खरी-खरी: फिर भावुक मुद्दे की राजनीति, काशी की ज्ञानवापी के बहाने अयोध्या द्वितीय की तैयारी

काशी विवाद का भी प्लाट वही है जो अयोध्या का था। स्पष्ट है कि संघ एवं बीजेपी ने यह तय कर लिया है कि सन 2022 में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद वह 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए ज्ञानवापी मस्जिद-काशी विश्वनाथ मंदिर की भावुक राजनीति करेगी।

फोटो : सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

फिर वही अयोध्या जैसी गाथा। अंतर केवल यह है कि उस समय बाबरी मस्जिद एवं राम मंदिर मुद्दा थे इस बार मामला काशी है। ज्ञानवापी मस्जिद एवं काशी विश्वनाथ मंदिर है। यदि अयोध्या में विवाद नवाब वाजिद अली शाह के समय का था, तो काशी में विवाद मुगल शासक औरंगजेब के समय का है। परंतु बात वही हिंदू-मुस्लिम आस्थाओं की है और राजनीति फिर वही हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच की है। काशी में अभी जो विवाद उठ खड़ा हुआ है, वह भी कुछ वैसा ही है जैसा कि अयोध्या विवाद के सन 1986 के समय हुआ था। अय़ोध्या में एक अदालत ने 1986 में एकाएक बाबरी मस्जिद का ताला खोलने की आज्ञा के साथ-साथ राम लला के दर्शन की आज्ञा दे दी थी। बस, फिर जो बवंडर उठ खड़ा हुआ, वह 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद ध्वंस के साथ थमा। इस पूरे हिंदू-मुस्लिम टकराव में लगभग देशव्यापी दंगे हुए और हजारों लोग मारे गए। परंतु इस मस्जिद-मंदिर टकराव में भारतीय जनता पार्टी सन 1984 में लोकसभा में केवल दो सीटों की हैसियत वाली पार्टी से सन 1998 में देश की सत्ता तक पहुंच गई। और इस पूरे प्रकरण में जिस प्रकार मुस्लिम समुदाय हिंदू समुदाय की शत्रु वाली छवि तक पहुंचा दिया गया, उसी रणनीति का प्रयोग कर नरेंद्र मोदी इस समय न केवल संपूर्ण भारत के हिंदू हृदय सम्राट हैं अपितु वह बहुत निपुणतापूर्वक देश को हिंदू राष्ट्र का स्वरूप दे रहे हैं।

ऐसा ही विवाद काशी में भी उठ खड़ा हुआ है। वहां भी एक अदालत ने ऑर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को यह आदेश दे दिया कि वह यह पता लगाए कि क्या ज्ञानवापी मस्जिद किसी ढांचे को तोड़कर बनी अथवा किसी ढांचे के ऊपर बनी अथवा इसके नीचे कोई दूसरी इमारत है। अदालत का यह फैसला भारत सरकार के 1991 के उस नियम का खुला उल्लंघन है जिसमें स्पष्टतः यह कहा गया है कि केवल बाबरी मस्जिद को छोड़कर किसी भी धर्मस्थल पर 15 अगस्त, 1947 के समय की स्थिति पर कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है। स्पष्ट है कि काशी की अदालत का ज्ञानवापी संबंधी फैसला सन 1991 के नियम का घोर उल्लंघन है। जाहिर है कि मुस्लिम पक्ष इस संबंध में ऊपरी अदालत अर्थात इलाहाबाद हाईकोर्ट जाएंगे। और उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड एवं मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने यह ऐलान भी कर दिया है कि वे इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।

