीकरण (पंचायती राज) पर भी प्रतिकूल असर पड़ा है। कृषि में केन्द्रीय सरकार का अत्यधिक नियंत्रण उचित नहीं है क्योंकि निर्णय स्थानीय स्थितियों के अनुकूल होना जरूरी है। तिस पर यदि राष्ट्रीय नीति पर कारपोरेट हित हावी हो जाएं तो यह अत्यधिक नियंत्रण और भी हानिकारक सिद्ध हो सकता है, जैसा कि इन कानूनों में देखा जा रहा है। राज्य सरकारों और पंचायती राज संस्थानों में इन कानूनों के विषय में पर्याप्त विमर्श नहीं किया गया, जो संघीय लोकतंत्र और विकेन्द्रीकरण का उल्लंघन है। ए.पी.एम.सी/मंडी व्यवस्था पिछड़ने से राज्यों की आय कम होगी, ग्रामीण विकास कार्य प्रतिकूल प्रभावित होंगे, यह शिकायत अलग है।

इन तीन कानूनों को तेजी से आगे लाने में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का कई स्तरों पर उल्लंघन हुआ। किसानों और उनके संगठनों से विमर्श बहुत कम हुआ, उनका विरोध स्पष्ट होने पर भी इसकी ओर आरंभिक स्थिति में ध्यान नहीं दिया गया। कानून अध्यादेश के रूप में बहुत जल्दबाजी में लाए गए, और संसदीय समिति को सौंपे बिना ही लोक सभा में जल्दबाजी में कानून पास हुआ, जबकि राज्य सभा में तो लोकतांत्रिक पद्धति और भावना का उल्लंघन और भी अधिक चर्चा का विषय बना। इन तीन कानूनों का व्यापक विरोध होने पर यह सवाल उठा कि इन्हें वापस लिया जाए या इनमें मात्र कुछ संशोधन करने से काम चल जाएगा। अभी तक आंदोलनकारी किसान संगठनों ने सरकार से अपनी वार्ता में और अन्यत्र बयानों में कई बार दोहराया है कि संशोधन से काम नहीं चलेगा, इन कानूनों को वापस ही लेना चाहिए। किसानों की इस मांग को व्यापक समर्थन मिल रहा है और मिलना चाहिए। दस विख्यात अर्थशास्त्रियों ने हाल ही में कृषि मंत्री को पत्र लिखा है (17 दिसंबर) कि कुछ अंशों को इन कानूनों से हटा देने मात्र से किसानों की चिंता का समाधान नहीं होगा और इन कानूनों को वापस ही लेना चाहिए। इन प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों व विशेषज्ञों की राय निश्चय ही सही दिशा में है व सरकार को इसे स्वीकार करना चाहिए।

इन कानूनों को वापस लेने के साथ आगे के अनेक महत्त्वपूर्ण न्याय और पर्यावरण रक्षा आधारित कृषि मुद्दों पर भी ध्यान देना जरूरी है जैसे कि कृषि को पर्यावरण रक्षा के अनुकूल बनाना, इस प्रगति को टिकाऊ आधार देना और भूमिहीन ग्रामीण मजदूरों की समस्याओं पर भी समुचित ध्यान देना। इन व्यापक मुद्दों पर विमर्श जरूरी है, और इसके लिए पहले यह भी जरूरी है कि तीन विवादित कानून वापस लिए जाएं और आंदोलनकारियों पर लगे विभिन्न मुकदमे भी वापस लिए जाएं।

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