बीजेपी सरकारों की प्लेबुक- हक मांगते शोषित श्रमिक आतंकवादी, सीधा पाकिस्तान से कनेक्शन
उत्तर प्रदेश की मर्दानी पुलिस द्वारा श्रमिकों के प्रदर्शन का दमन निहायत ही शर्मनाक और कायराना तरीके से किया गया। नोएडा में महिला डीएम और महिला पुलिस प्रमुख होने के बाद भी पुलिस के 'बहादुर' पुरुष जवानों ने महिला श्रमिकों को गिरा-गिरा कर पीटा।

बीजेपी सरकारों की प्लेबुक में अपना हक मांगती शोषित जनता को “आतंकवादी” बताया जाता है और इसका पाकिस्तानी कनेक्शन भी प्रचारित किया जाता है। दिल्ली में कुछ महीनों पहले दमघोंटू वायु प्रदूषण के विरुद्ध आवाज उठाते छात्रों और युवाओं के लिए दिल्ली पुलिस ने इन्हीं उपमाओं का उपयोग किया था। हाल में ही नोएडा में अपने वेतन में वृद्धि की मांग करते शोषित श्रमिकों के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस ने भी ठीक इन्हीं उपमाओं का उपयोग किया है।
उत्तर प्रदेश की मर्दानी पुलिस द्वारा इस प्रदर्शन का दमन निहायत ही शर्मनाक और कायराना था। प्रदर्शन के बिखरने के बाद भी श्रमिकों को सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर लाठियों से पीटा गया। शर्मनाक तो यह है कि नोएडा में महिला डीएम और महिला पुलिस अधिकारी होने के बाद भी पुलिस के “बहादुर” पुरुष जवान महिला श्रमिकों और सड़क से गुजरने वाली महिलाओं पर लाठी बरसा रहे थे।
मुख्यमंत्री आदित्यनाथ श्रमिकों के प्रदर्शन को औद्योगिक अराजकता बात रहे हैं तो दूसरी तरफ प्रशासन, पुलिस और सरकार पूरी तरीके से शोषण करने वाले उद्योगपतियों के साथ खड़ी है। प्रधानमंत्री मोदी के गृह-राज्य, गुजरात, में मनरेगा के अंतर्गत काम करने वालों को पिछले 5-6 महीनों से पैसे नहीं दिए गए हैं। देशभर के गिग वर्कर्स किन हालात में काम करते हैं, हम सभी जानते हैं। फिर भी हमारे देश में अपने हक के लिए आवाज उठाने वाला हर श्रमिक आतंकवादी करार दिया जाता है। सत्ता तो अपनी विफलता दमन की नीति से छुपाती है, पर पूंजीवादी मीडिया में श्रमिकों की आवाज ही गायब रहती है।
उत्तर प्रदेश सरकार के तमाम रंगीन विज्ञापनों के विपरीत वहां की सामान्य जनता का जीवन “श्वेत और श्याम” से भी बदतर है। यहां रोजाना 10 से 12 घंटे अमानवीय वातावरण में काम करने वाले औद्योगिक श्रमिकों का औसत वेतन 14700 रुपये प्रति माह है– यह औसत वेतन राष्ट्रीय औसत वेतन 18000 रुपये प्रति माह की तुलना में 22 प्रतिशत कम है और झारखंड के 26700 रुपये प्रति माह के वेतन का लगभग आधा है। वास्तविकता यह है कि उत्तर प्रदेश में औद्योगिक श्रमिकों का वेतनमान देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सूची में सबसे नीचे से केवल 5 स्थान ऊपर है।
पूंजीवादी व्यवस्था की चमक-दमक का आधार ही श्रमिक हैं पर इन्ही श्रमिकों को पूंजीवाद के भरोसे चलती सत्ता रंगीन चकाचौंध से दूर अंधेरी और लिजलीजी गलियों में धकेल देती है। वर्ष 2019-2020 से 2023-2024 के बीच उत्तर प्रदेश में श्रमिकों की उत्पादकता लगभग 36 प्रतिशत बढ़ गई है, पर श्रमिकों के वेतन में महज 18 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इस दौरान खुदरा वृद्धि-दर में 26 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो गई है। जाहिर है, श्रमिक साल दर साल पहले से अधिक गरीब हो रहे हैं। आंदोलन के बाद, अगले ही दिन उत्तर प्रदेश शासन द्वारा श्रमिकों के वेतन में 21 प्रतिशत की घोषणा से इतना तो स्पष्ट है कि सरकार हरेक समस्या की तब तक उपेक्षा करती है जब तक स्थिति नियंत्रण से बाहर नहीं हो जाती। यही पूंजीवादी व्यवस्था की विशेषता है।
