प्रियंका गांधी से बीजेपी को वही डर लगता है जो संघ को नेहरू और इंदिरा से लगता था...

मोदी सरकार और संघ दोनों इस देश से नेहरू और गांधी परिवार का नामोनिशान मिटा देना चाहते हैं। यही वजह है कि तीन मूर्ति नेहरू म्यूजियम से लेकर प्रियंका गांधी तक इस परिवार का हर छोटा-बड़ा संघ के निशाने पर है। दरअसल यह लड़ाई पूरी तरह से एक वैचारिक लड़ाई है।

फोटोः सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

आखिर संघ परिवार को जवाहरलाल नेहरू और गांधी-नेहरू परिवार से इतनी घृणा क्यों है? मोदीजी के सत्ता में आते ही नेहरू और गांधी परिवार जिस प्रकार संघ के निशाने पर हैं, उसको देखकर तो यह एहसास होता है कि शायद संघ के लिए इस देश के अल्पसंख्यक भी इतनी घृणा का पात्र नहीं हैं जितना नेहरू और गांधी परिवार है। सोशल मीडिया से लेकर सरकारी नीतियों तक पिछले चार साल में नेहरू और गांधी परिवार का जिस प्रकार तुच्छीकरण किया गया उससे यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार और संघ दोनों इस देश से नेहरू और गांधी परिवार का नामोनिशान मिटा देना चाहते हैं।

इसीलिए तीन मूर्ति नेहरू म्यूजियम से लेकर प्रियंका गांधी तक इस परिवार का हर छोटा-बड़ा संघ के निशाने पर है। आखिर नेहरू परिवार से इतना बैर क्यों? संघ की नेहरू विरासत से यह लड़ाई क्यों? यह लड़ाई दरअसल वैचारिक लड़ाई है। यह दो अलग-अलग भारत निर्माण के रास्तों की लड़ाई है। एक ओर आधुनिक और सेकुलर भारत है और दूसरी ओर हिंदुत्व की विचारधारा पर आधारित भारत। ये दो ऐसे भारत हैं जो आपस में कहीं एक दूसरे से किसी प्रकार मेल नहीं खाते हैं।

जवाहरलाल नेहरू का भारत लोकतांत्रिक, सेकुलर और आधुनिक भारत है, जिसमें ‘सर्वधर्म समभाव’ का समावेश है। यह वह भारत है जो भारतीय संस्कृति और उसके सदियों पुराने इतिहास की नींव पर खड़ा है। भारतवर्ष के लिए लोकतंत्र प्रणाली केवल पश्चिमी देशों की देन नहीं है। यहां सदियों से पीपल के पेड़ों के नीचे और गांव की चौपालों पर बैठकर पंचायत में सबकी सहमति से फैसले होते चले आ रहे हैं।

यही कारण है कि भारत के इर्द-गिर्द निगाह घुमाकर देखिए, तो यह स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि भारत के पड़ोस में कहीं भी लोकतंत्र इतनी आसानी से नहीं फला-फूला जैसे यह भारत में परवान चढ़ा। सन् 1952 में पहले लोकसभा चुनाव से लेकरआज तक भारत में लोकतंत्र किसी भी समस्या के बिना चलता रहता है। क्या यह पाकिस्तान या नेपाल में संभव है? भारत में ऐसा इसलिए संभव है क्योंकि लोकतंत्र हमारे डीएनए में है। परंतु इस ऐतिहासिक तथ्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि भारत में इस पंचायती लोकतांत्रिक परंपरा को आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणाली का स्वरूप देने वाले व्यक्ति का नाम जवाहरलाल नेहरू था।

हिंदुत्व भले ही आज लोकतंत्र के विरुद्ध कोई आवाज न उठा रहा हो। लेकिन संघ विचारधारा को जनता तक पहुंचाने वाले संघ के दूसरे सर संघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘बंच ऑफ थॉट’ में भारत के संविधान से लेकर भारतीय ध्वज तक हर उस लोकतांत्रिक प्रणाली का विरोध किया जिसका निर्माण जवाहरलाल नेहरू ने किया था। संघ की विचारधारा के अनुसार भारत के अल्पसंख्यक या स्वयं हिंदू समाज की ‘निचली जातियां’ को वोट का अधिकार नहीं होना चाहिए। भले ही संघ खुलकर यह बात न कहे। परंतु संघ का भारत मूलतः मनुवाद का दूसरा स्वरूप है।

जवाहरलाल नेहरू ने संघ के उस भारत के सपने को चकनाचूर कर दिया। केवल इतना ही नहीं अब संघ या मोदी जैसे नेता कुछ भी कर लें भारत के लोगों से वोट का अधिकार नहीं छीन सकते। यह जवाहरलाल नेहरू का योगदान है कि संघ कितना ही एड़ी-चोटी का जोर लगा ले, अब संघ के मूल हिंदुत्व विचारों के भारत का निर्माण संभव नहीं है। ऐसे में संघ जवाहरलाल नेहरू से प्रेम तो कर ही नहीं सकता।