स्पष्ट है कि काशी में अयोध्या जैसा विवाद उठ खड़ा हुआ है और उसके वैसे ही राजनीतिक परिणाम उत्पन्न होने की संभावना है। अतः यह समय है कि अयोध्या प्रकरण को समझने की फिर से चेष्टा होनी चाहिए ताकि इस बार वे गलतियां न हों जो सन 1986 से लेकर 1992 तक हुईं। तो आइए, एक बार फिर चलते हैं अयोध्या विवाद की ओर। मैंने स्वयं उस संपूर्ण प्रकरण को देखा ही नहीं अपितु एक पत्रकार के रूप में इस पूरे प्रकरण को रिपोर्ट भी किया। अतः यह मेरे लिए कोई कठिन बात नहीं है। मुझे भली भांति याद है कि सन 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खुलते ही रातोंरात न जाने कैसे बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन हो गया। और देखते ही देखते बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी भारत के संपूर्ण मुस्लिम समुदाय एवं बाबरी मस्जिद हित की ठेकेदार बन गई। केवल इतना ही नहीं, देखते-देखते कमेटी ने बाबरी मस्जिद संरक्षण के नाम पर बड़ी-बड़ी रैलियां आरंभ कर दीं। हम जैसे सारे पत्रकार खूब जानते हैं कि इन रैलियों में मुस्लिम नेताओं की ओर से इस्लाम, मस्जिद एवं मिलत (मुस्लिम समुदाय) को बचाने हेतु बड़े भावुक भाषण होते थे। साथ ही ‘ नारा-ए-तकबीर- अल्लाह ओ अकबर’ के बुलंद आवाज में नारे लगते थे।

बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की ओर से ऐसी भावुक रैलियां लगभग एक वर्ष तक चलती रहीं जिनमें हजारों की तादाद में मुस्लिम मजमा ‘इस्लाम बचाओ’ एवं ‘मस्जिद बचाओ’ के लिए जान की बाजी लगाने की कसमें खाता रहा। राजनैतिक रूप से इस लगभग साल भर के प्रकरण में विश्व हिंदू परिषद राम मंदिर निर्माण के हित में केवल बयान देता रहा। सड़कों पर परिषद की ओर से इस बीच हिंदू हित एवं राम मंदिर निर्माण का कोई आंदोलन नहीं आरंभ हुआ। केवल बाबरी मस्जिद कमेटी मस्जिद एवं मुसलमान का जाप करते रहे। समाचार पत्रों में मुस्लिम रैलियों एवं बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी नेताओं के भावुक भाषण पहले पृष्ठ पर छपते रहे। मौलाना बुखारी, शहाबुद्दीन और आजम खां जैसे मुस्लिम नेताओं का कद बढ़ता रहा।

जब इस प्रकार लगभग एक वर्ष तक मुस्लिम हित एवं मस्जिद हित के स्वर देश में गूंजते रहे, तो फिर राम मंदिर के लिए विश्व हिंदू परिषद की ओर से भी सड़कों पर यकायक देश में ‘जय श्रीराम’ का नारा गूंज उठा। अब विश्व हिंदू परिषद की ओर से ‘हिंदू हित’ एवं ‘मंदिर पक्ष’ की रैलियां आरंभ हुईं जिनमें उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा जैसों की भावुक हिंदू जबान ने भड़काने वाले भाषण आरंभ किए। यूं तो इस देश में मर्यादा पुरुषोत्तम राम पहले से ही दिलों में बसे हुए हैं परंतु जब बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बाबरी मस्जिद हित में रैलियां कर रही थी, उसी बीच दूरदर्शन पर रामायण सीरियल चल रहा था। उस सीरियल ने देश भर को राममय कर रखा था। ऐसे वातावरण में विश्व हिंदू परिषद की ओर से जब राम मंदिर निर्माण का भावुक आंदोलन चला तो कहीं-न- कहीं हिंदू भावनाएं जागनी आरंभ हो गईं। और देखते-देखते बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी एवं विश्व हिंदू परिषद एक-दूसरे के शत्रु के रूप में आमने-सामने थे।

