बिहारः जातीय जनगणना के आंकड़ों का बड़ा संदेश, विशाल श्रम शक्ति के सही दिशा में उपयोग से बदल सकती है तस्वीर

अभी देश से बाहर जाने वाले श्रमिक विकसित राज्यों के होते हैं और महानगरों में जाने वाले सबसे अधिक उत्तर प्रदेश और बिहार के होते हैं। इस ’युवा शक्ति’ का बिहार और यूपी के ‘विकास’ में किस तरह उपयोग किया जा सकता है, यह नीति निर्माताओं को तय करना होगा।

विशाल श्रम शक्ति के सही दिशा में उपयोग से बदल सकती है तस्वीर
विशाल श्रम शक्ति के सही दिशा में उपयोग से बदल सकती है तस्वीर
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नवजीवन डेस्क

अगले कुछ सालों में आबादी की संरचनात्मक बनावट बदलने से तस्वीर बदलने वाली है। अगले कुछ सालों में आबादी की संरचनात्मक बनावट बदलने से दक्षिण के विकसित राज्यों में बुजुर्ग अधिक होंगे तो इसके उलट सबसे अधिक युवक पिछड़े राज्यों के होंगे। अभी देश से बाहर जाने वाले श्रमिक विकसित राज्यों के होते हैं और देश के महानगरों में जाने वाले सबसे अधिक उत्तर प्रदेश और बिहार के होते हैं। आने वाले दिनों में बिहार को विकसित राज्यों की कतार में खड़ा करने के लिए यह समय की मांग है कि श्रम शक्ति को उद्यमिता और विकास के नजरिये से सूत्रबद्ध किया जाए

बिहार के जाति सर्वेक्षण, 2023 ने जहां देश में जाति जनगणना कराने की मांग को गति दी है, वहीं बिहार की दुखद सामाजिक और आर्थिक तस्वीर भी फिर सामने आई है। मुल्क में सबसे अधिक घरेलू प्रवासियों से अर्जित आमदनी पाने वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश और बिहार शामिल हैं। रोजगार के साधन नहीं हैं तो स्वाभाविक है कि श्रमिक अन्य राज्यों की तरफ अपना रुख करेंगे। लेकिन अगले कुछ सालों में आबादी की संरचनात्मक बनावट बदलने से तस्वीर बदलने की उम्मीद है।

देश की डेमोग्राफिक प्रोफाइल बदल रही है। पॉपुलेशन प्रोजेक्शन फॉर इंडिया एंड स्टेट्स, 2001-2026 के अनुसार, सर्वाधिक विकसित राज्य केरल, तमिलनाडु और आंध्र में बुजुर्गों की आबादी 10 प्रतिशत से अधिक हो जाएगी। 2026 तक हर छठा भारतीय नागरिक और सीनियर सिटीजन केरल का होगा। दक्षिण के ये राज्य ऐसे हैं जहां के लोग विदेशों में काम करते हुए यहां पैसे भेजते हैं। मतलब, सबसे अधिक विदेशी रेमिटेंसेज एनआरआई यहां ही भेजते हैं।

डेमोग्राफिक प्रोफाइल में बदलाव का दूसरा दिलचस्प पहलू यह है कि सबसे अधिक आबादी वाले उत्तर प्रदेश और बिहार में बुजुर्गों की दर 6-7 प्रतिशत रहेगी। यह मुल्क में सबसे कम होगा। अभी देश से बाहर जाने वाले श्रमिक विकसित राज्यों के होते हैं और देश के महानगरों में जाने वाले सबसे अधिक उत्तर प्रदेश और बिहार के होते हैं। इस ’युवा शक्ति’ का बिहार और यूपी के ‘विकास’ में किस तरह उपयोग किया जा सकता है, यह नीति निर्माताओं को तय करना होगा।


बिहार के जाति सर्वेक्षण, 2023 को ठीक से पढ़-समझकर इस किस्म की दिशा तय की जा सकती है। सर्वेक्षण ने बताया है कि 2 करोड़ 76 लाख परिवारों में 94 लाख परिवार गरीब हैं। गरीबी के कारण बच्चे पढ़ नहीं पाते। उनकी शिक्षा जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे उनकी संख्या घटती जाती है। अकुशल रोजगार के लिए पलायन की यह बड़ी वजह है। गरीबी की मूल वजह उनका भूमिहीन होना है।

