बांग्लादेश: ऐतिहासिक बोझ उतार फेंकने का समय 

भले ही बांग्लादेश में कोई भी पार्टी भारत समर्थक के तौर पर नहीं दिखना चाहती, लेकिन दोनों देश दुश्मन बनकर नहीं रह सकते।

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के जनाजे में शामिल होने सड़कों पर उतरे लोग (फोटो - Getty Images)
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जवाहर सरकार

शेख हसीना का 5 अगस्त 2024 को पतन ऐसी घटना थी जिसके बारे में सब पहले से ही कह रहे थे, सिवाय नई दिल्ली के ‘सरकारी ऑपरेटरों’ के जो अपने दबंग एजेंडे पर कायम रहे। ‘मुख्य सलाहकार’ के तौर पर मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में आनन-फानन बनाई गई अंतरिम सरकार ने हालात और बिगाड़ दिए और बांग्लादेश में ‘आतंक का राज’ शुरू हो गया। करीब 400 पुलिस स्टेशन फूंक दिए गए। एआई समर्थित सर्च परिणाम बताते हैं कि ‘अगस्त 2024 से अब तक भीड़ हिंसा में 600 से ज्यादा मौतें, बदले की हिंसा में 250 मौतें और 40 गैर-न्यायिक हत्याएं हुई हैं’। बेशक इनमें कुछ हिन्दू भी थे, लेकिन पीड़ितों में ज्यादातर मुसलमान और अवामी लीग के समर्थक थे।

ऐसे समय में भारत का गुस्से भरी बयानबाजी की जगह संयम और समझदारी भरी कूटनीति का सहारा लेना ज्यादा फायदेमंद हो सकता था। अपने गुस्से को हर हाल में वाजिब ठहराते हुए भारत ने सुविधाजनक तरीके से इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि देश में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना एक राष्ट्रीय शौक बन गया है। पिछले एक दशक में भारत में 100 से ज्यादा मुसलमानों को पीट-पीटकर मार डाला गया (केवल 2025 में भीड़ हिंसा में 25 मुसलमानों की मौत हुई)।

भारत में बांग्लादेश विरोधी जो गुस्सा फैला, उसे मोटे तौर पर सिखाए-पढ़ाए मीडिया ने हवा दी। सत्ताधारी दक्षिणपंथी हिन्दू पार्टी के गैर-जिम्मेदार सोशल मीडिया पोस्ट में साफ तौर पर न सिर्फ बांग्लादेश और बांग्लादेशी मुसलमानों के खिलाफ, बल्कि भारत में लंबे समय से रह रहे बांग्लाभाषी नागरिकों के खिलाफ भी नफरत फैलाई गई।

18 दिसंबर 2025 को शरीफ उस्मान हादी की मौत (दो बाइक सवार हमलावरों की गोलीबारी में) के बाद भारत विरोधी भावना की नई लहर शुरू हुई। 2024 के छात्र विद्रोह के प्रमुख नेता और भारतीय दबदबे के मुखर आलोचक हादी के तीखे बयान 2026 के चुनावों से पहले खासे लोकप्रिय हो रहे थे। 

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1947 की हिंसा ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से हिन्दुओं के भारत पलायन को बढ़ावा दिया जिससे वहां हिन्दू आबादी 28 फीसद से घटकर 8 फीसद रह गई। लेकिन इनमें कई हिन्दुओं और बंगाली मुसलमानों ने भी बेहतर आर्थिक मौके की तलाश में पलायन किया था। फिर भी, सीमा के दोनों ओर जहरीले तत्वों को नफरत में डूबे रहने के लिए नियमित ‘खुराक’ की जरूरत होती है। लिहाजा, भारत को हर ज्यादती या उकसावे पर प्रतिक्रिया से बचना चाहिए।

बांग्लादेश के मतदाताओं ने अभी अपने पत्ते खोले नहीं हैं और भारत ने अब तक आधिकारिक तौर पर पड़ोस में अपना एकमात्र दोस्त ‘खोया’ नहीं है। कोई भी और गलती बहुत घातक और लंबे समय वाला नतीजा दे सकती है। नहीं भूलना चाहिए कि कई बांग्लादेशी मुसलमानों को बंगाली हिन्दू ‘भद्रजन’ के खिलाफ जायज ऐतिहासिक शिकायत है, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के दो सदियों के दौरान शोषणकारी जमींदारी का जमकर फायदा उठाया और शिक्षा तक पहले और बेहतर पहुंच के कारण सरकारी नौकरियों पर कब्जा कर लिया।


