न चुनावी है और न ही प्रगतिवादी है यह बजट, यह तो एक डरी हुई सरकार का कबूलनामा है

इस बजट को चुनावी बजट के बजाए मोदी सरकार के डर का कबूलनामा कहना सटीक होगा। सरकार ने इस अंतरिम बजट में जो दो बड़े ऐलान किए हैं वह किसानों और मध्यवर्ग पर केंद्रित हैं। यही वह दो वर्ग हैं जो सरकार को सबसे ज्यादा डरा रहे हैं।

फोटो : Getty Images
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तसलीम खान

मौजूदा मोदी सरकार का आखिरी बजट अपेक्षित रूप से आज के सभी अखबारों की सुर्खियों में है। हर अखबार का अपना नजरिया है, अपनी तरीका है बजट से जुड़ी खबरों को परोसने का। लेकिन देश के चार बड़े बिजनेस अखबारों की सोच इस बजट को लेकर एक ही नज़र आई। बिजनेस स्टैंडर्ड, इकोनॉमिक टाइम्स, मिंट और द हिंदू बिज़नेस लाइन की फ्रंट पेड हेडलाइन एक ही इशारा कर रही हैं कि यह चुनावी बजट है।

चुनावी साल में अंतरिम बजट को लोकलुभावन बनाने की पूर्व की सरकारें भी कोशिश करती रही हैं, और मोदी सरकार ने भी तो यही किया है। चुनावों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने सारा ध्यान किसानों और मध्यवर्ग पर लगा दिया। उसी की चर्चा भी हो रही है। लेकिन क्या यह सिर्फ चुनावी पूर्व सौगातें हैं या कुछ और इसे समझने की जरूरत है।

सबसे पहले हमें समझना होगा कि सरकार ने जो भी तोहफे देने का ऐलान किया है, उसके लिए पैसे कहां से जुटाए जाएंगे इसका कोई रोडमैप नहीं बताया है। वित्तीय अनुशासन की ढिंढोरा पीटने और पारदर्शिता के नारे लगाने वाली यह सरकार दोनों ही मोर्चों पर अपनी भद्द पिटवाती रही है। तो क्या बजटीय घोषणाओं को भी सिर्फ नारा या विपक्षी दलों की भाषा में कहें तो जुमला ही माना जाए।

नारे और जुमले तो 2014 में भी बहुत सारे सामने आए थे, लेकिन तब तक न तो बीजेपी और न ही प्रधानमंत्री मोदी किसी कसौटी से होकर गुज़रे थे। वैश्विक और कुछ घरेलू राजनीतिक कारणों से डांवाडोल अर्थव्यवस्था के दौर में बीजेपी और मोदी ने जो वादे किए थे, उन्हें लोगों ने सहज सच मान लिया था। लेकिन शासन के पांच साल बाद आज स्थिति अलग है, सरकार को अपना रिपोर्ट कार्ड सामने रखना है और 2014 के नारों-वादों से उसकी तुलना हो रही है।

यही वह कारण है कि इस बजट को चुनावी बजट के बजाए मोदी सरकार के डर का बजट कहना सटीक होगा। सरकार ने इस अंतरिम बजट में जो दो बड़े ऐलान किए हैं वह किसानों और मध्यवर्ग पर केंद्रित हैं। यही वह जो वर्ग हैं जो सरकार को सबसे ज्यादा डरा रहे हैं। और इस डर को दूर भगाने के लिए सरकार ने 17 रुपए प्रतिदिन का टोटका किया है। किसानों को भी 17 रुपए रोज़ और मध्यवर्ग को भी 17 रुपए रोज़ की अतिरिक्त आमदनी का तरीका सरकार ने सामने रखा है।

इनमें से भी एक टोटका तुरंत शुरु हो जाएगा यानी किसानों को इसी साल से 6000 रुपए सालाना मिलने वाले पैसे की पहली किस्त दे दी जाएगी, और मध्यवर्ग को अभी इसके लिए चुनाव बाद बनने वाली नई सरकार का इंतज़ार करना होगा।