बिहार के जाति सर्वेक्षण 2023 में जमीन को शामिल नहीं किया गया है लेकिन बंद्योपाध्याय आयोग ने 2006-07 में राज्य के बारह जिलों के बारह गांवों में 7,605 परिवारों का सर्वेक्षण किया था। बिहार में अब 38 जिले हैं, पर करीब 17 साल पुरानी उस रिपोर्ट पर नजर डालना अनावश्यक नहीं होगा। उस सर्वेक्षण के अनुसार, इन 12 जिलों में भूमिहीनों की संख्या अति पिछड़ी जातियों में 35.4 प्रतिशत पाई गई, जबकि अनुसूचित जातियों में यह 30.9 प्रतिशत थी।

इसका मुख्य कारण था कि जहां-जहां भूमि सुधार कार्यक्रम लागू हुआ, वहां अनुसूचित जातियों पर तो ध्यान दिया गया लेकिन अतिपिछड़ी जातियां इससे वंचित रह गईं। आयोग ने सरकार से जमीन के पुनर्वितरण की वकालत की। बंद्योपाध्याय आयोग के पहले काका कालेलकर की अध्यक्षता में गठित पिछड़ा वर्ग आयोग ने भी 1955 में अपनी रिपोर्ट में भूमि सुधार की वकालत की थी। इसकी रिपोर्ट के वर्षों बाद 1990 में मंडल आयोग ने भी भूमि सुधार की सिफारिश की।

बंद्योपाध्याय आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, अनुसूचित जातियों में भूमिहीनों की संख्या 40 प्रतिशत से ज्यादा मिली, जबकि अनुसूचित जनजातियों में मात्र 3.8 प्रतिशत, उच्च जातियों में मात्र 2.2 प्रतिशत और पिछड़ी जातियों में भूमिहीनता कम पाई गई। मुसलमानों के बीच भूमिहीनता मात्र 10 प्रतिशत थी। पटना जिले के नूरीचक गांव में भूमिहीनता सबसे ज्यादा थी जबकि यहां अनुसूचित जातियों की संख्या 60 प्रतिशत है। मुजफ्फरपुर के मुसहरी प्रखंड में भूमिहीनों की संख्या 69 प्रतिशत थी। चंपारण के शिकारपुर में सबसे ज्यादा जमीन एक परिवार के हाथ में थी और भूमिहीनों की संख्या यहां 65 प्रतिशत मिली।


अब इसकी रोशनी में जाति सर्वेक्षण, 2023 में गरीबी पर एक नजर डालें तो पता चलेगा कि सबसे अधिक गरीबी अनुसूचित जाति और जनजातियों में लगभग 43 प्रतिशत है, जबकि अतिपिछड़ी जातियों की गरीबी 33.58 प्रतिशत और पिछड़ी जातियों में गरीबी की दर 33.16 है।

अति पिछड़ी जातियों की आबादी 4 करोड़ 70 लाख है। पढ़ाई में इसके 1 करोड़ 16 लाख बच्चे (24.65 प्रतिशत) वर्ग एक से पांच तक पहुंचे। उनकी संख्या वर्ग 6 से 8 में जाते-जाते घट कर 72 लाख (24.65 प्रतिशत) और वर्ग 9 से 10 के बीच घट कर 65 लाख (13.89 प्रतिशत) रह गई। उसके आगे, मतलब वर्ग 11 से 12 में उनकी संख्या 37 लाख (सिर्फ 7.95 प्रतिशत) रह जाती है और स्नातक तक पहुंचते-पहुंचते महज 20 लाख (4.27 प्रतिशत)।

साफ है कि अकुशल मजदूरी के लिए पलायन की मूल बड़ी दो वजह हैः भूमिहीन होना और अशिक्षा। बहुसंख्यक आबादी वाली जातियों के 63 हजार परिवार आवासहीन हैं। बिहार सरकार के श्रम विभाग ने बिहार से बाहर जाने वाले प्रवासी मजदूरों को लेकर पहली बार इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन से 2009-10 में एक अध्ययन कराया था। इसमें बताया गया कि बिहार से बाहर जाने वाले मजदूरों की संख्या लगभग 50 लाख है। 

परदेस, मतलब बिहार से बाहर विभिन्न राज्यों में जाने वालों में 91 प्रतिशत हिन्दू और 9 प्रतिशत मुसलमान हैं। इनमें पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों का हिस्सा 55 प्रतिशत है। प्रवासी मजदूरों में दलित समुदाय का बड़ा हिस्सा शामिल है। नवादा जिला से माइग्रेट करने वाले 72 प्रतिशत और सहरसा से माइग्रेट करने वाले 47 प्रतिशत दलित समुदायों के थे। बिहार से बाहर कमाने जाने वाले प्रवासी मजदूरों में अधिकांश 15 से 40 वर्ष की उम्र के थे। इन प्रवासी बिहारी मजदूरों के संबंध में जालंधर, लुधियाना, पानीपत और दिल्ली-एनसीआर में कराए गए सर्वेक्षण में लगभग 77 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे काम की तलाश में ही जाते हैं। फैक्टरियों में सामान्य मजदूरी करने वाले 85 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे पांच हजार तक कमा लेते हैं।

