बंगाल शांत न रहे, इसलिए अब छेड़ दिया गया है एक और 'बंगभंग' का राग, लेकिन तमाम मुश्किलें पैदा करेगा यह फैसला
बंगाल विभाजन की मांग करने वाले बारला को बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व का परोक्ष समर्थन हासिल है और बीजेपी यही चाहती है कि विभाजन की मांग के जरिये बंगाल को उबलता रखा जाए।

बीजेपी बंगाल में ऐसा कुछ-न-कुछ कर रही है ताकि यहां लोग परेशान हाल रहें। विधानसभा चुनावों में पराजय के बाद उसने यहां होने वाली हिंसा की कुछ घटनाओं को जान-बूझकर तूल दिया। फिर, मुख्य सचिव अलपन बंदोपाध्याय के लिए समस्या खड़ी की। उसके बाद राज्यपाल यह तक कह गए कि राज्य में लोकतंत्र खतरे में है। वैसे, यह कहना मुश्किल ही है कि अगर वह इस पद पर इस वक्त उत्तर प्रदेश में होते, तो क्या कर रहे होते। इन सबसे मन नहीं भरा, तो उत्तर बंगाल में अलीपुरद्वार के बीजेपी सांसद जॉन बारला ने उत्तर बंगाल के जिलों को मिलाकर अलग राज्य की मांग कर डाली। जलपाईगुड़ीके बीजेपी सांसद जयंत रॉय ने उनका समर्थन भी कर दिया।
सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने इस तरह के विचार को ही बेसिरपैर का बताया है और राज्य को फिर विभाजित करने के किसी भी प्रयास का हर संभव विरोध का संकल्प दोहराया है। राज्य बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष ने भी इस विचार को पार्टी से अलग बताया है और उलटे यह तक कहा है कि तृणमूल कांग्रेस झूठा प्रोपेगैंडा कर रही है। इस तरह के प्रस्ताव को यहां के लोग भी बंगाल विभाजन- बंगभंग, की तरह मान रहे।
जब इस विभाजन को 16 अक्टूबर, 1905 को लागू किया गया था, तब भी लोग इसके खिलाफ थे और इस दिन को पूरे बंगाल में शोक दिवस के रूप में मनाया गया था। गांधीजी मानते थे कि स्वतंत्रता आंदोलन में असली जागृति इस आंदोलन से ही हुई। गांधीजी ने ‘हिंद स्वराज’ में बाद में लिखा कि ‘बीज हमेशा दिखाई नहीं देता। वह अपना काम जमीन के नीचे करता है। और जब खुद मिट जाता है, तब पेड़ जमीन के ऊपर दिखने में आता है।’ वैसे, जब भारत का विभाजन हुआ, तब भी बंगाल को विभाजन का दर्द झेलना पड़ा क्योंकि इसका कुछ हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान में चला गया। यह हिस्सा अब बांग्लादेश बन गया है।
बीजेपी सांसद बारला बंगाल में तीन इलाकाई आंदोलनों की तरफ से बोलने का दावा कर रहे हैं। उत्तर बंगाल के मैदानी इलाकों में रहने वाले राजबंशी समुदाय के कुछ लोग ग्रेटर कूच बिहार और कामतापुर को मिलाकर अलग राज्य की मांग करते रहे हैं। वैसे, यह भी देखना होगा कि वह इसे केंद्रशासित क्षेत्र बनाए जाने की मांग का समर्थन करते हैं या नहीं। इस इलाके में लंबे समय से गोरखालैंड की मांग होती रही लेकिन इस आंदोलन से जुड़े लोगों ने इस तरह के विचार को पूरी तरह नकार दिया है। कामतापुर और ग्रेटर कूच बिहार के लिए आंदोलन धीरे-धीरे खत्म ही हो गए हैं लेकिन गोरखालैंड का मुद्दा भावनात्मक है। पहाड़ों और पास के दुआर और तराई इलाकों में नेपाली बोलने वाली आबादी के बीच बंगाल और बंगालियों के आधिपत्य का मसला सुलगता रहा है।