इन दो बड़े डर के अलावा एक और डर सरकार को साल रहा है, वह है वर्गों से अलग धार्मिक वोट बैंक। इस डर के लिए सरकार ने कामधेनु योजना लागू कर गौमाता की पूजा करने वाले बड़े वर्ग को साधने का काम किया है।

मोदी शासन के बीते सालों में कम से कम पांच बड़े किसान आंदोलन सामने आए। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश और अन्य राज्यों को किसानों की नाराजगी बड़े आंदोलनों और किसान यात्राओं और प्रदर्शनों को रूप में सामने आती रही। महाराष्ट्र में किसानों का अनुशासित मार्च, दिल्ली में जबरदस्त प्रदर्शन, दिल्ली-यूपी सीमा पर किसानों का जमावड़ा, मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों पर फायरिंग, तमिलनाडु के किसानों का नंगे बदन दिल्ली में धरना, आंध्र-तेलंगाना किसानों का अपनी मांगे उठाना आदि ऐसे उदाहरण हैं, जिन्होंने सरकार के मन में भय पैदा कर दिया। भले ही सरकार इसकी स्वीकारोक्ति न करे, लेकिन हाल के तीन हिंदी भाषी बड़े राज्यों के विधानसभा चुनावों में किसानों की नाराजगी का खामियाज़ा बीजेपी को सत्ता से बेदखल होकर भुगतना पड़ा।

हालांकि बिना विभाग के मंत्री और पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट के बाद न्यूयॉर्क में अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि बीते पांच साल में कोई ‘सोशल अनरेस्ट’ नहीं हुआ। लेकिन किसानों के इन बड़े आंदोलनों को नज़रंदाज़ करने के पीछे कानून की पढ़ाई कर वकालत करते रहे और सिवाय विश्वविद्यालय चुनाव के कोई भी चुनाव न जीतने वाले अरुण जेटली का अहंकार ही इस कथन के पीछे।

यहां हमें ध्यान रखना होगा कि अरुण जेटली ने ही पिछले बजट भाषणों में किसानों की आय दोगुनी करने का ऐलान किया था। बजट पश्चात टीवी डिबेट में बैठे स्वराज इंडिया के नेता योगेंद्र यादव ने जब केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से विनम्रतापूर्वक आग्रह किया कि वे सिर्फ यह बता दें कि किसानों की आय दोगुना करने का लक्ष्य कितने फीसदी हासिल किया जा चुका है, तो इसके जवाब में मोदी सरकार के मंत्री ने योगेंद्र यादव को चाय पे चर्चा का न्योता दे दिया।

अन्नदाता की नाराज़गी का डर ही है जो मोदी सरकार वित्तीय हालत खराब होने के बावजूद किसी न किसी तरह उन्हें मनाने के टोटके करने में जुटती नजर आ रही है।

मोदी सरकार का दूसरा डर मध्यवर्ग से है, जो आमतौर पर शहरों में रहता है, ईमानदारी से टैक्स चुकाता है, सारे-नियम कानून का पालन करता है। सत्ता में आने के बाद अगर किसी वर्ग को सबसे ज्यादा तकलीफों से दोचार होना पड़ा है तो यही वर्ग है। इस सरकार ने सबसे ज्यादा इसी वर्ग को दुहा है। सबसे बड़ी चपत तो पेट्रोल-डीज़ल के नाम पर लगाई इस सरकार ने जब तीन साल में करीब 10 लाख करोड़ रुपए इस वर्ग से एक्साइज के नाम पर छीन लिया गया। मध्यवर्ग ने अपनी नाराजगी लोकसभा सीटों के उपचुनावों और तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में जता दी। ऐसे में इस वर्ग को भी खुश करने के जतन में जुटी है सरकार।

और सबसे बड़ा सवाल यह कि सरकार ने इस बजट में न तो देश की विकास दर बढ़ाने का कोई रास्ता बताया और न ही कमाई बढ़ाने का। लेकिन आखिर एक डरी हुई सरकार से उम्मीद भी क्या की जा सकती है।