चलिए, अब जवाहरलाल नेहरू तो रहे नहीं, तो फिर उनके परिवार से इतना बैर क्यों? आज भी मोदी हर रैली में गांधी परिवार का रोना क्यों रोते हैं। इसका कारण यह है कि गांधी परिवार जिस आधुनिक भारत की संरचना में लगा है उस प्रकार का आधुनिक भारत संघ के सपनों का भारत नहीं हो सकता है। किसी भी देश में केवल स्मार्ट सीटीज, बुलेट ट्रेन, मेट्रो, बड़े-बड़े कारखाने, या उसकी ऊंचाई को छूती जीडीपी जैसे मापदंड ही उस देश की आधुनिकता के प्रमाण नहीं हो सकते हैं। आधुनिकता इन तमाम मापदंडों के साथ-साथ किसी भी समाज की मानसिकता से जुड़ी परिस्थिति का नाम है।

अगर केवल चमकती सड़कें और देश में दौलत की रेल-पेल ही आधुनिकता का मूल मापदंड होता तो कदापि सऊदी अरब या दुबई एशिया के सर्वोच्च आधुनिक देश होते। परंतु सामाजिक मानसिकता के आधार पर सऊदी अरब और दुबई जैसे आधुनिक देश की तुलना भारतीय आधुनिकता से नहीं हो सकती। और इस सामाजिक आधुनिकत्व में जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी का जो योगदान रहा है वैसा योगदान किसी और नेता का नहीं रहा है।

इंदिरा गांधी ने जब बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया या राजा-महाराजाओं के प्रीवी पर्स पर पांबदी लगाई तो उससे भारत में जमींदारी प्रथा की कमर टूट गई, जिसने भारतीय समाज में जो आधुनिक चेतना उत्पन्न की उससे भारत वर्ष में किसी के ‘माई-बाप’ होने की धारणा समाप्त हो गई। ऐतिहासिक रूप से इंदिरा गांधी ने भारत में सामाजिक रूप से जमींदाराना मूल्यों की जड़ काटकर भारतीय समाज को एक आधुनिक समाज और मूल्यों से जोड़ दिया।

इसी प्रकार राजीव गांधी की कंप्यूटर क्रांति ने आज भारत के गांव-गांव को जिस प्रकार स्मार्ट फोन एवं डिजिटल टेक्नोलॉजी से जोड़ दिया वैसा परिवर्तन राजीव के अतिरिक्त और कोई नहीं दे सका। इस परिवर्तन से भारतीय सामाजिक चेतना में जो बदलाव आया उस योगदान का कोई पैमाना नहीं हो सकता।

यह सामाजिक चेतना हिंदुत्व के लिए एक दीवार है, जिसको संघ नहीं तोड़ सकता है। इस सामाजिक परिवर्तन में गांधी परिवार का जो योगदान रहा है उसकी तुलना किसी और भारतीय नेता से नहीं की जा सकती है। गांधी परिवार की इस विरासत से ही संघ को केवल घृणा ही नहीं अपितु डर भी लगता है। तब ही तो जब राहुल गांधी ने राजनीति में कदम रखा तो संघ और बीजेपी ने वंशवाद का हल्ला मचाया। अब जब प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रवेश किया है तो फिर वही संघ और बीजेपी की ओर से वंशवाद का हल्ला है।

कारण यह है कि गांधी परिवार की इस नई पीढ़ी से हिंदुत्व राजनीति को डर लग रहा है। यह डर वही है जो डर संघ और उसके वैचारिक अनुयाइयों को जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से लगता था। वह डर इस बात से है कि गांधी परिवार का हर व्यक्ति जिस आधुनिक भारत का निर्माण करेगा, उससे हिंदुत्व विचारधारा की जड़ें खोखली होती जाएंगी। जो परिवार वैचारिक रूप से संघ की विचारधारा के लिए ही एक भीषण खतरा हो उससे संघ और मोदी जैसे उसके अनुयायी प्रेम तो कर नहीं सकते।

यही एकमात्र कारण है जिसकी वजह से प्रियंका गांधी के राजनीतिक आगमन से वंशवाद का हल्ला है। परंतु इसका संघ क्या करे कि उत्तर प्रदेश की जनता को प्रियंका में इंदिरा गांधी की झलक दिखाई पड़ रही है। यह झलक केवल इंदिरा गांधी के स्वरूप की झलक नहीं है। यह झलक तो इंदिरा गांधी के उस योगदान की झलक है जिसने गांव-गांव उत्तर प्रदेश के गरीब मानस को एक नई चेतना दी थी। निःसंदेह संघ को प्रियंका गांधी से डर लगना ही चाहिए।

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