बांग्लादेश चुनाव: इधर कुआं, उधर खाई की हालत में भारत

बांग्लादेश में आम चुनाव होने वाले हैं। भारत, चीन और अमेरिका के लिए इसके क्या मायने हैं और क्यों? 

फोटो: सोशल मीडिया
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सुबीर भौमिक

बांग्लादेश में चुनावी समर का बिगुल बज चुका है। वहां 7 जनवरी, 2024 को 12वीं बार संसदीय चुनाव होने जा रहा हैं। इसमें सत्तारूढ़ अवामी लीग का मुकाबला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी के विपक्षी गठबंधन से है। इसके साथ ही, इस मामले में चीन और अमेरिका के बीच टकराव का भी मंच तैयार हो गया है जबकि भारत इस बात को लेकर ऊहापोह में है कि वह 50 से अधिक वर्षों से अपनी मित्र अवामी लीग के समर्थन के लिए किस हद तक जाए।

बांग्लादेश में हुए पिछले आम चुनावों में जिस बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई, उसे देखते हुए अमेरिका ने साफ कर दिया है कि वह चाहता है कि चुनाव एक ‘तटस्थ कार्यवाहक’ प्रशासन के तहत हो जिसमें राजनीतिक या नौकरशाही निकायों के बजाय गैर-राजनीतिक नागरिक समाज समूह हों। 

चीन की तरह भारत भी अपने भू-राजनीतिक हितों के मद्देनजर चाहता है कि अवामी लीग की सत्ता में वापसी हो। भारत चाहता है कि उसकी पूर्वी सीमा पर ऐसा पड़ोसी हो जो उसकी सुरक्षा और कनेक्टिविटी संबंधी चिंताओं का ध्यान रखे। इसके बावजूद वह बांग्लादेश में धोखाधड़ी से भरा एक और चुनाव नहीं चाहेगा क्योंकि इससे भारत को अपने रणनीतिक साझेदार अमेरिका के साथ मोल-तोल की स्थिति का सामना करना पड़ेगा। चीन भी सत्ता में शेख हसीना को बने देखना चाहता है जबकि अमेरिका चाहता है कि वह नहीं लौटें और दोनों की वजह एक ही है- हिन्द महासागर में और अधिक पहुंच और नियंत्रण हासिल करने के लिए। 

यह चुनाव सत्तारूढ़ अवामी लीग और बीएनपी के लिए अस्तित्व संबंधी चुनौती तो पेश करता ही है, यह देश की प्रमुख इस्लामी पार्टी, जमात-ए-इस्लामी के लिए मौके की एक खिड़की भी खोलता है। जमात का पंजीकरण चुनाव आयोग द्वारा रद्द कर दिया गया था और जब पार्टी ने पंजीकरण बहाल करने की अपील की तो उदार इस्लामी समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाली बैरिस्टर तानिया अमीर ने इसका जमकर विरोध किया और जमात की अपील खारिज कर दी गई। अदालत में नाकामयाब रहने के बावजूद जमात ने गुप्त रूप से उन चार उग्रवादी समूहों को साथ रखा है जो बड़े पैमाने पर हिंसा के लिए जाने जाते हैं: आजम स्क्वायड, रौजन स्क्वायड, अल हजरत स्क्वाड और जमातुल-अंसार-फिल-हिंदल शरकिया। 

इसका नतीजा कश्मीर शैली की ‘यूनाइटेड जिहाद काउंसिल’ है जो इसे उन तमाम लोगों के लिए आकर्षक बनाती है जो तबाही की सियासत में दिलचस्पी रखते हैं। अवामी लीग अगर ऐसे हालात बनाना चाहती है जो आपातकाल को वाजिब ठहराए, तो बीएनपी अवामी लीग को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए हिंसा का सहारा ले सकती है और अपने-अपने कारणों से अमेरिका, पाकिस्तान और इस्लामी दुनिया के दूसरे कट्टरपंथी देश अवामी लीग को सत्ता से बाहर होते देखना चाहते हैं। 


