बरमूडा त्रिकोण नहीं, बड़ौदा त्रिकोण कहें जनाब, जिससे डिग्री से लेकर इतिहास तक गायब हो जाता है...

बरमूडा त्रिकोण कुख्यात रहा है विशालकाय जहाजों से लेकर हवा में उड़ते विमानों तक को गायब कर देने के लिए। लेकिन ऐसा ही तो भारत में हो रहा है। हजारों करोड़ के एनपीए से लेकर इतिहास तक गायब हो रहा है, और किसी को पता ही नहीं चल रहा कि ये सब जा कहां रहा है।

बीजेपी और पीएम मोदी 2014 से ही तमाम वादे कर रहे हैं, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा है
बीजेपी और पीएम मोदी 2014 से ही तमाम वादे कर रहे हैं, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा है
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अवय शुक्ला

बरमूडा त्रिकोण अटलांटिक सागर के उत्तर-पश्चिम में वह इलाका है जो जहाजों और हवाई जहाजों के रहस्यमय तरीके से गायब हो जाने की खबरों के लिए कुख्यात रहा है। इन घटनाओं ने दशकों से समुद्र विज्ञानियों और वैज्ञानिकों को उलझाए रखा है और अब तक इसका कोई विश्वसनीय जवाब नहीं मिल सका है। इसके संभावित कारणों में चुंबकीय ब्लैक होल, गहराइयों में परस्पर विरोधी धाराओं का बहना, अचानक तूफान, एलियंस से लेकर समुद्र तल से निकलने वाली मीथेन गैस के कारण एक छोटे से हिस्से में समुद्र की सतह का अचानक ऊपर उठ जाना बताए जाते हैं। 

लेकिन लगता है कि बरमूडा त्रिकोण  ने अपनी जगह बदल ली है और अब इसने भारतीय उपमहाद्वीप को अपना ठिकाना बना लिया है; संभव है जल्द ही इसे ‘बड़ौदा त्रिकोण’ कहा जाने लगे। वजह साफ है, यहां से भी बहुत कुछ गायब होने लगा है। हां, यहां से जहाज और विमान नहीं बल्कि विचार, इतिहास और तथ्य गायब होने लगे हैं। इनके गायब होने का सिलसिला एक ‘खास’ व्यक्ति की विश्वविद्यालय की डिग्री के गायब होने के साथ शुरू हुआ। किसी को नहीं पता कि इसका कोई वजूद है भी या नहीं। इसे खोजने के बड़े प्रयास किए गए लेकिन इसके एक-एक निशान जैसे फुर्र हो गए।

अब तो एमएच 370 विमान की तरह ही केवल अंदाजा लगा सकते हैं कि यह कहां हो सकता है। फिर बारी आई सार्वजनिक पैसे की। दसियों हजार करोड़ रुपये गायब हो गए (और गायब होना अब भी जारी है); माना जाता है कि उन्हें केमैन आइलैंड्स और सेंट किट्स जैसे अटलांटिक के हिस्सों में ‘टेलीपोर्ट’ कर दिया गया। लेकिन कोई भी इसके बारे में निश्चित नहीं हो सकता क्योंकि किसी ने इस पैसे को देखा ही नहीं। जिन्होंने ये पैसे लिए थे, वे भी गायब हो गए। 

तमाम अन्य फंड के पैसे भी गायब हो गए, जैसे इलेक्टोरल बॉन्ड या पीएम केयर फंड, या फिर जिसे एनपीए कहा जाता है। कोई नहीं जानता कि ये पैसे कहां गए। उनके बारे में सारी जानकारी आरटीआई (सूचना का अधिकार) अधिनियम नाम के एक ‘ब्लैक होल’ में चली गई है जिससे कुछ साल पहले किसी तरह की रोशनी का निकलना बंद हो चुका है। यही हाल एक दूसरे टूटे हुए तारे- भारतीय चुनाव आयोग- का है। इससे भी अब किसी तरह की कोई रोशनी नहीं निकलती और इसने अपने आपको पूरी तरह अंधकार में रखना कबूल कर लिया है। 


