क्रूर साहूकारों की याद दिलाता है मोदी सरकार का ‘बही-खाता’ वाला बजट

लाल फाइल वाले बही-खाते की परंपरा को महिमामंडित कैसे किया जा सकता है? इससे आम दुकानदार के खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड रखने वाली पुस्तिका की नहीं, बल्कि क्रूर साहूकारों के उस बही-खाते की छवि उभरती है जिनकी बदौलत देश में कमजोर तबकों पर दशकों तक अत्याचार होता रहा।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया

अपने पहले कार्यकाल के दौरान मोदी सरकार ने योजना आयोग को भंग करके आर्थिक मोर्चे पर अपनी यात्रा की शुरुआत की थी। उसके बाद से ‘ध्वंस’ का यह सिलसिला बेरोकटोक चलता रहा। नोटबंदी लाई गई जिसका लोगों ने खासा खामियाजा भुगता, आधे-अधूरे जीएसटी को पूरे मनमाने तरीके से लागू किया गया, महत्वपूर्ण आर्थिक आंकड़ों को छिपाया गया और इसमें हेरफेर की गई और पूरे देश को निगरानी में रखने की सनक के तहत हर चीज को आधार से जोड़ दिया गया, जिससे तमाम जरूरमंद लोगों को कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल सका।

ऐसा लगता है कि अब बीजेपी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में सालाना बजट प्रक्रिया पर निशाना साधा है, जो बजट से ठीक एक दिन पहले वित्त मंत्रालाय द्वारा आर्थिक सर्वेक्षण पेश करने से शुरू होता है। वित्त मंत्री परंपरागत रूप से बजट को ब्रीफकेस में ले जाते रहे हैं, लेकिन इस सरकार ने इसे लाल फाइल में लपेटकर बजट के तौर-तरीकों को बदलने की कोशिश की है। मुख्य आर्थिक सलाहकार ने तो इसे पश्चिमी विचार की दासता से मुक्ति और भारतीय परंपरा के लौटने के रूप में चित्रित कर दिया। किसी दिन अगर हमारे संविधान, हमारी संसदीय प्रणाली के लिए भी कहा जाने लगे कि यह पश्चिमी धारणा पर आधारित है, तो क्या आश्चर्य।

हैरत की बात है कि लाल फाइल वाले बही-खाते की परंपरा को महिमामंडित कैसे किया जा सकता है, क्योंकि वास्तविक जीवन में इससे जो छवि उभरती है वह किसी आम दुकानदार द्वारा इस्तेमाल में लाए जाने वाले खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड रखने वाली पुस्तिका की नहीं बल्कि क्रूर साहूकारों के उस बही-खाते की है, जिनकी बदौलत भारत के कमजोर तबकों ने दशकों तक खुद पर हुए अत्याचारों को सहा है।

चलिए, आर्थिक सर्वेक्षण और बजट के तथ्यों का रुख करें। आर्थिक सर्वेक्षण काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारतीय अर्थव्यवस्था की मंदी के कुछ प्रमुख पहलुओं को दर्ज करता है- विकास में गिरावट, बचत और निवेश में गिरावट, नौकरियों की कमी, खपत में गिरावट, गहराता बैंकिंग संकट, बढ़ता व्यापार घाटा, वगैरह-वगैरह। अब तक तो ये सब कारक मिलकर ऐसे ‘दुष्चक्र’ की स्थिति पैदा करते दिखते रहे जिससे निकलना मुश्किल लगता है, लेकिन सर्वेक्षण में यह उम्मीद जताई गई कि अचानक इससे ज्यादा राजस्व और विकास का एक ऐसा मार्ग प्रशस्त होगा जो साल 2024-25 तक देश की अर्थव्यवस्था को पांच खरब डॉलर के स्तर तक ले जाएगा। हालांकि मोदी और उनकी टीम इस लक्ष्य का इस तरह बार-बार जिक्र कर रही है, मानो इसे पहले ही हासिल किया जा चुका हो।

इस उम्मीद का आधार वह अनुमान है जिसमें कहा गया है कि निजी निवेश और राजनीतिक स्थिरता के कारण आने वाले वर्षों में आठ फीसदी की विकास दर को पाना संभव होगा। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले पांच साल के दौरान राजनीतिक अस्थिरता जैसी तो कोई स्थिति नहीं थी। मोदी के पहले कार्यकाल में भी बीजेपी को अपने बूते बहुमत का आंकड़ा हासिल था। अगर मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान निवेश बढ़ने की जगह घट गया, तो आखिर मोदी के दूसरे पांच साल के कार्यकाल का नतीजा इससे इतर कैसे हो सकता है? इस बात का जवाब सर्वेक्षण में नहीं मिलता।

ऐसे समय जब बड़े कॉरपोरेट घरानों के कारण एनपीए का पहाड़ खड़ा हो गया है, सरकार भारी-भरकम ऋणों को बट्टे-खाते में डालने में जुटी हुई है और बैंकों को जिंदा रखने के लिए समय-समय पर तंत्र में पूंजी डाल रही है, सर्वेक्षण बड़े डिफॉल्टरों को अर्थशास्त्र के व्यवहार समझाने के लिए धार्मिक सिद्धांतों की दुहाई दे रहा है। यह बताता है कि कैसे हर प्रमुख धर्म ऋण की समय पर अदायगी की पैरोकारी करता है, मानो विजय माल्या और नीरव मोदी को इन धार्मिक सिद्धांतों की याद दिलाने से वे ऋण वापस करने को तैयार हो जाएंगे।

