चुनावी राज्यों में किसान आंदोलन पहुंचने से बीजेपी की जमीन खिसकी, अब सुप्रीम कोर्ट की कमेटी से ही उम्मीद

मोदी सरकार आंदोलन कर रहे किसानों के प्रति असंवेदनशील ही रही है। लेकिन अब वह पसोपेश में है क्योंकि किसान आंदोलन की लपटें उन राज्यों को भी अपने घेरे में ले रही हैं, जहां चुनाव होने जा रहे हैं। इसलिए अब उसे पैरों के नीचे से जमीन खिसकती नजर आ रही है।

फोटोः IANS
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आसिम खान

किसानों को दिल्ली बॉर्डर पर बैठे हुए 100 से अधिक दिन हो गए। साफ है कि वे झुकने वाले नहीं हैं। जिन पांच राज्यों में अगले दो महीनों में चुनाव हैं, वहां महापंचायतें कर किसान सरकार को अपनी शक्ति का अंदाजा भी कराने जा रहे हैं। बंगाल में इस तरह की महापंचायत से बीजेपी में अलग किस्म की बेचैनी है, क्योंकि वहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पकड़ दिनोंदिन और मजबूत होते जाने की सूचनाओं से वह पहले से ही विचलित है।

इधर सरकार को भरोसा है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई कमिटी की रिपोर्ट उसके लिए रास्ता बना देगी। कोर्ट ने 12 जनवरी को इस कमिटी का गठन किया था और कहा था कि कमिटी पहली बैठक के एक महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दे। कमिटी की पहली बैठक 21 जनवरी को हुई थी। कायदे से तो यह रिपोर्ट 21 फरवरी को ही सौंप देनी चाहिए थी, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो पाया है। माना जा रहा है कि अब कमिटी अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप दे रही है क्योंकि फरवरी के तीसरे हफ्ते के बाद से कमिटी की वेबसाइट ने लोगों से सुझाव लेना बंद कर दिया है।

तीन कृषि-व्यापार कानूनों के खिलाफ 26 नवंबर से दिल्ली बॉर्डर पर विरोध दर्ज करा रहीं किसान यूनियनों ने पहले ही कहा है कि उनकी एकमात्र मांग यह है कि इन कानूनों को सरकार पूरी तरह वापस ले; वे इसके अलावा कोई मांग रख ही नहीं रहे। इस कमिटी के सामने इनमें से किसी भी यूनियन के किसी भी प्रतिनिधि ने जाकर अपनी बात दर्ज नहीं कराई है। बॉर्डर पर 400 यूनियनों की केंद्रीय समन्वय समिति ही सारे मामलों पर एकमात्र फैसला कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट की कमिटी की वेबसाइट पर बताया गया है कि कमिटी की 15 बैठकें हुई हैं। इनमें विशेषज्ञ समिति की दो आरंभिक बैठकें भी शमिल हैं। कमिटी ने अब तक जो 9 प्रेस विज्ञप्तियां जारी की हैं, उनमें से सिर्फ एक में ऑल इंडिया किसान कोऑर्डिनेशन कमिटी (एआईकेसीसी) से बात होने का जिक्र किया गया है। लगता है, कमिटी ने किसान यूनियनों के साथ तीन और ‘किसान समूहों’ के साथ दो बैठकें की हैं। प्रेस रिलीज में इनके नाम नहीं बताए गए हैं, लेकिन यह उल्लेख है कि ‘8 राज्यों से 10 यूनियनों, 11 राज्यों से 17 संगठनों और 9 राज्यों से 32 किसान संगठनों’ ने विचार-विमर्श में हिस्सा लिया और अपने विचार तथा सुझाव प्रस्तुत किए। वेबसाइट पर इनके नाम नहीं बताए गए हैं। खास बात यह है कि प्रेस विज्ञप्तियों में किसान यूनियनों और किसान समूहों के अंतर भी नहीं बताए गए हैं।

कमिटी ने राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों से भी ऑनलाइन मुलाकात की। यह बात अलग से दर्ज करने लायक है कि राज्यों के साथ हुई इस एकमात्र बैठक में हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे कई प्रमुख राज्यों का उल्लेख नहीं है, जबकि कम-से-कम इन चार में ही छत्तीसगढ़ को छोड़कर सभी राज्यों में भारतीय जनता पार्टी का शासन है। वैसे, कमिटी ने अनाज खरीदी करने वाली एफसीआई, नाफेड- जैसी संस्थाओं के साथ एएमयूएल, वेंकटेश्वर हैचरीज, आईटीसी तथा नबार्ड- जैसे केंद्रीय संगठनों से औद्योगिक प्रतिनिधियों से भी भेंट की।

इस कमिटी में सुप्रीम कोर्ट ने चार सदस्य बनाए थे- भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष और पूर्व राज्यसभा सदस्य भूपिंदर सिंह मान, महाराष्ट्र में शेतकारी संगठन के अध्यक्ष अनिल घनावत, इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट में दक्षिण एशिया के निदेशक प्रमोद कुमार जोशी और कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी। भूपिंदर सिंह मान ने पहले ही सार्वजनिक तौर पर कह दिया था कि वह इस कमिटी का हिस्सा नहीं बने रहना चाहते हैं। फिर भी, सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जगह अन्य किसी को नामित नहीं किया।

