असम में बीफ पर पाबंदी क्या जनजातीय समुदाय के खानपान के अधिकार का उल्लंघन नहीं!

असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा गोमांस की बिक्री पर प्रतिबंध जैसे कदम उठाकर पूर्वोत्तर में संघ के सबसे मुखर संरक्षक के तौर पर उभर रहे हैं। लेकिन गोहत्या पर रोक लगाने-संबंधी कदम में इस बात को भुला दिया गया है कि पूरा गोवंश दुधारू नहीं होता।

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पैट्रीशिया मुखिम

असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने हाल में एक राष्ट्रीय टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में असम में गोहत्या और गोमांस की बिक्री पर प्रतिबंध को पुरजोर ढंग से उचित ठहराया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इस रोक का किसी ने- न हिन्दू ने और न मुसलमान ने विरोध किया और असम तथा पूर्वोत्तर के किसी अखबार ने इस मुद्दे पर कोई लेख भी नहीं छापा है।

तब क्या यह किसी एकरूपता अभियान की शुरुआत है जहां जनजातियों से अपने सांस्कृतिक अधिकार और भोजन का चयन करने की इच्छा को त्यागने की अपेक्षा की जा रही है? असम में बड़ी जनजातीय आबादी रहती है- बोडो, कारबी, डिमासा आदि। ये लोग काफी पहले से बीफ खाते रहे हैं। क्या वे अब असम के नागरिक नहीं माने जाते और कि क्या सिर्फ हिन्दूऔर मुसलमान का ही आग्रहपूर्वक जिक्र किया जाना चाहिए?

इस किस्म के कदम उठाकर शर्मा पूर्वोत्तर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सबसे मुखर संरक्षक के तौर पर उभर रहे हैं। लेकिन गोहत्या पर रोक लगाने-संबंधी कदम में इस बात को भुला दिया गया है कि पूरा गोवंश दुधारू नहीं होता। कुछ का पालन-पोषण खास तौर से बीफ के लिए ही किया जाता है।

जनजातीय लोगों के लिए बीफ एकमात्र प्रोटीन है जो आसानी से उपलब्ध है और पच जाता है। यह सदियों से उनके खानपान का हिस्सा है। फलदार पौधे, मछली, सी फूड, अंडे-जैसे अन्य प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ का खर्च सामान्यतः वे नहीं उठा सकते। पांच आदमी के परिवार में दो बार के खाने में आधा किलोग्राम बीफ से उनका काम चल जाता है। जनजातीय लोगों के खाने-पकाने का तरीका यह है कि वे बीफ उबाल लेते हैं और सब्जियों के साथ उन्हें भून लेते हैं। इसका सूप उतना ही पोषक तत्व देता है जितना मीट।


यहां के पहले निवासी बोडो रहे हैं। इस पूरे विमर्शमें जनजातीयस्वर को पूरीतरह समाप्त कर दिया गया है। इतिहास में यह भीदर्ज है किअसमीहिन्दूजातिउत्तर और पूर्वीभारतसे आकर असम में बस गई। इसलिए आश्चर्यनहीं किउनकीजड़ें ब्राह्मणवादीहैं।

उदयन मिश्र-जैसे इतिहासकारों ने आज के असम बनने में भारतीय आर्य और ऑस्ट्रो-मंगोलियाई लोगों के जुड़ने और समावेशी हो जाने की बात कही है। अपने शोध- इमिग्रेशन एंड आइडेन्टिटी ट्रांसफॉर्मेशन इन असम, में मिश्र कहते हैं कि आज जिन्हें असमीया अहमिया समुदाय कहते हैं, वह आर्यीकरण की प्रक्रिया के साथ- साथ ब्रह्मपुत्र घाटी में अहम शासन के उत्थान और सुदृढ़ीकरण से संबंधित है। अहम राजाओं ने हिंदू धर्म अंगीकार किया, असम में वैष्णवाद ने जड़ें जमाईं और जनजातियों का एक वर्ग भी हिन्दू बन गया- इन तथ्यों का यह मतलब नहीं कि असम हिन्दू राज्य है। इससे काफी अलग, यहां ऐसे लोग हैं जिनके लिए उनकी जनजातीय पहचान अब भी सबसे प्रमुख है और जो अपने मूल धर्म का अनुसरण करते हैं।

इस किस्म की विविधताओं के कारण लोगों के खाने-पीने की आदतों में बाधा और उनके खान-पान को एक रूप करने वाला कानून भारतीय संविधान में दी गई उस गारंटी में बाधा लगता है जिनका उसे अधिकार दिया गया है। अगर किसी जनजातीय परिवार के खानपान में बीफ महत्वपूर्ण हिस्सा है और वे इससे पौष्टिक पदार्थ हासिल करते हैं, तो क्या कोई सरकार उस खाद्य पदार्थ का उसका अधिकार उससे छीन सकती है? क्या जीवन का अधिकार इसके रास्ते में नहीं आता है?

(लेखक शिलांग के प्रतिष्ठित पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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