सर्वेक्षण ने ‘स्वच्छ भारत’ और ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियानों को व्यवहारात्मक (बिहेवेरियल) अर्थशास्त्र की सफल कहानियों के तौर पर पेश किया है और इस संदर्भ में जमीनी हकीकत और विभिन्न सर्वेक्षणों को नजरअंदाज कर दिया गया, जबकि इनकी रिपोर्ट लंबे-चौड़े वादों से मेल नहीं खाती। आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार अब भी चीन से अभिभूत है। या तो वह चीन से सीखने या फिर उससे स्पर्धा करने की बात करती है। चीन की आर्थिक सफलता भूमि सुधार और कृषि आधुनिकता, भारी-भरकम सार्वजनिक निवेश और लघु एवं मध्यम उद्यमों के व्यापक संजाल की ठोस बुनियाद पर टिकी है जबकि मोदीनॉमिक्स केवल बड़े निजी निवेश पर केंद्रित है। इस साल का आर्थिक सर्वेक्षण भी बड़े कॉरपोरेट घरानों पर भरोसे की बात दोहराता है।

निर्मला सीतारमण का पहला बजट भी निवेश को बढ़ावा देने के नाम पर बड़े कॉरपोरेट और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लुभाता नजर आता है। सिंगल ब्रांड रिटेल, बीमा, विमानन, मीडिया और एनिमेशन क्षेत्रों में एफडीआई की शर्तों को एकदम से ढीला कर दिया गया है और सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों की रणनीतिक हत्या करते हुए इसे निजी क्षेत्र के अधिग्रहण के लिए पेश कर दिया गया है।

दिलचस्प है कि इस तरह निजी क्षेत्र के अधिग्रहण के लिए आमतौर पर कॉरपोरेट सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से ऋण लेते हैं और जब काफी खींच-तान करके ऋण देने वाले बैंक दीवालिया होने के कगार पर जा खड़े होते हैं, तो सरकार उन्हें संकट से निकालने के लिए उदार शर्तों पर पूंजी लगा देती है। 2019 के बजट में भी देश के करदाताओं की गाढ़ी कमाई के 75 हजार करोड़ रुपये ऐसे बैंकों के लिए उपलब्ध कराए गए हैं। चुनाव खत्म हो चुके हैं, चुनावी बॉण्ड भुनाए जा चुके हैं और शायद पैसे की पुनःवसूली का समय शुरू हो चुका है।

निजीकरण अभियान ढांचागत क्षेत्र तक ही सीमित नहीं, दिलचस्प तथ्य यह है कि इसके दायरे में तमाम सार्वजनिक सेवाएं आ चुकी हैं। परिवहन, ऊर्जा, शिक्षा, सफाई और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से सरकार ने अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ना शुरू कर दिया है। रेलवे अपने महत्वपूर्ण स्टेशनों, रेलवे रूटों और उत्पादन इकाइयों को निजी हाथों में देने की तैयारी में है। हवाई अड्डों को अडाणी को लीज पर दिया जा रहा है और शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं पर सार्वजनिक निवेश और खर्चे में खासी कमी आ रही है।

बीमा आधारित ‘आयुष्मान भारत’ की पहुंच और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की भौतिक उपलब्धता के बीच के क्रूर अंतर को मुजफ्फरपुर में इंसेफेलाइटिस से बड़ी संख्या में होने वाली मौतों के रूप में देखा जा सकता है। बाजार की अवधारणा स्वास्थ्य सेवा को व्यवसाय के रूप में देखती है और इसके बूते लोगों से कमाई करती है। बजट का एक बुरा पक्ष यह भी है कि इसने एससी और एसटी छात्रों के लिए डॉक्टरेट और उसके बाद की फैलोशिप के लिए आवंटन को क्रमशः 602 से घटाकर 283 करोड़ और 439 से घटाकर 135 करोड़ रुपये कर दिया है।

जबकि सरकार ने बुनियादी जरूरतों और लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करने की अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है, अपने राजस्व बढ़ाने के लिए वह पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाने के अलावा कोई रास्ता खोज ही नहीं सकी और उसने इसका बोझ तो लोगों पर डाला ही, तमाम जरूरी सामान और सेवाओं के मंहगे होने का रास्ता भी खोल दिया।

सरकार बेशक भारत को पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की लंबी-चौड़ी बातों के पीछे खुद को छिपाने की कोशिश करे, लेकिन सूखे, भूख और बेरोजगारी की जमीन पर मोदी सरकार की सिलसिलेवार आर्थिक विफलताओं को छिपाने की कोई ओट नहीं। आंकड़ों को लेकर सरकार के गंदे खेल की बदौलत विस्फोटक आर्थिक संकट को लंबे समय तक छिपाकर नहीं रखा जा सकता। सरकार जो आर्थिक आंकड़े इकट्ठा कर रही है, वे विश्वसनीय नहीं रहे जबकि लोगों की पहचान करने वाले सूक्ष्म आंकड़ों को निजी कंपनियां लगातार चुरा रही हैं।

(ये लेखक के विचार हैं। लेखक सीपीआई-एमएल के महासचिव हैं।)

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