खरी-खरी: मुस्लिम घृणा पर टिका है बीजेपी का अस्तित्व, नुपूर जैसों पर कार्रवाई तो सिर्फ दिखावा है

बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा एवं संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने बयानों से भले लगी आग को कुछ बुझाने की कोशिश की हो लकिन खुद पीएम मोदी ने अभी तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा होने वाली घटना पर एक शब्द भी नहीं बोला है और न ही वह इसके खिलाफ कुछ बोलेंगे।

फोटो : सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

यह संभव ही नहीं कि भारत जैसे विशाल एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद महत्वपूर्ण देश की आंतरिक राजनीति और विदेश नीति एक-दूसरे से अलग हो। बीजेपी के दो प्रवक्ताओं के हजरत मोहम्मद एवं उनकी पत्नी के संबंध में आपत्तिजनक बयान से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मचे बवाल से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि बीजेपी देश में मुस्लिम समुदाय की हर प्रकार की दुर्गति करती रहे और बाहर विदेशों में इस संबंध में कोई प्रतिक्रिया ही न हो। आप स्वयं देख रहे हैं कि नूपुर शर्मा एवं नवीन कुमार जिंदल ने जिस प्रकार हजरत मोहम्मद एवं उनकी पत्नी का टीवी डिबेट पर अपमान किया, उससे केवल अरब देशों में ही नहीं बल्कि यूएनओ तक में इस मामले में बवाल उठ खड़ा हुआ। नौबत यहां तक आई कि बीजेपी को इन दोनों प्रवक्ताओं के विरुद्ध कार्रवाई करनी पड़ी। सऊदी अरब से लेकर अरब खाड़ा के छोटे-बड़े हर देश और बाहर तुर्की, इंडोनेशिया, मलेशिया जैसे देशों ने हजरत मोहम्मद के संबंध में अपमान की केवल निंदा ही नहीं की बल्कि इन सभी देशों की सरकारों ने हमारे राजदूतों को बुलाकर चेतावनी भी दी। अरब खाड़ी देशों में डिपार्टमेंटल स्टोर्स ने भारतीय माल का बहिष्कार कर दिया। तनिक-सी चूक से भारत के अरब एवं मुस्लिम देशों के साथ रिश्तों में खटास आ गई और देश बेवजह समस्या में घिर गया।

इसमें कोई शक नहीं कि बीजेपी एवं स्वयं सर संघचालक मोहन भागवत ने अपने बयानों से आग तो बुझाई लेकिन इन देशोों के साथ रिश्तों में मनमुटाव तो हो गया। सवाल है कि यह स्थिति आई कैसे? इस सवाल का जवाब देते हुए संघ परिवार एवं बीजेपी की ओर से कहा जा रहा है कि यह गलती ‘फ्रिंज एलिमेंट’, अर्थात हिन्दुत्व घराने के छुटभैयों की ओर से हुई है। पहली बात तो किसी भी पार्टी के प्रवक्ता को फ्रिंज एलिमेंट नहीं कहा जा सकता है। पार्टी का प्रवक्ता पार्टी की आवाज होता है। हर मामले पर दिए गए बयान एवं उसका हर शब्द पार्टी की नीतियों का आईना होते हैं। ऐसी स्थिति में यह मान लेना कि नूपुर एवं नवीन ने टीवी डिबेट में जो कुछ बोला, वह बीजेपी के विचार नहीं थे, तनिक कठिन बात है।

यह तो कहा जा सकता है कि उन्होंने इस्लाम के संस्थापक हजरत मोहम्मद के प्रति जिस प्रकार के अश्लील शब्द प्रयोग किए, पार्टी उनके प्रति ऐसी भाषा का इस्तेमाल कदापि नहीं करती। यदि हिन्दुत्व को मुस्लिम दृष्टिकोण से अलग कर दें, तो फिर कुछ बचता ही नहीं है। इसी प्रकार बीजेपी से मुस्लिम विरोध एवं मुस्लिम नफरत अलग कर दी जाए, तो बीजेपी का अस्तित्व ही समाप्त हो जाए। बीजेपी की हर चुनावी रणनीति ही मुस्लिम घृणा एवं अपमान पर आधारित होती है और इसका प्रचार पार्टी के सर्वश्रेष्ठ नेताओं से आरंभ होता है।