वर्ल्ड डेवलपमेंट नामक जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, पूंजीवाद कभी भी गरीबी का समाधान नहीं करता है, इससे जीवन स्तर का पतन होता है और मानव विकास उल्टी दिशा में होने लगता है। इस अध्ययन को स्पेन की यूनिवर्सिटी ऑफ बार्सिलोना के इंस्टिट्यूट ऑफ एनवायर्नमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने ऑस्ट्रेलिया के मच्कुँरी यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर प्रकाशित किया है। पूंजीवाद में सामान्य आबादी की आय एक बेहतर जिन्दगी के गुजारे से भी कम हो जाती है, शारीरिक तौर पर आबादी कमजोर होती है और आकस्मिक मृत्यु की सभावनाएं बढ़ जाती हैं।
16वीं शताब्दी के मध्य से पूंजीवाद का आरम्भ हुआ और वैश्विक स्तर पर इसके विस्तार का बड़ा श्रेय ग्रेट ब्रिटेन, पुर्तगाल, स्पेन जैसे देशों को जाता है जिन्होंने अनेक देशों को अपना गुलाम बनाया, उनपर राज किया और उनपर पूंजीवाद थोपा। हमारे देश में भी ग्रेट ब्रिटेन ने पूंजीवादी व्यापारी के नकाब के साथ ही प्रवेश किया था। पूंजीवाद केवल चुनिन्दा लोगों का ही भला करता है, पर इसकी खासियत यह है कि इस व्यवस्था में पहले सरकारों को नियंत्रित किया जाता है, फिर सूचना-प्रसार तंत्र पर कब्जा किया जाता है।
पूंजीवाद के आरम्भ से ही प्रचार और मीडिया के माध्यम से एक भ्रमजाल फैलाया गया, जिसके तहत सामान्य आबादी को सुनहरे भविष्य के सपने दिखाए गए। ऐसे प्रचारों में आंकड़ों की बाजीगरी की जाती है, ऐतिहासिक जीडीपी, यानि सकल घरेलू उत्पाद, के आंकड़े और बड़ी आबादी की क्रय क्षमता के सचे-झूठे आंकड़े बताकर यह साबित किया गया कि केवल पूंजीवाद ही सामान्य जनता का जीवन स्तर सुधार सकता है।
पूंजीवाद की हालत यह है कि इसके कोई भी पैरामीटर सामान्य आबादी की स्थिति नहीं बताते। पूंजीवाद का व्यापक असर 19वीं शताब्दी से स्पष्ट होने लगा। पूंजीवाद से प्रभावित और लाभान्वित अर्थशास्त्री लगातार बताते रहे कि 19वीं शताब्दी से पहले पूरी दुनिया में भीषण गरीबी थी, और सामान्य आबादी के पास रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने का साधन नहीं था। पूंजीवादी प्रचार तंत्र के अनुसार इससे पहले मानव विकास का कोई अस्तित्व नहीं था और स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएं भी नहीं थीं।
