मृणाल पांडे का लेख: तिनका-तिनका बिखरता कुनबा, यूपी में हिंदू नहीं, बीजेपी है खतरे में

उत्तर प्रदेश में राम भरोसे चुनावी नैया पार लगाने की फिराक में जुटी बीजेपी को इस सप्ताह हुई राजनीतिक उथल-पुथल में करार झटका लगा है और राजनीति की बिसात जाति ने धर्म को मात दी है तो फिलहाल ‘मंडल’ ने ‘कमंडल’ को पछाड़ दिया है।

फोटो सोशल मीडिया
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मृणाल पाण्डे

पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में सबकी निगाहें अगर उत्तर प्रदेश पर हैं तो इसकी वाजिब वजह है। 24 करोड़ की आबादी और करीब 15 करोड़ वोटरों वाला यह प्रदेश यह फैसला करने जा रहा है कि सूबे की सत्ता किसके हाथ में रहेगी। उत्तर प्रदेश 543 सदस्यों वाली लोकसभा में 80 और 245 सदस्यों वाली राज्यसभा में 31 सांसद भेजता है और इस लिहाज से देश का प्रधानमंत्री कौन होगा, इसमें भी वह अहम किरदार निभाता है।

उत्तर प्रदेश ऐसा प्रदेश है जहां केवल तीन मुख्यमंत्रियों ने अपना कार्यकाल पूरा किया और इनमें योगी आदित्यनाथ एक हैं। हालांकि उत्तर प्रदेश का इतिहास रहा है कि कोई व्यक्ति दोबारा मुख्यमंत्री नहीं बना है, फिर भी बीजेपी ने साफ कर दिया कि 2022 का चुनाव प्रचार अभियान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ‘महाराज’ कहलाना पसंद करने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही चलेगा। बीजेपी ने यह साफ संदेश दे दिया है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के लिए जरूरी है कि योगी की सरकार दोबारा आए।

बीजेपी सोची-समझी रणनीति के तहत चुनाव को 80 फीसदी बनाम 20 फीसदी बनाने की जिस फिराक में थी, वह धरी रह गई। चंद दिनों के भीतर तीन मंत्रियों और आठ विधायकों के बीजेपी से इस्तीफे हो चुके हैं और आने वाले समय में यह सूची और भी लंबी होने जा रही है। इन इस्तीफों से अमित शाह का वह जातीय गणित गड़बड़ा गया है जिसके बूते उन्होंने 2017 की शानदार सफलता की पटकथा लिखी थी। लेकिन इस बार स्थिति अलग है। यह साफ है कि अयोध्या, काशी और मथुरा हिन्दुओं को बीजेपी के पाले में रखने के लिए काफी नहीं।

प्रदेश में अगड़ी जातियों और दलितों की आबादी में लगभग आधे की हिस्सेदारी है। बाकी में अन्य पिछड़ी जातियां आती हैं। बीजेपी ने पिछली बार अन्य पिछड़ी जातियों, दलितों और अगड़ी जातियों को ‘हिन्दुओं’ के तौर पर एकजुट कर लिया था। लेकिन ओबीसी मंत्रियों के इस्तीफे से साफ हो गया है कि इन्हें जोड़े रखने में धर्म की गोंद काम न आई। साफ है, पिछली बार की तरह बीजेपी को पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश- दोनों क्षेत्रों के लोगों का समर्थन नहीं मिलने जा रहा बल्कि स्थिति एकदम उलट है।

स्वामी प्रसाद मौर्य, मायावती के नेतृत्व में बनी बसपा सरकार में मंत्री थे और तब अखिलेश यादव विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थे। अनुभवी स्वामी प्रसाद मौर्य को रामविलास पासवान की तरह ही राजनीति का ‘मौसम विज्ञानी’ कहा जाता है। ओम प्रकाश राजभर की तरह बीजेपी छोड़ने का विकल्प उनके पास पहले भी था। लेकिन उन्होंने चुनाव की तारीखों के ऐलान का इंतजार किया जिससे यह संदेह मजबूत हो सके कि उन्होंने यह फैसला हवा के बदलते रुख को देखते हुए लिया। मौर्य ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में बीजेपी की संभावनाओं को भारी चोट पहुंचाई है और पश्चिम में तो जाट और मुस्लिम किसान पहले से ही बीजेपी के खिलाफ हैं। ऐसे में यह संभावना न के बराबर है कि हर चुनाव में मुख्यमंत्री को बदल देने की उत्तर प्रदेश के इतिहास को योगी आदित्यनाथ बदल सकें।


उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों और ठाकुरों में अदावत महाभारत जितनी ही पुरानी है। 1980 के दशक तक ज्यादातर चुने प्रतिनिधि इन्हीं दोनों समुदायों से आते रहे। प्रदेश में 12 फीसदी ब्राह्मण वोटर हैं और पूर्वी उत्तर प्रदेश में तो इनका प्रतिशत 20 है और पूर्वी जिलों में अक्सर वही चुनावी परिणाम तय करते हैं। देश की राजनीति में भी उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण नेताओं का बोलबाला रहा। जवाहरलाल नेहरू, गोविंद वल्लभ पंत, कमलापति त्रिपाठी इसी समुदाय से थे और इंदिरा भी कश्मीरी पंडित पिता की बेटी होने के नाते ब्राह्मण के तौर पर ही देखी जाती थीं। 60 के दशक के खत्म होते-होते गैर- कांग्रेसी दौर में चौधरी चरण सिंह, राम मनोहर लोहिया और राजनारायण जैसे ताकतवर गैर- ब्राह्मण नेताओं का उदय हुआ।

इंदिरा गांधी के दोबारा मजबूत स्थिति में आने के बाद कांग्रेस के तीन ब्राह्मण नेताओं- कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी ने उत्तर प्रदेश की बागडोर संभाली। लेकिन आपातकाल के बाद के समय में राम नरेश यादव का उदय हुआ। कांग्रेस के काल में ठाकुर वी पी सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया लेकिन वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके और उन्हें केन्द्र में बुला लिया गया।

उसके बाद मंडल- काल शुरू हुआ जिसमें कद्दावर ओबीसी नेता मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने। उसके चंद वर्षों बाद दलित नेता मायावती सीन में आईं और उसके बाद प्रदेश की सत्ता मोटे तौर पर ओबीसी और दलित के हाथ में आती-जाती रही। लेकिन 2012 में ‘कमंडल’ की राजनीति के जोर पकड़ने के बाद बीजेपी मुख्यधारा में आ गई। बहरहाल, इस बार मायावती और उनके दाहिना हाथ और ब्राह्मण रणनीतिकार सतीश मिश्रा ने मैदान छोड़ दिया है और यह कहना मुश्किल है कि दलित वोट किधर जाएगा।

बीजेपी का आधार काफी हद तक बनियों (व्यापारी) और ब्राह्मणों के एक वर्ग तक ही सीमित था जबकि पार्टी से ओबीसी का जुड़ना 1990 के दशक में कल्याण सिंह के साथ शुरू हुआ। लेकिन केन्द्र की राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे ब्राह्मण नेताओं के नेपथ्य में जाने और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद स्थितियां बदलीं और इसका असर उत्तर प्रदेश में भी दिखा।

बीजेपी ने 2017 में तब एक नई तरह की जातीय इंजीनियरिंग शुरू की जब एक ठाकुर और गोरखपंथी संप्रदाय के प्रमुख योगी आदित्यनाथ को उसने मुख्यमंत्री बनाया। यह ब्राह्मण और बनिया- दोनों को नागवार गुजरा जो कभी बीजेपी के आधार हुआ करते थे।

पिछले साल ही बीजेपी ने यह महसूस कर लिया था कि उसे अब ब्राह्मणों का समर्थन ऐसे ही नहीं मिलने वाला, इसलिए उसने तरह-तरह से ब्राह्मणों को लुभाने का प्रयास किया। इसी कड़ी में अयोध्या और काशी में भव्य समारोह आयोजित किए गए। जब अखिलेश यादव ने क्षत्रियों का नाश करने वाले के रूप में जाने जाने वाले ब्राह्मण परशुराम की पूजा की तो बीजेपी ने आनन-फानन लखनऊ में परशुराम की प्रतिमा का अनावरण किया और अखिलेश यादव पर ढोंग करने का आरोप लगा दिया।


फिजां में तो इस तरह की बातें भी तैर रही हैं कि काशी कॉरिडोर के लिए छोटे मंदिरों को ध्वस्त करना एक अपशकुन था। कोरोना महामारी के कारण एक ओर तो समाज की सदियों पुरानी विभाजक रेखा उभर आई है, वहीं किसानों के आंदोलन का नतीजा यह हुआ है कि जाट और ओबीसी बीजेपी से दूर हो गए हैं। जाहिर है, ऐसे में बीजेपी गहरे संकट में है।

यह कहना शायद जल्दबाजी होगी कि ताजा जातिगत समीकरण का चुनाव पर क्या असर होगा, ऐसा लगता है कि बीजेपी से हो रहा पलायन बड़े बदलाव कीओर इशारा कर रहा है। इस तरह की चर्चा है कि अभी कुछ और दिन इसी तरह बीजेपी से दामन छोड़ने का सिलसिला चलने वाला है और अगर यह सही साबित होता है तो 2022 के वसंत में बड़े दिलचस्प नतीजों का आना तय है।

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