भारत की जो स्थिति है, उसमें उसके लिए ज्यादा कुछ करने की गुंजाइश नहीं दिखती। अगर अवामी लीग चुनाव जीतती है तो उसके लिए सबसे अच्छा। लेकिन दिक्कत की बात यह है कि भारत का रणनीतिक साझीदार अमेरिका प्रधानमंत्री हसीना की अवामी लीग को सत्ता से बाहर करने पर आमादा है, ऐसे में भारत को ढाका में एक इस्लामी गठबंधन के साथ तालमेल बैठाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

वैसे, हसीना ने छह साल पहले भारत की तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पर बीएनपी-जमात गठबंधन का समर्थन करने और विदेशी खुफिया एजेंसी रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) के ऑपरेशन के जरिये उनकी सरकार को गिराने का आरोप लगाया था। उनकी कट्टर प्रतिद्वंद्वी और 2001 से 2006 तक बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहीं खालिदा जिया का कार्यकाल भी भारत के लिए बुरा रहा क्योंकि इस दौरान बांग्लादेश स्थित इस्लामी कट्टरपंथियों या जातीय अलगाववादियों द्वारा पूर्वी और उत्तर-पूर्व भारत में आतंकवादी हमलों को अंजाम दिया गया। 

बेगम हसीना के साथ भारत के रिश्ते बेहतर रहे और उन्होंने पूरी सख्ती के साथ आतंकवाद विरोधी कार्रवाई को सिरे चढ़ाया और इस तरह भारत की सुरक्षा और कनेक्टिविटी चिंताओं को पूरी मजबूती के साथ संबोधित किया। इसके साथ ही पारगमन और तटीय शिपिंग समझौतों ने भारत की मुख्य भूमि और उत्तर-पूर्व के बीच कनेक्शन को आसान बना दिया। वैसे, नदी जल बंटवारे के मुद्दे का समाधान न निकलने के कारण उन्होंने दक्षिणपंथी हिन्दुत्व पार्टी से थोड़ी दूरी बना ली। 

इस प्रकार, जबकि भारत स्पष्ट रूप से बीएनपी के साथ अपने दांव लगाने को तैयार नहीं है, वह अवामी लीग के भीतर एक मजबूत इस्लामी लॉबी की बढ़ती ताकत को रोकने में हसीना की हालिया विफलता से भी असहज है।

हसीना के सलाहकार सलमान फजलुर रहमान और सूचना मंत्री हसन महमूद के नेतृत्व में इस्लामवादियों ने पार्टी में अधिकतम चुनावी नामांकन हासिल करने में कामयाबी हासिल की है और 1971 के मुक्ति संग्राम की विरासत के प्रति दृढ़ता से जुड़ी भारतीय समर्थक हस्तियों को किनारे कर दिया है। भारत समर्थित आजादी की लड़ाई के दिग्गज और पूर्व उद्योग मंत्री अमीर हुसैन अमू की जगह पर मोहम्मद शहाबुद्दीन चुप्पू (सलमान रहमान के बेक्सिमको और मसूद एस. आलम समूह द्वारा समर्थित) जैसे अपेक्षाकृत छोटे कद के व्यक्ति को राष्ट्रपति के रूप में चुनना अपने आप में सारी कहानी बयां करता है। 

हाल ही में अवामी लीग ने जिन्हें टिकट दिए, उन 300 उम्मीदवारों में से 69 का जमात जैसी इस्लामी पार्टियों से सक्रिय नाता रहा है जबकि 48 चीन के साथ मजबूत व्यापार संबंध वाले व्यवसायी हैं।


ढाका में इस तरह की चर्चाएं गरम हैं कि विवादों और संभवत: हेराफेरी से घिरे इस चुनाव में इस समूह के कामयाब होने की उम्मीदें हैं और अगर ऐसा होता है तो वह सलमान रहमान को उप प्रधानमंत्री और उनके साथियों को प्रमुख मंत्रालय देने की मांग करेगा। इस तरह की अ‍टकलों का बाजार इसलिए भी गर्म है कि हाल ही में दिल्ली में आयोजित ग्लोबल इकोनॉमिक पॉलिसी फोरम की बैठक में वित्त मंत्री मुस्तफा कमाल ने नहीं बल्कि रहमान ने भाग लिया था। 

