बिहार चुनाव: महामारी से राज्य त्रस्त, नौकरियां अस्त, मजदूर पस्त, पर नीतीश सरकार मस्त!

एक ऐसे देश मे जहां महामारी संकट के बाद लोगो की नौकरियां जा रही हैं, किसान मजदूर बेहाल हैं, आर्थिक संस्थान अपने को दिवालियेपन से बचाने के लिए जूझ रहे है राजनीतिक पार्टियों की पार्टी जारी है।

फोटो: शैलेश कुमार सिंह
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शैलेश कुमार सिंह

पटना में दीघा घाट के पास बने नए पुल के नीचे गंगा की गोद मे स्थित खाली जगह पर एक गांव बस गया है। यहां सैकड़ों गाड़ियों का जमावड़ा देखा जा सकता है, जिन्हें आगामी विधानसभा चुनाव में जनता दल यूनाइटेड के प्रचार के लिए तैयार किया जा रहा है। सैकड़ों लोग दिन रात मेहनत कर इन गाड़ियों को तैयार कर रहे हैं। सभी गाड़ियों को एलइडी जैसी सुविधाओं के साथ लैस किया जा रहा है। गाड़ियों को तैयार करने का ठीका किसी खास एजेंसी को दिया गया है। पटना के गौरव नाम के व्यक्ति की देख रेख में ये तैयारी हो रही है। ये गाड़ियां हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र रेजिस्ट्रेशन नम्बर की हैं। हरियाणा की अधिकांश गाड़ियां एच आर 67 है। अर्थात इन्हें पानीपत से लाया गया है। इसके अलावा प्रचार की तैयारियों में धनबाद की मेगा स्टार नाम की एक ऐजेंसी भी संलग्न है। मेला सा लगा है। जो लोग गाड़ियों को तैयार कर रहे हैं उनकी सुख सुविधा के इंतेजाम के साथ बड़े स्क्रीन पर सिनेमा देखने और गाने सुनने की व्यवस्था भी की गई है।

फोटो: शैलेश कुमार सिंह
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इसे देखने मात्र से अहसास होता है कि आधुनिकता के साथ प्रजातांत्रिक चुनाव कितने बदल गए हैं। वो पुराना दौर गया जब राजनीतिक पार्टियां लोगो से गाड़ियां उधार या भाड़े पर मांगती थी। लेकिन आज चंदा उगाह कर ही सही उनकी अमीरी काफी बढ़ गयी है। एक राजनीतिक पर्यवेक्षक ने बताया कि बालू माफिया से बड़ी राशि राजनीतिक दलों को आ रही है।

फोटो: शैलेश कुमार सिंह
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एक ऐसे देश मे जहां महामारी संकट के बाद लोगो की नौकरियां जा रही हैं, किसान मजदूर बेहाल हैं, आर्थिक संस्थान अपने को दिवालियेपन से बचाने के लिए जूझ रहे है राजनीतिक पार्टियों की पार्टी जारी है। धड़ल्ले से एजेंसियां हायर की जा रही है। कुछ आई टी सेल बन के जनता को गुमराह करेंगी। इस काम के लिए आईआईटी से प्रशिक्षित पेशेवर मुंह मांगी कीमत पर हायर किये जाते हैं जिनको ये शोध करना होता है कि कैसे मतदाताओं को गुमराह किया जा सके।

फोटो: शैलेश कुमार सिंह
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बहरहाल चुनाव अब जनतांत्रिक और आत्मिक से ऊपर उठ चुके हैं। पुराने सामाजिक जातीय समीकरण तो आज भी कायम है लेकिन चुनावों की तैयारी कॉरपोरेट स्टाइल में लैपटॉप पर की जाती है। इस बात को खंगाला जाता है कि कौन से मुद्दों पर जोर देना है और विपक्ष की कौन सी रग पर चोट देना है। पैसा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पानी की तरह बहाया जाता है। सवाल ये भी है कि बिहार के जिस सत्तारूढ़ दल के पास लॉक डाउन के समय आपने प्रवासी मजदूरों को लाने के लिके गाड़ियां नही थी। उनके पास चुनाव शुरू होने से महीनों पहले भाड़े पर इतनी गाड़ियां कहां से मिल गयी। बहुत से मजदूर अपाहिज हो के घर लौटे, कुछ रास्ते मे मर गए। इतनी संवेदनहीनता कहां से जन्म लेती है। ये सुसज्जित गाड़ियां किसी लड़ाकू राफेल से कम नहीं है जो तैयार हो के विपक्ष की किलेबंदी को भेदने के लिए सड़क पर उतरेंगी। पैसे के कारोबार की हालत ये है कि भूत में जिस उम्मीदवार को टिकट मिलता था उसे पार्टी फंड से चुनाव लड़ने के लिए पैसे मिलते थे। आजकल उम्मीदवार करोड़ो रूपये पार्टी को दे के टिकट खरीद लेते हैं। इसे कहते हैं समय के साथ बदलाव। अंत मे राजनेताओं के के बारे में जनता क्या कहेगी।

अमृत की तलाश में जाम तक पहुंच गए, धीरे धीरे आप तो ईमान तक पहुंच गए

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