आपको याद दिलाऊं, स्वयं नरेंद्र मोदी कैसे हिन्दू हृदय सम्राट बने। सन 2002 में गुजरात दंगों में मुस्लिम नरसंहार के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में क्या किया। आपको यह भी याद होगा कि वह उस समय कहते थे ‘हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है।’ दूसरे शब्दों में वह गुजरात में मुस्लिम नरसंहार को केवल एक ‘प्रतिक्रिया’ मानते थे। तभी तो आज तक मोदी ने कभी मुस्लिम नरसंहार की निंदा नहीं की। और तो और, सन 2014 में एक साक्षात्कार में पत्रकार ने जब उनसे सवाल किया कि क्या आपको गुजरात दंगों में मारे जाने वाले लोगों का दुख है, तो उनका जवाब था, ‘हां, उतना ही जितना एक कुत्ते के पिल्ले के सड़क पर कुचले जाने का दुख होता है।’ फिर गुजरात चुनाव में वह घूम-घूम कर ‘हम पांच, उनके पचीस’ कहते फिर रहे थे। इसी प्रकार सन 2017 में यूपी चुनाव को ‘कब्रिस्तान बनाम श्मशान घाट’ का रंग स्वयं मोदी ने दिया। अभी सन 2022 में यूपी विधानसभा चुनाव के समय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ‘80 बनाम 20’ का डंका बजा रहे थे। मुस्लिम घृणा का प्रचार ही बीजेपी की चुनावी जीत का प्रमुख अंग होती है।

जाहिर है कि जिस पार्टी का आधार मुस्लिम घृणा हो, उसके मन में मुस्लिम समाज की आस्था के प्रति कितना सम्मान होगा, यह आप भलीभांति समझ सकते हैं। तभी तो केवल नूपुर शर्मा और नवीन कुमार जिंदल ही नहीं बल्कि संघ परिवार का हर सदस्य आए दिन किसी-न-किसी प्रकार मुसलमान ही नहीं, उसकी मान्यताओं एवं आस्था का भी अपमान करता रहता है। हरियाणा में खुले स्थलों पर जुमे की नमाज पर पाबंदी क्या मुस्लिम आस्था का अपमान नहीं है। यह पाबंदी हरियाणा सरकार की ओर से लगाई गई थी एवं इसका प्रचार स्वयं मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने किया था। इसी प्रकार अजान को लाउडस्पीकर की आड़ में रोकना भी मुस्लिम धर्म पर सीधी चोट है। कुल मिलाकर यह कि मुस्लिम समाज से घृणा ही बीजेपी की राजनीति एवं चुनावी रणनीति है। यदि वह ऐसा न करे, तो उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है।

इस परिप्रेक्षष्य में अब कहना कि यह पार्टी नहीं कुछ फ्रिंज एलिमेंट्स की हरकत है, आंख में धूल झोंकने जैसी बात है। अब सवाल यह है कि नूपुर एवं नवीन के खिलाफ कार्रवाई करने के बाद क्या बीजेपी मुस्लिम घृणा से दूर हो जाएगी। यह संभव ही नहीं है क्योंकि जिस संस्था का आधार ही मुस्लिम घृणा हो, ऐसी संस्था के नेता एवं कार्यकर्ताओं के मन में रातोंरात इस्लाम एवं उसके संस्थापक के प्रति प्रेमभाव कैसे उत्पन्न हो सकता है। यह बात समझ में ही नहीं आती है। भले ही अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण अभी कुछ समय बीजेपी एवं संघ का लहजा थोड़ा बदल जाए।


बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा एवं सर संघचालक मोहन भागवत ने पिछले सप्ताह अपने बयानों से भले लगी आग को कुछ बुझाने की कोशिश की हो लकिन स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अभी तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा होने वाली घटना पर एक शब्द भी नहीं बोला है और न ही वह इसके खिलाफ कुछ बोलेंगे। वह इस घटना को चुनाव के समय बीजेपी के पक्ष में जमकर इस्तेमाल भी कर सकते हैं। नरेन्द्र मोदी ने जीवन में कुल एक सरमाया इकट्ठा किया है और वह है ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ की छवि। क्या नरेंद्र मोदी इस्लाम एवं उसके संस्थापक के पक्ष में खड़े होकर इस छवि पर आंच आने देंगे। जिस नेता ने ‘सबका साथ, सबका विकास’ जैसा नारा देने के बाद मुसलमानों की टोपी पहनने से इनकार कर दिया हो, भला उस नेता के मन में इस्लाम धर्म के प्रति प्रेमभाव एवं सम्मान कैसे हो सकता है।

अब देश को इस हठ एवं घृणा की राजनीति का खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है। लेकिन बीजेपी एवं संघ ऐसी संस्थाएं हैं जिनके लिए केवल हिन्दुत्व हित ही सुप्रीम है।

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