शंकराचार्य से लेकर कैमराचार्य तक: अयोध्या का नाट्यीकरण पूरा, और कैसे याद रखा जाएगा इस तारीख को!

अयोध्या स्थित नवनिर्मित राम मंदिर का आज अभिषेक हो रहा है। इसे लेकर देश के वातावरण पर अवय शुक्ला की टिप्पणी

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अवय शुक्ला

बीते करीब एक सप्ताह ने यह स्थापित कर दिया है कि हास्यास्पद और विचित्र हरकतें करना न केवल हमारा राष्ट्रीय शगल है, बल्कि अब यह हमारे समाज और सत्तारूढ़ शासन का मूलमंत्र भी है। एक दिन मैंने एक कुर्ता खरीदने के बारे में सोचा, वैसा नहीं जैसा कि मिंत्रा जैसी ऑनलाइन दुकानों पर बहुत ही फैंसी और महंगे मिलते हैं, बल्कि ऐसा जो एक पेंशनभोगी की जेब पर भारी न पड़े, खासतौर से तब, जब उसे चार महीने से डीए नहीं मिला हो क्योंकि उसकी राज्य सरकार इस पैसे से गोबर और गौमूत्र खरीद रही है।

मैं लोकल मार्केट पहुंचा, वहां कुर्ते तो बहुत से थे, लेकिन सबके सब एक ही रंग के...पीले। दुकानदार ने बताया कि ये सारे जजमान कुर्ता हैं और अगले सप्ताह होने वाले अयोध्या राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के सम्मान में बाजार में आए हैं। और इससे मुझे लगा कि हमें देश के चीफ जस्टिस के प्रति इस मामले में थोड़ी नर्मी बरतनी चाहिए कि वे पछले दनों भगवा कुर्ता पहनकर एक मंदिर में गए थे, आखिर उन्हें भी तो दूसरे रंग का कुर्ता नहीं मिला होगा न! वैसे यह तथ्य कि हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसले सरकार के पक्ष में दिए हैं, तो इसे महज संयोग ही माना जाए।

चलिए अयोध्या में जो कुछ चल रहा है उस पर आते हैं, और ऐसा लगता है कि देश में कोई पांचवां शंकराचार्य भी है, जो दिल्ली में रहता है, और आश्चर्य नहीं कि इससे बाकी असली चारों को खतरा महसूस हो रहा है। वैसे भी हिंदू धर्म की प्रथाएं कॉलेजियम वाले तौर-तरीकों से चल नहीं सकतीं, लेकिन मास्टर ऑफ दि रॉस्टर नियम का पालन तो हो सकता है, और यह महानुभाव कौन हो सकते हैं, इसका अनुमान लगाने के लिए कोई ‘कौन बनेगा करोड़पति’ जैसा पुरस्कार नहीं मिलने वाला।

लेकिन एक बात तो माननी पड़ेगी कि वह जिस साहस और अनूठेपन को दिखाते हैं और तमाम विरोधाभासों को पछाड़ते हुए पार निकल जाते हैं, इसके लिए वे इस पद के पूरी तरह हकदार हैं: पिछले साल नए संसद भवन के स्पष्ट रूप से एक राजनीतिक अवसर को सहजता से एक धार्मिक आयोजन में बदल दिया गया था, और अब राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के एक विशुद्ध धार्मिक समारोह को एक बड़े राजनीतिक आयोजन में बदल दिया गया है!

राजनीति और धर्म को एक सुप्रीम व्यक्ति में सहजता से मिश्रित कर दिया गया है, और लगता है बहुत जल्द शंकराचार्यों को भी मार्ग दर्शक मंडल भेज दिया जाएगा, हालांकि यह अभी थोड़ा मुश्किल लगता है। दरअसल, चारों असली शंकराचार्यों को कभी भी मंदिर प्रतिष्ठा का सर्वेसरवा होने की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए थी, क्योंकि हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री जैसे "असाधारण शक्तियों वाले सुपरमैन" ने कभी भी रेल मंत्री को किसी ट्रेन की हरी झंडी दिखाने का मौका न दिया हो, आखिर वह इस आध्यात्मिक उद्घोष वाले आयोजन में किसी और को कैसे कोई मौका दे सकते थे।


या फिर एक घायल संविधान, जो अब भारत आयुष्मान योजना के तहत वेंटिलेटर पर है, जिसके अनुच्छेद 370 को भले ही सार्वजनिक रूप से हटा दिया गया हो, लेकिन अनुच्छेद 27 (जो सरकार को किसी भी धर्म के प्रचार और रखरखाव के लिए करदाताओं के पैसे का उपयोग करने से रोकता है) को बहुत ही खामोशी से चुप करा दिया गया है। और सरकार द्वारा सभी केंद्रीय कार्यालयों और सरकारी कंपनियों के कर्मचारियों को 22 जनवरी को आधे दिन की छुट्टी देने को प्रसाद पर सज्जा की परत के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

मेरे हिसाब के मुताबिक इससे सरकार को करीब 250 करोड़ रुपए का घाटा होगा। कल्पना करो कि ये सारे लोग जय श्रीराम का नारा लगाते हुए लोकल ठेके पर पहुंचेंगे और अंतत: पोलिंग बूथ तक। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि अब इस दिन को हर साल एक छुट्टी की तरह मनाया जाएगा।