कई भारतीयों को शिकायत है कि बांग्लादेशी अपनी आजादी के लिए शास्वत ऋणी नहीं। यह याद रखना जरूरी है कि बांग्लादेशियों ने खुद पाकिस्तान और उसकी सेना का सामना करने में कितनी कुर्बानियां दीं। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में हमेशा एहसानमंद रहने जैसी कोई चीज नहीं होती। उदाहरण के लिए, वियतनाम अब चीन के प्रति दुश्मनों जैसा सलूक करता है, जबकि चीन ने ही अमेरिका से लंबे युद्ध में उसका सबसे ज्यादा साथ दिया। इसके अलावा, जैसा कि कार्पमैन के ड्रामा ट्रायंगल का साइकोलॉजिकल मॉडल दिखाता है, एक समय के बाद बचाने वाले की भूमिका को असल समस्या को सुलझाने वाले की जगह दोषी ठहराने के चश्मे से देखा जाता है। 

भारत ने जनवरी 1972 में ढाका पर (अनुपस्थित) मुजीबुर रहमान को थोपकर पहली बड़ी गलती की, और इस क्रम में जियाउर रहमान जैसे लोगों को नजरअंदाज करके उन्हें नाराज कर दिया जबकि असल में इन्होंने ही जमीन पर पाकिस्तान की गोलियों का सामना किया था। मुक्ति वाहिनी को 16 दिसंबर 1971 को ढाका में भारतीय सेना के सामने पाकिस्तानी सेना के सरेंडर का गवाह बनने से अलग रखने का अपमान आज भी चुभता है। इसके बाद भारत ने मुजीब की बढ़ती तानाशाही और कथित भ्रष्ट शासन का साथ दिया, जबकि 1974-75 में बाढ़-भुखमरी ने बांग्लादेश को तबाह कर दिया था। सरकारी अनुमानों के मुताबिक, मरने वालों की संख्या करीब 27 हजार थी, जबकि स्वतंत्र अध्ययनों के मुताबिक यह संख्या 15 लाख तक हो सकती है।

भारतीयों को इस सच्चाई से अनजान रखा गया, इसलिए मुजीब की नाकामियों के लिए भारत के प्रति नफरती गुस्से में बांग्लादेश में मुजीब की मूर्तियों और स्मारकों को नुकसान पहुंचाए जाने से भारतीय हैरान हैं। नरेन्द्र मोदी के भारत ने तब भी आंखें फेर लीं जब हसीना ने 2009 से 2025 के बीच प्रधानमंत्री के तौर पर भ्रष्ट तानाशाही का वही पैटर्न दोहराया। पिछले तीन चुनाव साफ तौर पर धांधली वाले थे, लेकिन भारत के चुनाव आयोग द्वारा भेजे गए पर्यवेक्षकों ने हर बार स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की शानदार रिपोर्ट दी।

जिस बात ने बांग्लादेशियों को और ज्यादा तकलीफ पहुंचाई, वह थी शेख हसीना का एक ऐसे व्यक्ति के सामने झुकना जिसे मुसलमान और आजाद दुनिया नापसंद करती है। वे तब हैरान रह गए जब उन्होंने भारत के चहेते पूंजीपति गौतम अडानी को फायदा पहुंचाने के लिए 2015 में झारखंड के गोड्डा में अपने 1600 मेगावाट के कोयला प्लांट से बिजली निर्यात करने के लिए 1.7 अरब डॉलर की डील पक्की करवाई। रिपोर्ट बताती हैं कि प्रधानमंत्री और उनके विदेश मंत्री ने पर्दे के पीछे से काम करके 163 पेज का एकतरफा बिजली खरीद समझौता कराया जिसके तहत बांग्लादेश को हर साल अडानी को 4.55 अरब देने होंगे, भले बिजली सप्लाई हो या न हो।

