वाजपेयी भी तो जीवन भर संघ से उतनी ही शक्ति अर्जित करते रहे जितनी आडवाणी, फिर वह उदारवादी कैसे थे !

अटल बिहारी वाजपेयी भी संघ से उतनी ही शक्ति अर्जित करते थे जितनी आडवाणी। कहा और माना जाता रहा है कि संघ और बीजेपी के कामकाज में ये दोनों एक-दूसरे के पूरक थे। दरअसल बीजेपी से बाहर वाजपेयी की स्वीकार्यता, संघ के मनमाफिक ही थी।

फोटो: सोशल मीडिया
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दिवाकर

अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में बराबर यह बात कही जाती रही, और उनके निधन के बाद भी यह कहा जा रहा है, कि वे कई बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से नजरिए से अलग तरीका अपनाते थे और इस अर्थ में कट्टर नहीं थे। अटल-आडवाणी दौर में भी उनकी छवि इस तरह की बनी थी कि लालकृष्ण आडवाणी तो कट्टर हिंदुत्ववादी हैं लेकिन अटल लिबरल हैं और संघ की कट्टरता से वे जब-तब असहमत दिखते हैं। इस तरह की बातों की वजह से वे लोकप्रिय भी थे। पार्टी से बाहर, बल्कि कई दफा मान्य सीमाओं से परे भी उनकी स्वीकार्यता बनती थी। अटल की ऐसी ही सार्वजनिक छवि थी भी।

लेकिन, यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि अटल, संघ से निकले हुए और सब दिन संघ के लिए समर्पित स्वयंसेवक थे। संघ से जुड़ा कोई व्यक्ति शायद ही इस बात से सहमत हो कि अटल विचलित स्वयंसेवक थे। वे संघ से उतनी ही शक्ति अर्जित करते थे जितनी आडवाणी। कहा और माना जाता रहा है कि संघ और बीजेपी के कामकाज में ये दोनों एक-दूसरे के पूरक थे। दरअसल बीजेपी से बाहर वाजपेयी की स्वीकार्यता, संघ के मनमाफिक ही थी।

संघ हमेशा से लंबे समय की रणनीति बनाता और उस पर अमल करता रहा है। आदिवासियों के बीच शुरु किए गए उसके कार्यक्रमों से इस बात को आसानी से समझा जा सकता है। सरस्वती शिशु मंदिरों की स्थापना और उसके विस्तार से भी इसे समझा जा सकता है। ये दो पौधे उसने काफी पहले रोपे, उसके फल उसे आज मिल रहे हैं। यह मानने में कोई दुविधा नहीं होनी चाहिए कि सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर उसके ये काम सघन हैं और बीजेपी के विस्तार में इनकी भूमिका अहम है। आज इतिहास की बातों को बिना किसी अध्ययन, बिना किसी संदर्भ, बिना किसी प्रमाण सीना ठोककर कहने-लिखने-बताने का चलन ऐसे ही नहीं है। सरस्वती शिशु मंदिरों ने इसके लिए ठोस जमीन वर्षों में तैयार की है।

इसी तरह अटल-आडवाणी की जोड़ी तैयार करने में भी संघ की भूमिका रही है। आडवाणी का हिंदुत्व-दर्प संघ के अनुकूल रहा ही है। लेकिन संघ को भी पता था कि सिर्फ इस दर्प के बल पर उसे सत्ता नहीं मिल सकती। उसे यह भी मालूम था कि गैरकांग्रेसी और समाजवादी धारा में उसे प्रवेश और स्वीकार्यता तब ही मिल सकती है जब उसका चेहरा कोई लिबरल ही रहे। अटल इसीलिए उसके लिए लगातार मुखौटा बने रहे और आडवाणी इसीलिए अटल के पीछे दुबके रहे। संघ ने ऐसा करने के लिए उन्हें विवश किया। वैसे भी, आडवाणी सीमित प्रतिभा वाले रहे हैं। वे अच्छे वक्ता कभी नहीं रहे। इस वजह से उनकी जनलोकप्रियता कभी अटल जैसी नहीं रही। जैसा कि माना जाता रहा है, आडवाणी संगठन के आदमी रहे हैं। स्वाभाविक है कि उनकी सीमा संघ और बीजेपीा के दायरे तक ही रही है। अटल के स्वास्थ्य में गिरावट के बाद संघ ने मजबूरी में आडवाणी पर दांव लगाकर भी देख लिया। लेकिन उनके नेतृत्व में बीजेपी को मुंह की खानी पड़ी।

इस प्रसंग पर भी ध्यान देना जरूरी है। जब अटल का स्वास्थ्य इस लायक नहीं रहा कि वे शीर्ष पद के फिर दावेदार बन सकें तो आनन-फानन में आडवाणी को अटल बनाने की कोशिश संघ ने की। जिन्ना प्रसंग बहुत सोच-समझकर आगे किया गया। उसे हवा भी संघ और बीजेपी ने ही दी। आडवाणी से सारे पद छीन लिए गए। लगा कि अब वे संघ-बीजेपी के कूड़ेदान में डाल दिए गए हैं। लेकिन कुछ ही वर्षों बाद 2009 में जब प्रधानमंत्री-पद के दावेदार की बात आई तो वही आडवाणी कथित लिबरल वेशभूषा में बीजेपी की ओर से आगे कर दिए गए। लेकिन यह मुश्किल था क्योंकि आडवाणी की छवि वैसी थी ही नहीं। इसीलिए आडवाणी को मुंह की खानी पड़ी।

संघ के काम को आडवाणी विस्तार देने लायक नहीं रह गए, इसलिए चर्चा चाहे जितनी रही हो, उन्हें इसी वजह से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार लायक भी नहीं समझा गया। अटल-आडवाणी के बाद नरेंद्र मोदी को सत्ता शीर्ष पर बिठाने के लिए इसी पत्ते को दूसरी तरह इस्तेमाल किया गया। मोदी आडवाणी से सौ कदम आगे वाले हिंदुत्ववादी हैं। गुजरात दंगे से यह साफ है। फिर भी, मुलम्मा चढ़ाया गया गुजरात के तथाकथित विकास का। यह अटल वाला मुखौटा है। चूंकि मोदी का आडवाणी-तत्व प्रबल है और यह बीजेपी -संघी वोट बैंक को सुहाता है इसलिए उसे छिपाने की कोशिश जरूरी नहीं थी। लेकिन उसमें विकास की चाशनी इसलिए जरूरी थी ताकि मध्यवर्ग के बड़े हिस्से को साथ लाया जा सके।

संघ-बीजेपी की तरफ से इसीलिए अब भी विकास का ही ढिंढोरा पीटने की कोशिश हो रही है। लेकिन इन सबमें हिंदुत्ववादी प्रवृत्ति ही प्रबल है, क्योंकि वही संघ का असली मकसद है। अटल के कथित उदार व्यक्तित्व का बखान बीजेपी करती रहेगी, क्योंकि स्वीकार्यता बनाए रखने के लिए ऐसा करना उसकी मजबूरी है। जिस दिन बीजेपी ने यह मुलम्मा हटाया, यह भी समझना आसान हो जाएगा कि सिर्फ हिंदुत्ववादी नारों के बल पर उसे सत्ता मिलने का भरोसा हो गया है।

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