अब दबे स्वर में ही सही देश में पहली बार ‘हिंदू हित’ एवं ‘मंदिर हित’ की भी चर्चा आरंभ हो गई। बस, संघ अपनी रणनीति में पहली बार सफल दिखाई पड़ने लगा। देश के बंटवारे के बाद पहली बार हिंदू समाज का एक बड़ा वर्ग मुस्लिम वर्ग को शत्रु के रूप में देखने लगा। संघ एवं बीजेपी की राजनीति उस समय तक सफल ही नहीं हो सकती जब तक कि हिंदू समाज में मुस्लिम वर्ग की छवि एक शत्रु की न हो। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की रैलियों और उसमें ‘मुस्लिम हित’ एवं ‘मस्जिद पक्ष’ के भाषणों ने हिंदू मन में भी यह भावना पैदा कर दी कि यदि मुस्लिम पक्ष की बात हो सकती है, तो फिर हिंदू पक्ष की बात क्यों नहीं हो सकती है। अब पहली बार यह देश हिंदूमय होने लगा।

लोहा अब गर्म हो चुका था। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की बगैर सोची- समझी एकतरफा हिंदू मैजारिटी वाले देश में मुस्लिम पक्ष की रणनीति ने हिंदू को पहली बार हिंदू एवं मुसलमान को हिंदू शत्रु की छवि दे दी। ऐसे हिंदूमयी माहौल में एकाएक बीजेपी ने राम मंदिर निर्माण का मुद्दा स्वयं अपने हाथों में ले लिया। इधर, वीपी सिंह ने सन 1990 में मंडल कमीशन की ओर से पिछड़ों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की और उधर, उस समय रहे बीजेपी अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी अयोध्या के लिए रथयात्रा पर सोमनाथ से निकल पड़े। अब देश में केवल ‘जय श्रीराम’ की ही नहीं ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ एवं ‘बच्चा-बच्चा राम का’ जैसे आक्रामक हिंदूमयी नारे गूंज रहे थे जिसके आगे बाबरी मस्जिद की रैलियां धूमिल पड़ती जा रही थीं। उधर, बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की मस्जिद न हटाने की रट से हिंदू आक्रोश उत्पन्न हो रहा था। इसका नतीजा यह था कि आडवाणी की रथयात्रा के साथ-साथ देश में भीषण हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क रहे थे। और अब हजारों मुसलमान की जान जा रही थी। देश के हिंदू के मन में मुस्लिम के प्रति घृणा उत्पन्न हो रही थी। उधर, बीजेपी की राजनीति सफल हो रही थी। लोकसभा में केवल दो सांसदों वाली बीजेपी देखते-देखते सन 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सत्ता में थी और सन 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत पर केवल छा ही नहीं चुकी थी अपितु अब देश को हिंदू राष्ट्र का स्वरूप दे रही थी।

यह बाबरी मस्जिद-राम मंदिर एवं बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की इतनी लंबी-चौड़ी गाथा इसलिए कि काशी विवाद का भी प्लाट वही है जो अयोध्या विवाद का था। अयोध्या प्रकरण से यह स्पष्ट है कि संघ एवं बीजेपी ने यह तय कर लिया है कि सन 2022 में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद वह 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए ज्ञानवापी मस्जिद-काशी विश्वनाथ मंदिर की भावुक राजनीति करेगी। सन 2024 का लोकसभा चुनाव बीजेपी के लिए कठिन चुनाव है। देश की अर्थव्यवस्था लगभग छिन्न-भिन्न है। सरकार देश की संपत्ति बेचकर अपना काम चला रही है। नौजवान बेरोजगार हैं। किसान सड़कों पर हैं। धंधे बंद हैं। महंगाई से आम आदमी की कमर टूटी जा रही है। पेट्रोल सौ रुपये लीटर को छू चुका है। ऐसे में मोदी एवं बीजेपी को ज्ञानवापी मस्जिद एवं काशी विश्वनाथ मंदिर विवाद से उत्तम दूसरा भावुक मुद्दा कहां मिल सकता है। यह वह मुद्दा है जिससे भावुक होकर नौजवान अपनी बेरोजगारी भूल सकता है। किसानअपना आंदोलन भूल सकता है। और आम आदमी आस्था के सैलाब में डूबकर महंगाई की मार भूल सकता है। ऐसे में यदि मुस्लिम पक्ष ने काशी विवाद में वही गलती की जो अयोध्या विवाद के समय की थी, तो उसको बचाने वाला ढूढ़े से भी नहीं मिलेगा।

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