दिल्ली बॉर्डर पर जमे या देश के विभिन्न क्षेत्रों में संघर्ष कर रहे किसानों की तो नहीं, लेकिन सरकार की निगाह कमिटी की सिफारिशों पर लगी हई है। उसे उम्मीद है कि कमिटी ऐसी सिफारिशें करेगी जिन्हें मान लेने की बात कहकर सरकार आंदोलनरत किसानों को मना लेगी। असली सवाल यह है कि क्या कमिटी ऐसी कोई सिफारिश कर पाएगी जो सरकार और आंदोलनरत किसानों- दोनों ही पक्षों को मान्य हो? वैसे, इस पर हमारी-आपकी सबकी निगाह तो लगी रहेगी ही।

दरअसल, कमिटी जो भी सिफारिशें करती है, उस पर सुप्रीम कोर्ट का क्या निर्देश रहता है, यह देखने के साथ सरकार की रुचि इस बात में भी है कि किसानों के साथ बातचीत का रास्ता किसी तरह फिर खोला जाए। चुनाव वाले पांच राज्यों में इन किसानों ने महापंचायतें करने का जो फैसला किया है, वह बीजेपी के लिए सिरदर्द है। इनमें से कोई राज्य ऐसा नहीं है, जहां बीजेपी अकेले या अपने सहयोगी दलों के साथ आराम से जीत दर्ज कराने की हालत में हो। यूपी में अगले दो माह में होने वाले पंचायत चुनाव उसके लिए अलग सिरदर्द हैं। ऊपर से भले ही सबकुछ शांत दिख रहा हो, सच्चाई तो यही है कि किसानों के आंदोलन को लेकर लगभग पूरी एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) में बेचैनी बढ़ती जा रही है।

इस बैचैनी को इस बात से समझा जा सकता है कि फरवरी के दूसरे हफ्ते में यूपी के बीजेपी सांसदों और कुछ विधायकों की दिल्ली में हुई बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के निर्देश पर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने जब नेताओं से पूछा कि कौन अपने इलाके में जाकर किसानों को कृषि-व्यापार कानून के फायदे बताने को आगे आ सकता है, तो सांसद संजीव बालियान के अलावा कोई आगे नहीं आया। बालियान को भी 22-23 फरवरी को मुजफ्फरनगर में जिस तरह के विरोध का सामना करना पड़ा, उससे बीजेपी नेतृत्व को स्थिति का अंदाजा हो गया। बालियान तेरहवीं के बहाने एक सार्वजनिक समारोह में भाग लेना चाह रहे थे, लेकिन लोगों ने उनकी एक नहीं सुनी।

वैसे, सरकार ने किसान आंदोलन से जुड़े लोगों को तोड़ने की कोशिश भी लगातार जारी रखी हुई है। हाल में मुजफ्फरनगर में ही अचानक दसेक किसान यूनियनों का गठन हो गया। सब अपने को असली बताने लगे। यह सब कुछ सरकार के इशारे पर था। लेकिन भारी जनविरोध के बाद इनमें से दो तो किसान आंदोलन की मुख्यधारा में आ गए, जबकि अधिकतर चुपचाप बैठ गए हैं। दो-तीन अब भी छिटपुट कुछ-कुछ करते रहते हैं जिसका कोई महत्व नहीं है।

वहीं, यूपी के बाराबंकी और बस्ती में हुई महापंचायतों से बीजेपी को अंदाजा हो गया है कि यह आंदोलन महज पश्चिमी क्षेत्र और जाटों का नहीं है। सैफई के बाद गोरखपुर और वाराणसी में भी महापंचायतों का आयोजन किया जा रहा है। यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को सीधी चुनौती है। यूपी में राष्ट्रीय लोकदल और समाजवादी पार्टी को भी इससे उभरने का मौका मिल रहा है और इससे बीजेपी के प्रदेश नेतृत्व का चिंतित होना स्वाभाविक है। उसमें पंचायत चुनावों को लेकर डर गहरा होना उचित ही है।

राकेश टिकैत और अन्य प्रमुख किसान नेता अब दिल्ली बॉर्डर पर हफ्ते में दो दिन से अधिक टिक भी नहीं रहे। वह राजस्थान, मध्य प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र, गुजरात तक जा रहे हैं या जाने वाले हैं। बीजेपी की चिंता बंगाल को लेकर भी है। बंगाल में महापंचायतों के आयोजन को अंतिम रूप दिया जा रहा है। स्वाभाविक है कि इन महापंचायतों में तृणमूल कांग्रेस, लेफ्ट और कांग्रेस के साथ-साथ सभी बीजेपी विरोधी दलों की रुचि है। स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष योगेन्द्र यादव ने भी कहा है कि किसान यूनियनें बंगाल के अलावा चार अन्य राज्यों- असम, केरल, पुडुचेरी और तमिलनाडु में भी महापंचायतें करेंगी।

इन स्थितियों की वजह से ही बीजेपी ने बैक डोर पॉलिटिक्स तेज कर दी है। उसने आंदोलन में शामिल कुछ नेताओं को अलग-अलग आश्वासन देकर उन्हें बातचीत करने को तैयार करने की कोशिश भी की, लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला। सभी किसान नेता एक ही बात कह रहे हैं कि सरकार को पहले की तरह संयुक्त किसान मोर्चा से एकसाथ बात करनी होगी। लेकिन इन नेताओं के पास दूत तो पहुंच ही रहे हैं ताकि बातचीत का रास्ता खुले। इन सभी दूतों का कहना है कि वे यह सब अमित शाह की रजामंदी से कर रहे हैं। जो दूत पहुंच रहे हैं, उनमें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के समर्थक से लेकर बाबा रामदेव के करीबी तक हैं।

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