पूंजीवाद द्वारा प्रचारित इन आंकड़ों की सच्चाई समझने के बाद इस अध्ययन के मुख्य संयोजक डेलन सुल्लिवन ने जीडीपी के बदले वास्तविक वेतन को आधार बनाया, इसके साथ ही मनुष्य की औसत लम्बाई और मृत्यु दर का भी 16वीं शताब्दी से लेकर अब तक का आकलन किया। इस अध्ययन को यूरोप, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, दक्षिण एशिया और चीन के लिए किया गया। डेलन सुल्लिवन के अनुसार यह सरासर गलत धारणा है कि 19वीं शताब्दी से पहले अत्यधिक गरीबी सामान्य और सर्वव्यापी थी। श्रमिकों के वास्तविक वेतन के आंकड़ों के अनुसार यह स्पष्ट है कि 19वीं शताब्दी से पहले एक सामान्य श्रमिक को भी पर्याप्त वेतन मिलता था, जो उसके परिवार की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम था। अत्यधिक गरीबी की चपेट में केवल वही आबादी थी जो युद्ध, सूखा या फिर गुलामी का सामना कर रही थी।
डेलन सुल्लिवन के अनुसार, पूंजीवाद के प्रसार के साथ ही सामान्य आबादी का जीवन स्तर बेहाल होने लगा, क्योंकि पूंजीवाद कोई लोकतांत्रिक या प्रजातांत्रिक व्यवस्था नहीं है और इस व्यवस्था में उत्पादन या बाजार आबादी की बुनियादी सुविधाएं नहीं देखता है। पूंजीवाद केवल उन वस्तुवों का उत्पादन करता है जिससे मुनाफा कमा सके, भले ही ये उत्पाद जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हों या उनके सामान्य बजट से बाहर जा रहे हों। पूंजीवाद की विशेषता यह है कि अपना मुनाफ़ा बढाने के लिए यह लगातार मानव-श्रम को सस्ता करता जाता है। पहले सस्ते श्रम के सिद्धांत को समझना कठिन था, पर आज के दौर में जब सरकारें ही कॉन्ट्रैक्ट लेबर को बढ़ावा देने लिए नीतियां बना रही हैं, तब इसे समझना आसान हो गया है।
डेलन सुल्लिवन के अनुसार, पूंजीवाद ने धीरे-धीरे बाजार और श्रमिकों के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों और सार्वजनिक संपत्ति पर भी अधिकार कर लिया। पूंजीवाद और लगभग सभी देशों की सरकारें जिस स्वतंत्र बाजार और उन्मुक्त व्यापार से दुनिया की सामान्य आबादी के भले का ढिंढोरा पीटती हैं, दरअसल इन्हीं में श्रमिकों का सर्वाधिक शोषण होता है और हमारी जरूरतें हम तय नहीं करते, बल्कि बाजार करने लगता है। इस स्थिति में सामान्य आबादी बाजार के लिए एक गुलाम से अधिक कुछ भी नहीं है।
19वीं शताब्दी के अंत में उत्तर-पश्चिम यूरोप के कुछ देशों और 20वीं शताब्दी के मध्य में वैश्विक दक्षिण के देशों, जिनमें सभी विकासशील और अल्प-विकसित देश हैं, के श्रमिकों और सामान्य आबादी ने पूंजीवादी व्यवस्था और श्रमिकों की स्थिति के विरुद्ध आवाज उठाना शुरू किया। श्रमिकों के प्रदर्शन होने लगे और इसे समाजवादी और साम्यवादी व्यवस्था ने समर्थन देना शुरू किया। लगभग इसी दौर में दुनिया से उपनिवेशवाद का अंत भी होना शुरू हुआ। श्रमिकों ने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठन और ट्रेड यूनियन बनाना शुरू किया। इससे श्रमिकों को कुछ अधिकार मिले और उनकी स्थिति में सुधार होना शुरू हुआ।
पर, 21वीं शताब्दी के आरम्भ से ही स्थितियां फिर से पहले जैसी होने लगीं। श्रमिक संगठन और ट्रेड यूनियन ध्वस्त होने लगे, तमाम सरकारों ने उन पर पाबंदी लगानी शुरू कर दी, स्थायी सेवायें समाप्त की जाने लगीं और लगभग सभी श्रमिक अस्थाया हो गए। जाहिर है, श्रमिकों के अधिकार भी समाप्त हो गए और विरोध के स्वर बुलंद करने वाले श्रमिकों की सेवायें आसानी से समाप्त करने का अधिकार पूंजीपतियों की हाथ में आ गया। आज के दौर में पूंजीवाद सामान्य नहीं है, बल्कि चरम है। अब तो सरकारें भी पूंजीवाद ही बनाता है, मीडिया का काम भी पूंजीवाद ही करता है और जनता को क्या मिलना चाहिए और क्या नहीं, यह तय भी पूंजीवाद ही करता है।
