उत्तर प्रदेश में आत्मविश्वास गंवा चुकी बीजेपी
बीजेपी को सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को दरकिनार करने और जवाबदेही से बचने का तरीका खूब रास आता रहा है। लेकिन लगता नहीं कि उसकी काठ की हांड़ी फिर चढ़ सकेगी।

पिछले तीन-चार दशकों से उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों का 'जातियों और धर्मों के युद्ध' में बदल जाना उनकी नियति-सी बनी हुई है। इसके लिए ज्यादातर कोशिशें सत्ता पक्ष द्वारा या उसकी ओर से की जाती रही हैं - जितनी भी गिरावट से संभव हो, अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए। अलबत्ता, कभी-कभी विपक्षी दल भी उसकी चाल को समझने में विफल रहते और उसके जाल में फंसकर उसके जैसे ही करतब करने लग जाते रहे हैं।
जानकार बताते हैं कि ऐसी कोशिशें कुछ चोरी-छिपे की जाती हैं, कुछ खुल्लमखुल्ला और निर्लज्जतापूर्वक। ऐसे में मतदाताओं के लिए तय करना बहुत कठिन हो जाता है कि उनको खुल्लमखुल्ला ऐसे युद्धों में झोंकने वाले ज्यादा खतरनाक हैं या वे जो निहुरे-निहुरे ऊंट चराते और एक साथ धान कूटने एवं कांख ढकने की कोशिशें करते हैं।
विडंबना यह कि इनमें से किसी को भी धर्मों के उदात्त मूल्यों और नैतिकताओं से कोई लेना-देना नहीं होता। उनकी सबसे ज्यादा दिलचस्पी किसी भी कीमत पर विजय में होती है। भले ही उसके लिए नाना प्रकार की सांप्रदायिकताओं, संकीर्णताओं और कट्टरताओं को धर्मों का पर्याय बनाकर लोगों को भड़काना और आपस में भिड़ाना पड़े।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कभी इसी प्रवृत्ति के लोगों को लक्ष्य करके लिखा था : साधन को भूल सिद्धि पर जब टकटकी हमारी लगती है, फिर विजय छोड़ भावना और कोई न हृदय में जगती है। तब जो भी आते विघ्न रूप, हों धर्म, शील या सदाचार, एक ही सदृश हम करते हैं सबके सिर पर पाद-प्रहार। उतनी भी पीड़ा हमें नहीं होती है इन्हें कुचलने में, जितनी होती है रोज़ कंकड़ों के ऊपर हो चलने में।
लेकिन क्या इस बार के विधानसभा चुनाव में भी वैसा ही युद्ध होगा? और हुआ तो उसका नतीजा क्या होगा?
भारतीय जनता पार्टी की योगी आदित्यनाथ सरकार ने साढ़े नौ सालों में धार्मिक और सांप्रदायिक भेदभावों को चरम पर पहुंचा देने वाले कुशासन से प्रदेश को जिन हालात में पहुंचा दिया है (जिन्हें लेकर पत्रकार और स्तंभकार महेंद्र पांडे ने 'नवजीवन' की वेबसाइट पर 'योगी 'राज' में उत्तर प्रदेश, विज्ञापनों में समृद्ध, धरातल पर बदहाल' शीर्षक अपने लेख में लिखा है), उनके कारण वह जैसी ऐंटीइन्कम्बैंसी, साथ ही नई पीढ़ी का आक्रोश झेल रही और मतदाताओं की ओर से बहुत संभव बेदखली के फरमान से डरी हुई है, उसके मद्देनजर यह सोचना भी मुश्किल है कि वह वैसे युद्ध की पुनरावृत्ति नहीं चाहेगी।
लेकिन इस बार स्थिति में एक बड़ा फर्क है। यह कि अंदरूनी-बाहरी अनेक कारणों से भाजपा का आत्मविश्वास उसके साथ नहीं है। हां, योगी आदित्यनाथ का भी नहीं। कारण यह कि बहुसंख्यक सांप्रदायिकता के पोषण के उनके पुराने खटराग की पोल खुल चुकी है और उसके आगे का कोई रास्ता उनको सूझ नहीं रहा।
रामपुर में जौहर विश्वविद्यालय के 40 में से 38 भवनों को अवैध घोषित करके ध्वस्त करने की कार्रवाई मुरादाबाद मंडल के आयुक्त कोर्ट द्वारा अंतरिम रोक लगा देने के कारण 'संपन्न' नहीं हो पाई तो बजरंग दल के एक नेता की शिकायत पर सहारनपुर के कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित डेढ़ सौ साल पुरानी मस्जिद को ढहा देने से सरकार और भाजपा का मंसूबा बिल्कुल साफ हो गया है कि जिस बहुसंख्यक सांप्रदायिकता को पालती पोसती आई हैं, उसके और जिन्नों को उनकी बोतलों के बाहर करना चाहेंगी। नतीजा कुछ भी हो, उनकी बला से।
कई प्रेक्षकों का अनुमान है कि इन जिन्नों को बोतल से बाहर निकाल चुकने के बाद वे विधानसभा चुनाव समय से पूर्व तो कराना चाह सकती हैं, लेकिन अपने जिन्नों के किए-धरे से आश्वस्त न होने के कारण उस रास्ते पर जाने से भी परहेज़ नहीं करेंगी, विपक्ष द्वारा शासित राज्यों में जिसे रेवड़ियां बांटना कहकर उसकी आलोचना करती रही हैं। तब, जैसे कुतर्कों की मार्फत वे नफरतों की अपनी पैरोकारी को जायज ठहराती रहती हैं, वैसे अपनी रेवड़ियों को भी जायज ठहराएंगी।
सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को दरकिनार करने और जवाबदेही से बचने का 'परंपरागत युद्ध' का तरीका उनको खूब रास आता रहा है। यह और बात है कि इस बार ऐसा कहने वाले भी कम नहीं हैं कि उनकी काठ की हांड़ी अब नहीं ही चढ़ने वाली।
