'नारी वंदन' के बहाने राष्ट्रीय एकता पर हमला, अब दिशाओं में बांटने की साजिश!
विधेयक की प्रति सार्वजनिक होने के बाद यह राज कुछ हद तक खुल गया है। जैसी कि आशंका थी, यह प्रस्तावित संविधान संशोधन महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के बारे में नहीं बल्कि संसद का पुनर्गठन करने के बारे में है।

लीजिए, कई दिन के सस्पेंस के बाद पर्दा उठ ही गया। पिछले कई दिन से हमे बताया जा रहा था कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कुछ क्रांतिकारी कदम उठाया जाने वाला है। शुभ काम में कहीं देरी ना हो जाए इसके लिए चार राज्यों के चुनाव के बीचोबीच संसद का विशेष सत्र बुलाया जाएगा। आलोचकों का मानना था की दाल में कुछ काला है। मामला “कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना” वाला है। और वही निकला। नारी वंदन के मुखौटे के पीछे दरअसल यह संसद का स्वरूप बदलने का खेल है ताकि बीजेपी को अगला चुनाव जीतने में दिक़्क़त ना हो। यह चुनावी लोकतंत्र का देश-काल-पात्र बदलने के एक बड़े खेल का एक हिस्सा है।
आखिर संसद के विशेष सत्र से मात्र 36 घंटे पहले इसमें पेश होने वाले संविधान (131 वाँ संशोधन) विधेयक की प्रति सार्वजनिक हो गई है। सवाल यह है की अगर यह विधेयक महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कोई क्रांतिकारी कदम उठाने वाला था तो इसे जनता और महिलाओं से इतना छुपा कर रखने की क्या जरूरत थी? जाहिर है की इस संविधान संशोधन के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत चाहिए, जो सरकार के पास नहीं है। इसलिए विपक्ष के समर्थन के बिना यह पारित नहीं हो सकता। ख़ुद प्रधानमंत्री ने विपक्ष से इसका समर्थन करने का आग्रह किया था। तो फिर इसकी प्रति विपक्ष के नेताओं को भी समय से क्यों नहीं दी गई? विपक्ष ने बार बार आग्रह किया कि सरकार इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुला का आम सहमति बनाए। इसे क्यों नहीं माना गया? और ऐसी क्या आफ़त थी कि संसद का सत्र बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव प्रचार के बीचों बीच चुनाव से एक सप्ताह पहले बुलाया जाये?
विधेयक की प्रति सार्वजनिक होने के बाद यह राज कुछ हद तक खुल गया है। जैसी कि आशंका थी, यह प्रस्तावित संविधान संशोधन महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के बारे में नहीं बल्कि संसद का पुनर्गठन करने के बारे में है। महिला आरक्षण के बारे में सिर्फ इतना है कि संविधान के अनुच्छेद 334 (क) में संशोधन कर महिलाओं के लिए सीट आरक्षित करने के लिए नई जनगणना के आंकड़ों का इंतज़ार करने की जरूरत नहीं रहेगी। इस संशोधन के अनुसार अब 2029 के लोक सभा चुनाव में महिलाओं को आरक्षण दिया जा सकेगा। मगर इसे कोई क्रांतिकारी कदम मानने से पहले याद कीजिए कि महिला आरक्षण में जनगणना और परिसीमन का फच्चर आया कहाँ से था। सच यह है कि 2023 में संसद और विधान सभा में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण देने वाला संशोधन लाते वक्त मोदी सरकार ने बिना वजह यह शर्त डाल दी थी कि यह तभी लागू होगा जब नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर नया परिसीमन होगा। मतलब महिला आरक्षण को 10 साल के लिए टाल दिया था। विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने मांग की थी कि इस शर्त को हटाया जाए और महिला आरक्षण को 2024 चुनाव से लागू किया जाए। सरकार ने इस माँग को ख़ारिज कर दिया। अब वही सरकार उसी माँग को पाँच साल बाद लागू कर क्रांतिकारी परिवर्तन का श्रेय लेना चाहती है।