वर्ल्ड डेवलपमेंट नामक जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में श्रमिकों के वास्तविक वेतन के साथ ही मनुष्य की औसत लम्बाई के अंतर और औसत आयु को भी मानदंड बनाया गया था। कुछ लोगों को औसत लम्बाई और औसत आयु पर आश्चर्य हो सकता है क्योंकि हमेशा यही बताया जाता है कि दशक-दर-दशक इनमें वृद्धि हो रही है क्योंकि पूंजीवादी व्यवस्था ने स्वास्थ्य को बेहतर किया है और पोषण बढ़ता जा रहा है।
डेलन सुल्लिवन ने अपने अध्ययन में इसका बहुत बेबाकी से वर्णन किया है। उनके अनुसार, यह सब गलत धाणनाएं पूंजीवादी प्रचार तंत्र की देन हैं। दुनिया में अत्यधिक गरीब आबादी लगातार बढ़ती जा रही है, जाहिर है यह सब पूंजीवादी व्यवस्था की देन है। पूंजीवाद का प्रसार और गरीबी में सीधा सम्बन्ध है, पर पूंजीवाद जब बताता है कि पूंजीवाद पनपने के पहले पूरी दुनिया गरीब थी तब वर्तमान गरीबी को वह आराम से बता पाता है कि अब केवल एक-तिहाई आबादी ही अत्यधिक गरीब है, और यह पूंजीवाद का मानव विकास है।
पूंजीवादी सत्ता ने सामान्य आबादी को इतना दबा दिया है कि अब तो अपने अधिकारों के लिए आंदोलन भी शायद ही कभी नजर आते हैं। आंदोलनों पर नजर रखने वालों के अनुसार, ऐसे अहिंसक आन्दोलन जो सामान्य जनता की रोजमर्रा की जिन्दगी को प्रभावित करते हैं– जैसे सड़कों को अवरुद्ध करना, सरकारी कार्यालयों में प्रवेश को रोकना, सांस्कृतिक या खेल समारोहों में बाधा पहुंचाना, बाजारों का मार्ग अवरुद्ध करना– जनता, सत्ता और मीडिया की नजर में भले ही बेकार के हों, पर आन्दोलन विशेषज्ञों की नजर में ऐसे तरीके ही आन्दोलनों को सफल बनाते हैं।
अधिकतर विशेषज्ञों के अनुसार, किसी आन्दोलन को सफल बनाने का यही सबसे प्रभावी तरीका है। आन्दोलन विशेषज्ञों का यह सर्वेक्षण यूनाइटेड किंगडम स्थित आन्दोलनों पर अध्ययन करने वाली संस्था सोशल चेंज लैब ने करवाया है। इसने यूरोप के 120 आन्दोलन विशेषज्ञों से सर्वेक्षण में सवाल पूछा था- किसी आन्दोलन को सफल बनाने का सबसे प्रभावी तरीका क्या है?
हमारे देश के लोगों को आन्दोलनों के बारे में समझाना कठिन है, क्योंकि यहां सामाजिक या आर्थिक विषयों पर आन्दोलन ही नहीं होते। हमारे देश में पिछले 50 वर्षों के दौरान तीन बड़े और राष्ट्रीय स्तर पर आन्दोलन हुए हैं– जयप्रकाश नारायण का आन्दोलन, अन्ना हजारे का आन्दोलन और किसानों का आन्दोलन। इसमें से पहले दो आन्दोलन कांग्रेस के सत्ता पर एकाधिकार, कथित निरंकुश सत्ता और भ्रष्टाचार के विरुद्ध थे। दोनों ही आन्दोलनों के साथ देश की जनता जुड़ी और इन आन्दोलनों की शुरुआत भी एक स्पष्ट उद्देश्य को लेकर हुई। फिर, ये आन्दोलन सत्ता पर काबिज होने के लिए चलाये जाने लगे।
जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन के बाद हिन्दू राष्ट्र और सामाजिक ध्रुवीकरण वाली बीजेपी सत्ता का एक हिस्सा बनी और अन्ना हजारे के आन्दोलन के बाद तो पूरी तरह सत्ता पर काबिज ही हो गयी। इन दोनों आन्दोलनों के जो उद्देश्य थे, और जनता जिन समस्यायों से छुटकारा पाना चाहती थी– वही समस्याएं अब पहले से भी व्यापक बनकर जनता के सामने खडी हैं। कुल मिलाकर आन्दोलनों का नाटक करने वाले और सड़कों पर संघर्ष का दिखावा करने वाले सभी सत्ता का सुख भोग रहे हैं और एक जीवंत प्रजातंत्र को निरंकुश सत्ता में बदल दिया। जाहिर है, ऐसी निरंकुश सत्ता के काबिज होने के बाद आन्दोलनों को कुचला गया, झूठे आश्वासन देकर उन्हें खत्म कराया गया और अब तो जनता आन्दोलन करना ही भूल गयी है।
हमारे देश में तो जिन आन्दोलनों को सफल कहा जा सकता है, उन आन्दोलनों का असर ही उल्टा हो गया। एक साल से भी अधिक चले किसान आन्दोलन के बाद भी किसानों को कोई फायदा नहीं हुआ, उलटा सरकारी तौर पर और सामाजिक तौर पर भी किसान पहले से अधिक उपेक्षित हो गए। पहले कभी-कभी किसानों की समस्याओं से सम्बंधित कुछ समाचार प्रकाशित भी होते थे, पर आन्दोलन ख़त्म होने के बाद तो मीडिया ने भी उनको भुला दिया।
फ्रांस में 17 वर्ष के बच्चे की मृत्यु पुलिस वालों की गोली से हो जाती है तो पूरा फ्रांस सड़कों पर उतर जाता है। दूसरी तरफ हमारे देश में किसी को पुलिस वाले मार डालते हैं, तब सत्ता-समर्थक जश्न मनाते हैं, मीडिया उसे आतंकवादी और देशद्रोही करार देती है, सोशल मीडिया पर एक धर्म विशेष के बारे में हिंसा भड़काई जाती है। सत्ता पुलिसवालों को अगली हत्या के लिए बढ़ावा देती है और इन सबके बीच देश की बेरोजगार और भूखी जनता अगले शाम पेट भरने के इंतजाम में व्यस्त रहती है। हमारे देश में हरेक आन्दोलनकारी, भले ही वह देश का नाम बढ़ा रहा हो, सत्ता और पुलिस की नजर में देशद्रोही ही है।
सामाजिक बदलाव की संभावना वाले आन्दोलन अधिक सफल होते हैं। भले ही ऐसे आन्दोलन को समाज का कोई भी एक पीड़ित वर्ग शुरू करे पर धीरे-धीरे सामाजिक बदलाव की संभावना का आकलन कर समाज का हरेक वर्ग ऐसे आन्दोलन से जुड़ जाता है। दरअसल अब तक आन्दोलनों पर सारे अध्ययन यह मान कर किये गए हैं कि लोग केवल भावनात्मक तौर या फिर आवेश में आन्दोलनों से जुड़ते हैं, पर स्टेनफोर्ड पब्लिक स्कूल ऑफ़ बिज़नस के समाजशास्त्रियों द्वारा किये गए अध्ययन से यह स्पष्ट है कि जब सामान्य लोगों को महसूस होता है कि किसी आन्दोलन का व्यापक असर समाज पर पड़ेगा, तब ऐसे आन्दोलनों से अधिक लोग जुड़ते हैं और ऐसे आन्दोलन लम्बे समय तक चलते हैं। इस अध्ययन को पर्सनालिटी एंड सोशल साइकोलॉजी बुलेटिन नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया है।
सोशल चेंज लैब के निदेशक जेम्स ओज्दें ने कहा है कि सामान्य जनता को कुछ हद तक परेशान करने वाले आन्दोलन सफल होते हैं, यह चौकाने वाला तथ्य है, क्योंकि ये नतीजे जनता और मीडिया के विचारों के बिलकुल विपरीत हैं। पर, 70 प्रतिशत से अधिक आन्दोलन विशेषज्ञों ने इसी तरीके को किसी आन्दोलन की सफलता का सबसे बड़ा करण बताया है। इससे इतना तो स्पष्ट है कि सामाजिक आन्दोलनों के बारे में हमारी जानकारी बहुत सीमित है और इसका विश्लेषण कभी व्यापक तरीके से नहीं किया जाता।
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