एक सांसद के तौर पर मैंने विदेश मंत्री के सामने अडानी द्वारा लागत और कीमत में हेरफेर करके ज्यादा मुनाफा कमाने का मुद्दा उठाया था। उन्होंने गोलमोल जवाब दिया, लेकिन हसीना के शासन के दौरान हुए जनआंदोलनों ने अडानी को कीमतें घटाने पर मजबूर कर दिया। जाने-माने बांग्लादेशी अर्थशास्त्री देबप्रिया भट्टाचार्य का अनुमान है कि हसीना के शासन के दौरान सालाना 16 अरब डॉलर बाहर गया। हसीना के कितने विरोधी पुलिसिया टॉर्चर में मारे गए, इसकी कोई जानकारी नहीं। 


फिर भी, मोदी के भारत ने पक्का किया कि हसीना सत्ता में बनी रहें। इससे हसीना के अत्याचारों के खिलाफ गुस्सा भारत के प्रति नफरत में बदल गया। इस्लामिक राइट ने हसीना के हटने का पूरा फायदा उठाया, और बड़ी तादाद में बांग्लादेशियों को अपनी ओर खींचा ताकि भारत के साथ हिसाब बराबर कर सके और भारत के दक्षिणपंथी हिन्दुओं और सरकार द्वारा मुसलमानों को निशाना बनाने का विरोध किया जा सके।

अब आगे क्या? सबसे पहले, भारत को शेख हसीना पर अपनी निर्भरता घटानी चाहिए। अवामी लीग बांग्लादेश में बैन है, लेकिन अब भी सेक्युलर वोटों का बड़ा हिस्सा उसके पास है और हसीना की बात उनके लिए बहुत मायने रखेगी। हसीना को दलगत राजनीति से ऊपर उठना चाहिए। इस समय, देश भर में नेटवर्क वाली अकेली और ऐतिहासिक रूप से संगठित पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) है, जो अवामी की कट्टर दुश्मन है और सत्ता में आती-जाती रही है।

बीएनपी की स्थापना जियाउर रहमान ने की और 1981 में उनकी हत्या के बाद उनकी पत्नी बेगम खालिदा जिया ने पार्टी की कमान संभाली। वह दो बार प्रधानमंत्री रहीं। 31 दिसंबर 2025 को उनकी मृत्यु से उनके बेटे और उत्तराधिकारी तारिक रहमान के लिए सहानुभूति की एक बड़ी लहर पैदा हुई, जो उनकी मृत्यु से ठीक छह दिन पहले लंदन में 17 साल के निर्वासन के बाद बांग्लादेश लौटे थे और बीएनपी की बागडोर उन्हीं के हाथ है। 

जमात-ए-इस्लामी का उदय नाटकीय रहा। यह एक कट्टर भारत-विरोधी, हिन्दू-विरोधी, पाकिस्तान-समर्थक दक्षिणपंथी पार्टी है जिसने बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध में धोखा दिया और स्वतंत्रता सेनानियों और महिलाओं पर अत्याचार किए। इसने पहले भी बीएनपी की मदद की है, लेकिन सत्ता में कभी नहीं रही। इस्लामिक ताकतों और भारत-विरोधी कैंपों से मिले फंडिंग से मालामाल जमात ने ऐलान किया है कि उसका समय आ गया है। पूर्व छात्र कार्यकर्ताओं द्वारा यूनुस के आशीर्वाद से बनाई गई नेशनल सिटिजन्स पार्टी (एनसीपी) को जमीनी स्तर पर समर्थन नहीं है। जमात के साथ उसके चुनावी गठबंधन से कई युवा नेता, खासकर महिलाओं ने पार्टी छोड़ दी। 

बीएनपी या किसी भी दूसरी पार्टी का भारत-विरोध चिंता की मुख्य बात नहीं। यह तो हमने खुद पैदा किया है। अहम बात यह है कि बीएनपी का जमीनी स्तर मजबूत नेटवर्क है, इसके पास काबिल नेता हैं और बेगम खालिदा जिया की मौत के बाद उसे सहानुभूति वोट मिलने की संभावना है। हालांकि बीएनपी भारत की दोस्त नहीं रही है, लेकिन तारिक रहमान ही शायद अकेले ऐसे नेता हैं जो बांग्लादेश की मुश्किल राजनीतिक बिसात पर बची-खुची चीजों को बचा सकते हैं। हालांकि बांग्लादेश में कोई भी पार्टी भारत समर्थक नहीं दिखना चाहती, लेकिन दोनों देश दुश्मन बनकर तो नहीं रह सकते।

 (जवाहर सरकार पूर्व नौकरशाह और राज्यसभा सांसद हैं।)

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