संविधान संशोधन का यह विधेयक मुख्यतः लोकसभा और विधान सभाओं के पुनर्गठन के बारे में है। पहली नज़र में यह प्रस्ताव लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या की सीमा वर्तमान 547 (वास्तविक संख्या 543 है) से बढ़ाकर 815 करने का है। इस विस्तार के पक्ष में मजबूत तर्क हो सकते हैं, चूंकि लोक सभा क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या बहुत बढ़ गई है। सीटों की संख्या डेढ़ गुना बढ़ाने से हर क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या घटेगी। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा है। लेकिन असली मुद्दा यह नहीं है। इस विधेयक का सबसे बड़ा और ख़तरनाक बदलाव यह है कि पिछले पचास साल से लोक सभा की सीटों में राज्यों के हिस्से में फेरबदल पर लगी रोक हटा ली जाएगी। फ़िलहाल संविधान के अनुच्छेद 82 में प्रावधान है कि राज्यों को 1971 की जनगणना के अनुपात में सीटें मिलेंगी। इस रोक की मियाद 2026 में ख़त्म होती है। पिछले कई महीने से प्रधानमंत्री और बीजेपी के तमाम नेता बार बार कह रहे हैं कि लोकसभा की कुल संख्या में बढ़ोतरी होगी, लेकिन राज्यों के अनुपात को जस का तस रखा जाएगा। यानी अगर लोक सभा की कुल संख्या डेढ़ गुना होगी तो उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 140 हो जाएगी, साथ में केरल की सीटें 20 से बढ़कर 30 हो जाएगी। ग़ैर हिंदी भाषी प्रदेश चिंता ना करें, ऐसा आश्वासन दिया गया।
लेकिन संविधान संशोधन का मसौदा इस वादे की अनदेखी करता है। इस संशोधन में प्रस्ताव है कि अनुच्छेद 55, 81, 82, 170 और 332 में संशोधन कर 1971 की जनगणना वाला प्रावधान हटा दिया जाए। लेकिन वर्तमान अनुपात को बनाये रखने का कोई जिक्र नहीं है। ऐसा होते ही अनुच्छेद 82 के अनुसार जनसंख्या के अनुरूप सीटों का बंटवारा करना अनिवार्य हो जाएगा। अगर नया परिसीमन 2011 के आंकड़ों के अनुसार होता है और लोक सभा की संख्या डेढ़ गुना हो जाती है तो केरल की सीटें 20 से बढ़कर सिर्फ़ 23 होंगी, जबकि उत्तर प्रदेश की सीट 80 से बढ़कर 132 हो जायेंगी। आनुपातिक रूप से केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, ओडिशा, बंगाल और पंजाब को घाटा होगा, जबकि हिंदी भाषी प्रदेशों को फ़ायदा। इससे हिंदी और ग़ैर हिंदी भाषी प्रदेशों का नाजुक संघीय संतुलन बिगड़ जाएगा। तमिलनाडु के मुख्य मंत्री ने इसके ख़िलाफ़ जो चेतावनी दी है उसपर गौर ना करना राष्ट्रीय एकता के लिए घातक हो सकता है।
यही नहीं, अगर यह संशोधन पारित हो जाता है तो लोक सभा में राज्यवार सीटें बांटने का प्रावधान संविधान की बजाय संसद के बनाये कानून द्वारा तय होगा। मतलब यह बंटवारा किस जनगणना के आधार पर हो यह फैसला करते वक्त सरकार को विपक्ष की सहमति नहीं चाहिए, क्योंकि आगे से इसके लिए संविधान संशोधन की जरूरत नहीं होगी। यह फैसला अब परिसीमन आयोग करेगा। गौरतलब है कि सरकार इस संविधान संशोधन के साथ एक परिसीमन कानून का विधेयक भी लेकर आई है। इसके अनुसार नया परिसीमन 2011 की जनगणना के अनुरूप होगा। लेकिन सरकार जब चाहे संसद में सामान्य बहुमत से इसे बदल सकती है, चाहे तो 2027 के परिसीमन के मुताबिक़ कर सकती है।
सरकार जानती है की ऐसा संशोधन संसद में दो-तिहाई बहुमत नहीं पा सकता। सवाल यह है की यह जानते हुए ऐसा विभाजनकारी प्रस्ताव लाने के पीछे सरकार की क्या मंशा है?
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