गौरतलब है कि बीजेपी द्वारा 1991 में प्रदेश में पहली बार सरकार बनाने से पहले एक समय ऐसा भी था, जब सत्ता की राजनीति इतनी विवेकहीन नहीं हुई थी और समझती थी कि नुकसानदेह तो अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक दोनों सांप्रदायिकताएं होती हैं, लेकिन बहुसंख्यक सांप्रदायिकता के नुकसान अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा होते हैं। इसलिए अपेक्षा की जाती थी कि जो भी दल सत्ता में आए, उसे हर हाल में बहुसंख्यक सांप्रदायिकता को काबू में रखने के जतन करने ही करने चाहिए।
लेकिन योगी सरकार डंके की चोट पर राजव्यवस्था का दुरुपयोग कर बहुसंख्यक सांप्रदायिकता का पोषण करती रहती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में अयोध्या और उसके आसपास की सारी लोकसभा सीटें हार जाने का उसका ग़म उसके बाद के प्रदेश विधानसभा के उपचुनावों में जीत हासिल करने के बाद भी गलत नहीं हो पाया। चढ़ावा चोरी और लखनऊ में भाजपा के नए-नवेले अध्यक्ष नितिन नबीन के स्वागत में हनुमान के स्वरूप के दुरुपयोग के मामलों में फंसंत ने उसका कहीं का नहीं छोड़ा है। ऐसे में वह अयोध्या मुद्दे से ज्यादा उम्मीद नहीं कर पा रही और मथुरा एवं काशी पर ज्यादा जोर लगा रही है।
इसीलिए योगी ने श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर मथुरा जाकर कुछ ऐसे अंदाज में एलान किया कि 'सनातन धर्म को कोई मिटा नहीं सकता'। उन्होंने संकेतों में विपक्षी दलों को आक्रांताओं से भी जोड़ा और कहा कि जिनकी आस्था आक्रांताओं में रही है, वे कभी सनातन संस्कृति का सम्मान नहीं कर सकते।
प्रेक्षक कहते हैं कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएगा, योगी बहुसंख्यक मतदाताओं को अपने पाले में करने के लिए उनको ऐसे और फोबियाओं के हवाले करना चाहेंगे। लेकिन यह उनकी मजबूती के नहीं, कमजोर आत्मविश्वास के चलते होगा। लगता है कि योगी भी इस बात को समझते हैं। इसलिए योगी ने 'तू नहीं और सही' की तर्ज पर प्लान बी भी बना रखा है- रेवड़ियां बांटने का प्लान।
चालाकी यह कि रेवड़ियों के एलान से पहले अपने समर्थक मीडिया को उनके धुंआधार प्रचार के काम पर लगा दिया है। यह मीडिया खूब प्रचारित कर रहा है कि योगी सरकार आर्थिक रूप से कमजोर और जरूरतमंद महिलाओं को सशक्त करने (उनका वोट खरीदने) के लिए उनको 50,000 रुपये की नकद सरकारी सहायता की योजना लाने वाली है।
हाल ही में 60 वर्ष से अधिक उम्र की यानी वरिष्ठ महिला नागरिकों के लिए राज्य परिवहन की बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा भी शुरू की है। सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में मानदेय पर काम करने वाले कई समूहों की मानदेय वृद्धि भी उसके विचाराधीन है। प्रदेश में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि लोगों को लोककवि रफीक सादानी की ये पंक्तियां याद आ रही हैं : जब नगीचे चुनाव आवत है, भात मांगौ पोलाव आवत है।
जहां तक 'जाति युद्ध' की बात है, भाजपा इससे परहेज का दावा करती और उनकी तोहमत अपने विरोधी दलों पर लगाती रही है। लेकिन वह जैसे ही मौका पाती है, जातियों के खेल में उनके कान काटने लग जाती है। कई प्रेक्षक उसके इस खेल को भी हिन्दुत्व के कार्ड से निराश होने के बाद उसके हारे को हरिनाम के तौर पर देखते हैं।
बीते विधानसभा चुनाव से पहले तो उसने इस खेल में हद ही पार कर दी थी। तब, सात जुलाई, 2021 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया तो जोर-शोर से प्रचार किया जाने लगा था कि उन्होंने उत्तर प्रदेश से तीन पिछड़े, तीन दलित और एक ब्राह्मण मंत्री बनाए हैं। फिर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया, तब भी मंत्रियों की जातियां ही प्रचारित की गईं।
लेकिन इस बार इस रणनीति में एक पहलू यह भी आ जुड़ा है कि पिछड़ी जाति के होने के कारण पार्टी के लिए अहम उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य द्वारा एबीपी न्यूज को दिए एक साक्षात्कार में मुख्यमंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षा खुलकर स्वीकार करने से योगी चौंके हुए हैं। इसलिए कि मौर्य को भाजपा में योगी का सबसे प्रबल प्रतिद्वंद्वी माना जाता रहा है।
उक्त इंटरव्यू में मौर्य ने कहा है कि 'हो सकता है अगली बार आप मुझे सीएम के रूप में देखें या किसी और रूप में देखें।...अंतिम फैसला भाजपा का शीर्ष नेतृत्व और चुनाव के बाद विधायक दल ही करेगा।' योगी और उनके समर्थकों के निकट मौर्य के इस कथन के कई भाष्य हैं और दुर्भाग्य से सभी उनकी चिंताएं बढ़ाने और आत्मविश्वास कम करने वाले हैं।
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