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि रहमान का पीएम हसीना पर पूरा नियंत्रण है और उन्हें ही ‘असली’ पीएम के रूप में देखा जाता है। इतना ही नहीं, हसीना के बेटे सजीब वाजेद जॉय की रहमान के साथ एक मजबूत व्यापारिक साझेदारी है। उनकी प्रमुख कंपनी बेक्सिमको और उसकी सहायक कंपनियों ने 1971 के नरसंहार को लेकर बांग्लादेशी संवेदनाओं को दरकिनार करते हुए 14 अगस्त को पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में मोटे पैसे वाले विज्ञापन दिए। 

हसीना ने बेशक ज्यादा दर पर अडानी के साथ बिजली खरीद समझौता करके दिल्ली को खुश कर दिया लेकिन भारत का राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनयिक प्रतिष्ठान एक भरोसेमंद सहयोगी को तेजी से चीन की ओर जाते देख चिंतित है। अमेरिकी दबाव और घरेलू इस्लामवादियों के घरेलू राजनीतिक पैंतरेबाजी- दोनों से बचने के लिए बाहरी समर्थन के लिए। इस तरह भारत की स्थिति इधर कुआं, उधर खाई वाली हो गई है। भारत बांग्लादेशियों के बीच तेजी से अलोकप्रिय भी हो रहा है। वे हसीना और उनके भारतीय समर्थकों को 2013-14 और 2018-19 में निष्पक्ष चुनाव से वंचित करने के साथ-साथ बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और अनियंत्रित मूल्य वृद्धि के लिए दोषी ठहराते हैं। 

हसीना को प्रभावित करने की भारत की क्षमता अब तक के सबसे निचले स्तर पर है क्योंकि हसीना भारतीय समर्थन से ज्यादा फायदेमंद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीनी वीटो को मानती हैं। 

हसीना को प्रभावित करने की नई दिल्ली की क्षमता सीधे तौर पर अवामी लीग के भीतर भारत के प्रभाव से जुड़ी है। यदि ढाका में दिल्ली के पसंदीदा लोगों को व्यवस्थित रूप से बाहर कर दिया जाता है, तो इसका असर दूसरे तरीके से भी पड़ेगा। उदाहरण के लिए, बांग्लादेश के दूरसंचार और बुनियादी ढांचे क्षेत्र में चीन की लगभग पूरी पैठ हो चुकी है जिसमें तीस्ता नदी की चीनी-वित्त पोषित ड्रेजिंग जैसी परियोजनाएं भी शामिल हैं।

अमेरिका द्वारा हसीना को सत्ता से हटाने के लिए सड़क पर आंदोलन तेज करने के लिए इस्लामी गठबंधन का समर्थन करने के साथ-साथ भारत पर यह दबाव कि वह हसीना को पद छोड़ देने के लिए मनाए, फिलहाल की स्थिति में भारत और चीन रक्षात्मक मुद्रा में आ गए हैं और राउंड-1 में अमेरिका हावी दिख रहा है। यह अजीब बात है कि भारत और चीन एक क्षेत्रीय मुद्दे पर खुद को एक ही पाले में पा रहे हैं।  

अब लाख टके का सवाल है: (क) क्या चीन हसीना को सत्ता में बनाए रखने के लिए अपने यूएनएससी वीटो का इस्तेमाल कर सकता है, जैसा कि उसने अब तक म्यांमार की सैन्य जुंटा को बचाने के लिए किया है; (ख) क्या भारत अवामी लीग को बचाए रखने के लिए रणनीतिक साझेदार अमेरिका के साथ एक बड़ा टकराव मोल लेगा, और (ग) क्या अमेरिका बांग्लादेश में अपने शासन परिवर्तन के एजेंडे को बिना शर्त आगे बढ़ाएगा या हसीना को वहां रहने की अनुमति देने के लिए भारत के साथ कोई समझौता करेगा। 

---  ---- सुबीर भौमिक बीबीसी और रॉयटर्स के पूर्व संवाददाता हैं और उन्होंने एशियाई संघर्ष पर पांच पुस्तकें लिखी हैं

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