बिहार से जाकर परदेस में 9 वर्ष तक रहने वाले प्रवासी मजदूरों की तादाद 20 लाख से अधिक है। एनएसएसओ बताता है कि बिहार से पलायन करने वाले मजदूरों की तादाद 34 लाख है जबकि 2001 जनगणना के अनुसार यह संख्या 55,43,124 थी। बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों से बाहर जाने वाले आधे से अधिक मजदूर गरीब और अशिक्षित होते हैं और 20 प्रतिशत शिक्षित। बिहार के जाति सर्वेक्षण, 2023 के अनुसार, 12 करोड़ 32 लाख की आबादी में 53 लाख 72 हजार बिहारी बाहर थे। इसमें 16 लाख से अधिक अत्यंत पिछड़ी जाति के लोग रोजगार और शिक्षा के लिए देश के अन्य राज्यों के साथ विदेशों में थे।


बिहार से देश के बाहर नौकरी अथवा श्रम करने वाले श्रमिकों की संख्या 2012 में 84 हजार थी। मिनिस्ट्री ऑफ इंडियन ओवरसीज अफेयर की 2004-10 रिपोर्ट के अनुसार, 2004 से बिहार से देश के बाहर जाने वाले श्रमिकों, खासतौर से अरब देशों में जाने वालों की संख्या बढ़ती गई है। बिहार जाति सर्वेक्षण, 2023 के अनुसार बिहार से दूसरे देशों में जाने वालों की संख्या बढ़कर 2 लाख 17 हजार हो गई हैं, जिनमें सबसे ज्यादा अति पिछड़ी जातियों से हैं।

ग्रामीण आबादी के ग्रोथ में गिरावट का कारण पलायन, आबादी का स्वाभाविक विकास और ग्रामीण नगरों का विकसित होना है। फिर भी, राज्य में बड़े उद्योग लगाना संभव नहीं होने जा रहा है। पटना शहर की आबादी लगभग 20 लाख है। यहां इसे छोड़कर कोई दूसरा शहर दस लाख की आबादी वाला नहीं है। शहरीकरण की दर 2026 में 12 प्रतिशत रहने का अनुमान है। शहरीकरण के मामले में पंद्रह वर्षों बाद भी बिहार देश का बॉटम स्टेट बना रहेगा।

रिजर्व बैंक बुलेटिन की ताजा रिपोर्ट बताती है कि बिहार के फॉरेन सेक्टर जमा में भारी वृद्धि हुई है। वैसे, देश के 29 राज्यों और केन्द्र शासित राज्यों में केरल, महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात, पंजाब, तमिलनाडु, राजस्थान, दिल्ली और कर्नाटक जैसे राज्यों का प्रवासी धन में बड़ा हिस्सा होता है। इसे फॉरेन सेक्टर डिपॉजिट कहते और इस जमा का 83.7 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं राज्यों में होता है।

बिहार में पिछले पांच-छह साल में फॉरेन सेक्टर के जमा में उतार-चढ़ाव होता रहा है। 2005 के बाद इसमें गिरावट आई थी लेकिन 2007 में यह डेढ़ हजार करोड़ पहुंच गया। 2010 में यह 2,307 करोड़ रुपये के उच्चतम स्तर तक पहुंच गया। बिहार में हालांकि यह देश के कुल जमा का सिर्फ 2.2 प्रतिशत है। बिहार से अभी जो श्रमिक देश के बाहर अथवा दूसरे राज्यों में जाते हैं। उन्हें कुशल श्रमिक बनाने की लिए उद्यम करना होगा। मार्केट की मांग के अनुसार बिहारी श्रम शक्ति को तैयार करना होगा।

ऐसी आबादी को बोझ नहीं उसे डिविडेंड में बदल देना होगा। जैसा कि रिजर्व के तत्कालीन गवर्नर वाई.वी. रेड्डी ने 12 मई, 2006 को न्यूयार्क में कहा था कि भारत अपने वर्क फोर्स का डिविडेंड के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। अगर वर्क फोर्स को शिक्षा, कुशलता, स्वास्थ्य और गवर्नेंस की दृष्टि से बेहतर किया जाए तो बहुत कुछ किया जा सकता है। केन्द्र सरकार के स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम को लेकर इसमें काम किया जा सकता है।

(लेखक श्रीकांत वरिष्ठ पत्रकार हैं और जगजीवन राम शोध संस्थान, पटना के निदेशक रहे हैं)

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