बीजेपी के पास देश के लिए कोई आर्थिक दृष्टि ही नहीं, इसीलिए आज भी जारी है राष्ट्रवाद की डफली बजाना

बीजेपी ग्रामीणों के हाथ में ज्यादा पैसे को अर्थव्यवस्था के लिए शुभ नहीं मानती जबकि यूपीए सरकार की नीति उनके हाथ में ज्यादा पैसे देकर विकास को गति देने की थी। नजरिये का यह फर्क आज की परेशानी का सबसे बड़ा सबब है।

फोटोः सोशल मीडिया
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भाग्यश्री पांडे

इस देश ने कभी सुना कि बेरोजगारी और गरीबी के उन्मूलन का कोई उपाय प्रधानमंत्री की ओर से आया हो? नरेंद्र मोदी के पास देश की हर समस्या का समाधान था, लेकिन तभी तक जब lk वे प्रधानमंत्री नहीं बने थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद तो उनके सारेआइडिया जैसे छू-मंतर हो गए।

हर चुनाव में, चाहे वह पूरे देश का हो या किसी राज्य का, बीजेपी राष्ट्रीयता के मुद्दे पर ही आकर टिक जाती है। आखिर बीजेपी देश के आर्थिक मुद्दों से भागती क्यों है? इसके पास मूल आइडिया की कमी क्यों हो जाती है? आखिर बीजेपी के पूरे विमर्श से आर्थिक मुद्दे सिरे से गायब क्यों हैं या फिर ये बयानबाजी और लंबी-चौड़ी बातों तक ही सीमित क्यों हैं?

दरअसल, अपने पूरे इतिहास में बीजेपी ने कभी आर्थिक योजना पर कोई बात नहीं की, न ही आज वह देश के 130 करोड़ लोगों को यह बताने की कोशिश कर रही है कि उसकी आर्थिक दृष्टि क्या है। इसके उलट इसने धर्म, हिंदुत्व, राष्ट्रीयता, मंदिर और गाय के मुद्दों पर लोगों को अपने साथ लाने की कोशिश की। यह भी गौर करने वाली बात है कि बीजेपी आज जिन योजनाओं पर काम कर रही है, उनमें से ज्यादातर की रूपरेखा कांग्रेस के जमाने में तय हुई। उज्ज्वला, जन-धन खाता, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना इत्यादि कांग्रेस के ही समय की हैं।

भारत आज नए आइडिया के मामले में जिस तरह पिछड़ रहा है, उसकी एक वजह वैकल्पिक आर्थिक योजनाओं के बारे में न सोच पाने की स्थिति को भी माना जा सकता है। तमाम तरह की छूटों और लक्षित योजनाओं का गरीबों के लिए लाभप्रद नहीं हो पाना एक प्रमुख कारण है जिससे बीजेपी को सरकार चलाने के लिए इतनी भारी-भरकम राशि की जरूरत पड़ रही है। इसके लिए एक ही उदाहरण पर गौर करना काफी होगा। बीजेपी सरकार ने उज्ज्वला योजना को बड़े उत्साह के साथ अपनाया। इसने पेट्रोल पंपों पर बड़े-बड़े होर्डिंग लगाकर लोगों से अपील की कि वे गरीबों के लिए सब्सिडी छोड़ दें। गैस के सिलेंडर गांवों तक पहुंच भी गए, लेकिन योजनाकारों को तब जाकर समझ में आया कि गांव के लोगों के पास करीब हजार रुपये देकर सिलेंडर को दोबारा भरवाने के लिए पैसे नहीं। जब आय लगातार कम हो रही है तो मुफ्त में आने वाली जलावन की लकड़ी का मोह भला कैसे छोड़ा जा सकता है ?

अब सवाल उठता है कि क्या लोगों की वास्तविक समस्याओं को हल करने में बीजेपी की विफलता ही वह कारण है कि सरकार मजबूर है कि जरूरत न होने पर भी राष्ट्रीयता का नगाड़ा पीटे? विधानसभा चुनावों से पहले बीजेपी के प्रचार अभियान पर नजर डालें तो काफी कुछ साफ हो जाता है। बीजेपी के नेताओं ने महाराष्ट्र के तमाम ग्रामीण इलाकों में प्रचार किया, लेकिन उन्होंने बात की अनुच्छेद 370, भारत में कश्मीर के विलय और विभाजन के दौरान सैनिकों के बंटने आदि की। लेकिन उन्होंने इसपर कोई बात नहीं किया कि सरकार ने पिछले पांच साल में क्या किया।

न ही उन्होंने लोगों को यह बताया कि अगले पांच सालों के लिए महाराष्ट्र के बारे में उनकी दृष्टि क्या है। सोचिए, बीजेपी देश के सबसे संपन्न राज्यों में से एक का शासन अपने हाथ में लेने के लिए जनता के बीच गई थी लेकिन उसके आर्थिक विकास के लिए सरकार के पास कोई रोडमैप ही नहीं था? यह एक गंभीर चिंता का विषय है क्योंकि जिस समय बीजेपी जनमत मांग रही थी, महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाके ऋण के बोझ से दबे थे, किसान खुदकुशी कर रहे थे, बैंक फेल हो रहे थे और मॉनसून में हुई भारी बारिश के कारण शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर ढह चुका था।