न्याय की अवधारणा के साथ-साथ अपराधी और हत्यारे भी हवा में गायब होते दिख रहे हैं। मेरठ जिले में 1987 में हाशिमपुरा में पुलिस द्वारा 79 मुसलमानों का नरसंहार इसका एक उदाहरण है। 36 साल और 900 सुनवाई के बाद पिछले ही महीने सभी 39 अभियुक्तों को बरी कर दिया गया है। फरवरी, 2002 में गुजरात के नरोदा पाटिया में 11 मुसलमानों की हत्या के आरोपी भी गायब हो गए। मामले के सभी 68 अभियुक्तों को पिछले महीने की 20 तारीख को न्यायाधीश ने बरी कर दिया। तो आखिर इन सबको किसने मारा- एलियंस? चुंबकत्व? हम कभी नहीं जान पाएंगे क्योंकि ‘बड़ौदा त्रिकोण’ आसानी से अपने रहस्य नहीं छोड़ता।

पिछले कुछ वर्षों में 12,00,000 (12 लाख) से अधिक एचएनआई (हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल) भारत से गायब हो गए हैं। वे अपनी संपत्ति भी साथ ले गए। पिछले पांच वर्षों में 650,000 (साढ़े छह लाख) हेक्टेयर वन भूमि का अस्तित्व गायब हो गया। हजारों मतदाता लगातार मतदाता सूची से गायब हो जाते हैं, शायद इसलिए कि उन्होंने सत्ता के खिलाफ मतदान किया होगा।

बड़ी परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों के बारे में जो कुछ भी थोड़ी-बहुत जानकारी सरकारी बदहाल पोर्टल्स से मिल जाया करती थी, वह भी गायब हो गई है: केंद सरकार ने हाल ही में फरमान सुनाया कि वेब पोर्टल ‘परिवेश’ जो इस तरह की जानकारी पोस्ट करता था, अब ऐसा नहीं किया करेगा। कारण? यह गोपनीय डेटा है और अब इसे केवल आरटीआई आवेदनों के माध्यम से हासिल किया जा सकता है, और आरटीआई आवेदनों के बारे में अब हमें पता चल गया है कि वे जैसे ही फाइल किए जाते हैं, कूड़ेदान में फेंक दिए जाते हैं।

ईथर में काफूर हो जाने का ताजा उदाहरण है भारतीय इतिहास और विज्ञान का एक बहुत बड़ा हिस्सा। महात्मा गांधी के प्रति दक्षिणपंथी विरोध, आरएसएस पर प्रतिबंध, गुजरात में 2002 के नरसंहार, औद्योगिक क्रांति, आपातकाल, लोकप्रिय संघर्ष और आंदोलन, जाति व्यवस्था और अछूतों के संदर्भ और नक्सली आंदोलन से जुड़े तथ्यों की तरह ही मुगलों को अचानक पृथ्वी से गायब कर दिया गया है।


इन रहस्यमयी ताकतों ने विज्ञान को भी नहीं बख्शा है- डार्विन के विकास के सिद्धांत को परे खिसका दिया गया है। साथ ही ग्लोबल वार्मिंग सहित पर्यावरण के मुद्दों को भी भुला दिया गया है। क्या अगली बारी न्यूटन और आइंस्टीन, ऑरवेल और हक्सले, शेक्सपियर और स्टाइनबेक या फिर उमर खय्याम और खलील जिब्रान की है?

बीजेपी ने 2014 में सत्ता में आने के लिए कई वादों के साथ भी ऐसा ही किया था- हर साल 2 करोड़ नई नौकरियां, हर बैंक खाते में 15,00,000 रुपए (15 लाख रुपए), 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था, 2022 तक किसानों की आय दोगुनी, सहकारी संघवाद। ये सब भी हवा में उड़ गए हैं, और भले ही लाखों मतदाता उन्हें ढूंढ़ने के लिए इधर-उधर भाग रहे हों लेकिन अब तक जो-कुछ हाथ लगा है, वह यह कि यह एक ‘जुमला’ था। क्या असली था, कुछ नहीं पता। 

आखिरकार, पूरब हमेशा से एक रहस्यमयी जगह रही है।

 पुनश्च: बीजेपी बहुत बुरी हो सकती है लेकिन यह मूर्ख नहीं है। जो वर्तमान को नियंत्रित करता है, वह अतीत को नियंत्रित करता है, और जो अतीत को नियंत्रित करता है, वही भविष्य को नियंत्रित करता है। ‘संपूर्ण राजनीति विज्ञान’ का कम-से-कम यह हिस्सा तो मोदी ने अच्छी तरह से पढ़ा है, चाहे उनके पास कोई डिग्री हो या नहीं।

(अवय शुक्ला रिटायर्ड आईएएस अधिकारी हैं।)

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