और, अचानक हमारे कार्पोरेट्स के लिए अयोध्या एलडोरैडो (16वीं शताब्दी का एक ऐसा शहर जिसके पास अकूत दौलत थी) बन गया है, जो रेमोरा मछली (इसे पायलट मछली भी कहते हैं) की तरह इससे चिपके जा रहे हैं, जमीनों के दाम तीन गुना तक बढ़ चुके हैं, बड़े होटल और विलासितापूर्ण बंगले, मॉल, एयरपोर्ट, ओल्ड एज होम्स, होम स्टे आदि उग रहे हैं, जो हर महीने आने वाले अनुमानित 40 लाख भक्तों के लिए उपलब्ध होंगे।

शंकराचार्य से लेकर कैमराचार्य तक: अयोध्या का नाट्यीकरण पूरा, और कैसे याद रखा जाएगा इस तारीख को!

एक एयरलाइन जिसकी प्रतिष्ठा अब अपने यात्रियों को विमानों और एयर ब्रिज पर ही घंटों इंतजार कराने के तौर पर हो चुकी है, और जो यात्रियों को रनवे पर ही भोजन परोसती है, उसने अयोध्या जाने वाली अपनी उड़ानों को नाट्यमंच बना गिया है। उसका विमान अमला रामायण के पात्रों के वेश में नजर आता है, पायलट राम बन जाता है, सीता और लक्ष्मण यात्रियों का द्वार पर स्वागत करते हैं। हालांकि हनुमान जी नजर नहीं आए, हो सकता है वह किसी अन्य मिशन हों जिसमें किसी ऐसे द्वीप को आग लगाने का जिम्मा दिया गया हो जो भगवान द्वारा चुने गए व्यक्ति का मजाक उड़ाने का साहस रखता हो।

अयोध्या का डिज्नीकरण लगभग पूर्ण हो चुका है। जल्द ही अक्षय कुमार उर्फ अखंड कुमार अपनी नई फिल्म शुरु करेंगे, बशर्ते उन्हें सत्ता की गोद में बैठने से फुर्सत मिल जाए या फिर अमिताभ का अगला शो होगा, कौन बनेगा शंकराचार्य?

राम मंदिर के लिए जिन्होंने वर्षों तक मेहनत की, उनमें से निश्चित रूप से कोई वहां नहीं होगा, और इस तरह हमारे देश का नाम अब कुक्कूलैंड रखा जा सकता है, जिसकी प्रथा है कि काम कोई करे और नाम किसी और का हो। ऐसे में आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसों की मौजूदगी के कोई मायने नहीं होंगे, जिन्होंने मंदिर निर्माण के लिए खून-पसीना बहाया था। मंदिर के भक्त मंदिर से बाहर होंगे और मौकापरस्त मंदिर के अंदर।


लेकिन मेरे अपने राज्य की नारी भक्ति, अरे नारी शक्ति की ध्वजावाहक कंगना रनौत को निमंत्रण न मिलना कुछ ज्यादती है। अयोध्या उनके कुछ नाज-नखरे उठा लेता और हिमाचल को उनकी अनुपस्थिति का फायदा ग्लैशियर के पिघलने की रफ्तार धीमी पड़ने से होता। मुझे लगता है कि बीजेपी से गलती हो गई इस मामले में क्योंकि वह उनकी इतिहास की समझ को संशोधित कर देश की स्वतंत्रता की नई तारीख 2014 के बजाए 22 जनवरी 2024 कर सकती थी।

तो फिर आप पूछेंगे कि 2014 की तारीख का क्या होगा? तो सुनिए, इस दिन को अब क्विट थिंकिंग मूवमेंट यानी सोचना छोड़ो आंदोलन के तौर पर याद किया जाएगा। लेकिन मैं सुप्रीम लीडर की दुविधा को समझ सकता हूं- यहां तक कि अमित मालवीय के पास उपलब्ध सभी एआई उपकरणों के बावजूद, आवेशित रनौत के आते ही कैमरे को पांचवें शंकराचार्य पर केंद्रित रखने में कठिनाई होती। आप जानते हैं, एल्गोरिदम की भी अपनी सीमाएं होती हैं। एआई कृत्रिम तो हो सकती हैं, लेकिन मूर्ख नहीं है।

शंकराचार्य से लेकर कैमराचार्य तक: अयोध्या का नाट्यीकरण पूरा, और कैसे याद रखा जाएगा इस तारीख को!

(नोट: मेरा मानना ​​है कि, सुश्री रनौत का पहाड़ों से उग्र प्रवाह की तरह उतरना भा गया है और उन्हें अभिषेक के लिए आमंत्रित कर दिया गया है। और इसके बाद वह पूरे उत्साह के साथ सोशल मीडिया पर इसका ऐलान भी कर रही हैं। उन्हें आगामी चुनावों के लिए मनाली से टिकट मिलने की संभावना भी प्रबल हो गई है, और इससे वहां के बाकी उम्मीदवार चिंता में पड़ गए हैं। अगर कांग्रेस को कोई मौका मिलने की उम्मीद है तो अब उसे वहां से सनी लियोनी को वहां से मैदान में उतारने के बारे में सोचना पड़ेगा।)

(अवय शुक्ला एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी और द डिप्टी कमिश्नर्स डॉग एंड अदर कोलीग्यूज़ के लेखक हैं। वह avayshukla.blogspot.com पर ब्लॉग लिखते हैं)

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