बीजेपी के पास सभी समस्याओं का एक ही समाधान है- पैसा फेंको। पिछले छह साल के दौरान वह इसी तरह काम करती रही। किसानों का कर्ज माफ कर दिया कि गांव के लोग उसे वोट दें और कॉरपोरेट टैक्स घटाने का विचार इसलिए लाया गया कि शेयर बाजार दुरुस्त रहे और शहरी वोटर उस पर मेहरबान हो जाए। लेकिन दिवाली के बाद अर्थव्यवस्था तेजी से गिर रही है और ऐसे में समस्याओं को हल करने के लिए बीजेपी को जितने पैसे की दरकरार है, वह आएगा कहां से?

अगले तीन वर्षों के दौरान एक के बाद एक राज्यों के तमाम चुनाव होने हैं और आर्थिक समस्याओं को हल करने के ठोस उपाय के बिना आखिर वह कैसे जीत का सिलसिला बनाए रखेगी? ऐसी संभावना है कि बिहार और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भी राम मंदिर, हिंदू गौरव आदि की ही ज्यादा बातें होंगी लेकिन उन लघु उद्योगों में जान फूंकने की कोई बात नहीं होगी जिसके कारण उत्तर प्रदेश और बिहार कभी संपन्न राज्य हुआ करते थे। आपको याद होगा 2015 में बिहार में एक चुनावी सभा में प्रधानमंत्री मोदी ने भीड़ से पूछा था कि आप क्या चाहते हैं, मैं बिहार को कितना आवंटन दूं? और फिर वह बोली लगाने वाले की तर्ज पर राशि 50 हजार करोड़ से बढ़ाकर 1.25 लाख करोड़ तक ले गए थे। बीजेपी वह चुनाव हार गई और किसी ने प्रधानमंत्री को उनके वादे की याद भी नहीं दिलाई।

देश में करीब 60 फीसदी लोग खेती पर जी रहे हैं और छोटे किसानों की समस्याओं से निपटने और उनके जीवन को बेहतर बनाने का बीजेपी के पास कोई उपाय नहीं। उनके पास हर समस्या का एक ही उपाय है- पैसा फेंको। किसानों की कर्ज माफी इसका बेहतरीन उदाहरण है कि बीजेपी किस तरह ग्रामीण समस्याओं का हल करती है। दुर्भाग्य है कि बीजेपी को अभी तक इस बात का अहसास नहीं हो सका है कि ग्रामीण भारत में ज्यादातर लोग साहूकारों से पैसे लेते हैं और कृषि ऋण माफी से केवल बड़े किसानों की मदद होती है जिनमें से अधिकतर किसी न किसी राजनीतिक दल के ठीक-ठाक नेता होते हैं।

यह संयोग नहीं हो सकता कि वाजपेयी और मोदी, दोनों बीजेपी सरकारों के दौरान ग्रामीण अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन खराब रहा। और दिक्कत की बात यह है कि बीजेपी ने न तो समस्या के हल का कोई ठोस उपाय किया और न इसकी इच्छाशक्ति ही दिखाई। बीजेपी और कांग्रेस के बीच का अंतर सुदूर ग्रामीण इलाकों के जरिये देखा जा सकता है। बीजेपी नहीं मानती कि ग्रामीण भारत के हाथ में नगदी अर्थव्यवस्था के पहिए को गति देने की कुंजी है। दूसरी ओर, कांग्रेस का मानना है कि गावों में अगर पैसा होगा तो इससे अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी और गांव समृद्ध-खुशहाल होंगे।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जो कॉरपोरेट टैक्स को कम किया और बैंकों का पुनर्गठन किया, वे तो विशुद्ध रूप से शहर-केंद्रित कदम हैं जिनका उद्देश्य कॉरपोरेट निवेश को बढ़ावा देना है। जबकि कांग्रेस ने मनरेगा जैसी योजना शुरू की जो न्यूनतम रोजगार की गारंटी देते हुए गांव के लोगों को उपभोक्ता सामान पर खर्च करने के लिए पैसे उपलब्ध कराती है। यही वजह है कि यूपीए शासन के दौरान बिस्किट, शैम्पू, साबुन जैसे उत्पाद बनाने वाली उपभोक्ता कंपनियां फली-फूलीं और देश को 9 फीसदी का विकास दर दिया।

बीजेपी और कांग्रेस में एक और बड़ा अंतर न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर है। बीजेपी ने हमेशा अनाज और दालों के समर्थन मूल्य को बढ़ाने में कंजूसी की क्योंकि उसका मानना है कि किसानों के हाथों में ज्यादा पैसे देने का मतलब मुद्रास्फीति को बढ़ावा देना है। इसलिए इसमें हैरत नहीं कि बीजेपी के दौरान न्यूनतम समर्थन मूल्य में केवल 4 फीसदी का इजाफा हुआ जबकि कांग्रेस हमेशा एमएसपी में 10 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि करती रही।