बारला ने केंद्रशासित क्षेत्र बनाने का विचार रखा है। यह भूगोल और मिश्रित आबादी की वजह से बिल्कुल भिन्न है। गोरखाओं के लिए यह कोलकाता की जगह सिलिगुड़ी से नियंत्रित होने-जैसा होगा। और पहाड़ों में सिलिगुड़ी को लेकर लगभग उतना ही बैर भाव है जितना कोलकाता से। बारला चाय जनजाति या आदिवासी समुदाय से आते हैं। उत्तर बंगाल में इस समुदाय का अच्छा-खासा दखल है। हाल के वर्षों में ये लोग बीजेपी को वोट देने लगे हैं लेकिन इनके बीच इस मुद्दे पर उनकी प्रतिक्रिया ठंडी ही रही है। आदिवासी विकास परिषद के राज्य अध्यक्ष बिरसा टिर्की बारला के प्रस्ताव को बेतुका मानते हैं। वह कहते हैं कि असम से लगते अलीपुरद्वार और कूच बिहार जिलों को छोड़कर ऐसी मांग का कहीं कोई समर्थन नहीं। हिंदी बोलने वाले व्यापारी समुदाय दिल्ली से या कोलकाता से शासित होने के नफा-नुकसान को जरूर तौल रहे होंगे।
अगर यह इलाका केंद्रशासित प्रदेश बनता है तो मध्य और दक्षिण बंगाल से बीजेपी का नामो निशान मिट जाएगा। इसलिए बारला को तब तक प्रत्यक्ष समर्थन से बीजेपी बचेगी जब तक वह बंगाल में अपनी संभावनाओं को लेकर पूरी तरह निराश न हो जाए। बीजेपी को इस दिशा में बढ़ने से पहले यह भी सोचना चाहिए कि ऐसा करने से असम समेत पूरे पूर्वोत्तर में पहचान आधारित मांग उभरने लगेगी। ग्रेटर कूच बिहार और कामतापुर में निचले असम के पांच जिले आते हैं। ऐसे में बोडो गुट शर्तिया ही अलग बोडोलैंड राज्य की मांग को जिंदा कर देंगे। कार्बी आंगलोंग भी प्रभावित हो जाएगा। क्या बीजेपी एक फैसले से इतनी सारी मुसीबतों को न्योता देगी?
नब्बे के दशक के शुरुआती समय में जॉन बारला को आरएसपी और कांग्रेस का समर्थन रहा और जब तक उन्होंने बिमल गुरुंग के गोरखा जनमुक्ति मोर्चे के साथ नजदीकियां बढ़ाने का फैसला नहीं किया था, वह आदिवासी विकास परिषद के एक अहम नेता हुआ करते थे। अब उन्हें बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व का परोक्ष समर्थन हासिल है और बीजेपी यही चाहती है कि विभाजन की मांग के जरिये बंगाल को उबलता रखा जाए। इसमें दो राय नहीं कि उत्तर बंगाल में बुनियादी ढांचे की हालत बेहद खस्ता है, बात चाहे स्वास्थ्य की हो या शिक्षा की। रोजगार के मौके बेहद कम हैं और इस क्षेत्र ने लगातार सरकारों की उपेक्षा झेली है। लेकिन इसका हल उत्तर बंगाल में मंत्रालय बनाने या फिर उत्तर कन्या में चमचमाते दफ्तर खोलने भर से नहीं होने वाला। क्षेत्र में चाय और पर्यटन पारंपरिक उद्योग रहे हैं जिनमें नए सिरे से जान फूंकने की जरूरत है। और इन सबके अलावा बंगाल में सांस्कृतिक विविधता है जिसे बचाया जाना चाहिए, न कि उसके बूते राजनीतिक कसरत की जाए।
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