इसे विडंबना ही कहेंगे कि दो भारतीय मूल के लोगों को अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार तब मिला जब बीजेपी सत्ता में थी। अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते अमर्त्य सेन को अर्थशास्त्र का नोबेल मिला तो नरेंद्र मोदी के दौरान अभिजीत बनर्जी को। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों को ही गरीबी पर काम करने के कारण नोबेल मिला और उनका अध्ययन अन्य देशों के अलावा भारत पर भी रहा। लेकिन बीजेपी के भीतर आर्थिक विमर्श को लेकर ऐसी उदासीनता और नीरसता है कि दोनों ही अवसरों पर पार्टी के नेताओं ने नोबेल पुरस्कार विजेताओं की उपलब्धियों को नजरअंदाज कर दिया। वे चाहते तो इन नोबेल विजेताओं की उपलब्धियों का जश्न मनाते और अपने विमर्श को मजबूत करने के लिए उनके विचारों को जमीन पर उतारने का खाका खींचते। लेकिन उन्होंने इसे जाया होने दिया।

वाजपेयी के दौरान संघ ने यह सुनिश्चित किया कि अमर्त्य सेन जब नोबेल जीतकर भारत आएं तो प्रधानमंत्री उनसे न मिलें। सेन के सुझावों पर अमल करके आम लोगों को उसका लाभ देने की कोशिशों की जगह उन्होंने अपनी ऊर्जा सेन को नीचा दिखाने में ही ज्यादा लगाया। अभिजीत बनर्जी के मामले में भी कुछ अलग नहीं हुआ। बीजेपी और संघ के लिए अभिजीत की अकादमिक उपलब्धियां और उनके व्यावहारिक अनुभवों से ज्यादा महत्वपूर्ण उनका निजी जीवन हो गया। अमर्त्य सेन की तुलना में बीजेपी और संघ परिवार के अभिजीत से ज्यादा खिन्न रहने की संभावित वजह उनका वामपंथ के गढ़ जेएनयू से पढ़ना रहा होगा। लेकिन इस तरह की छोटी मानसिकता का सत्तारूढ़ पार्टी को कोई फायदा नहीं होने जा रहा।

नोटबंदी के गलत फैसलेऔर आधी-अधूरी तैयारी के साथ शुरू किए गए जीएसटी के कारण कर संग्रह घट गया है और सरकार के पास विभिन्न योजनाओं को चलाने के लिए पैसे कम पड़ गए हैं। लेकिन बीजेपी के लिए सत्ता में टिके रहना जरूरी है क्योंकि वह विमर्श को राष्ट्रीयता के मुद्दे से भटकाने का जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं। चुनाव पूर्व की राजनीतिक गतिविधियों की वास्तविकता अलग है। महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्यों से आने वाले संदेश को देखें। दलित मराठा और निचली जातियां एनसीपी और प्रकाश आंबेडकर के नेतृत्व वाली वंचित बहुजन अगाड़ी जैसी पार्टियों के साथ चली गईं और इसका नतीजा यह रहा कि लगभग सौ से अधिक सीटों पर ये पार्टियां दूसरे स्थान पर रहीं। यही हाल हरियाणा में है, जहां जाट मतदाताओं ने कांग्रेस और जेजेपी को चुना।

वैश्विक स्थितियां भी मोदी सरकार के खिलाफ हैं, लेकिन भारत की घटती विकास दर के लिए वैश्विक कारक ही जिम्मेदार नहीं जैसा वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण दावा कर रही हैं, बल्कि विकास में रोड़ेअटकाने वाले ज्यादातर कारक घरेलू हैं और इसकी जड़ में खुद बीजेपी सरकार है- कर आतंकवाद, नोटबंदी, जीएसटी, उद्योगपतियों और नेताओं के पीछे हाथ धोकर पड़ जाना इत्यादि। तत्कालीन सीएजी विनोद राय के आरोपों पर आज तक कुछ नहीं निकला। इससे इतना ही हुआ कि निवेशक सहम गए और वे आज भी अपने बटुए खोलने से हिचक रहे हैं क्योंकि वे सरकार की मंशा को लेकर आश्वस्त नहीं और उन्हें भय खाए जा रहा है कि अगर कल सरकार किसी कारणवश उनके पीछे पड़ गई तो उनके साथ उचित व्यवहार नहीं हो सकेगा।

स्थितियों को और विकट बना रहा है परस्पर विरोधाभासी संदेश, राजनीतिक विद्वेष और कर आतंकवाद का वातावरण और जो स्थिति है, उसमें न्यायपालिका भी भरोसा नहीं जगा पा रही है। हिंदुत्व और राष्ट्रीयता बीजेपी के लिए वोट जुटा भी दें, लेकिन वह शायद ही अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर ला सके। हाल के विधानसभा और उपचुनावों से तो कम से कम यही नतीजा निकलता है। बीजेपी जितनी जल्दी इससे सीख ले ले उतना अच्छा।

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