समता और न्याय से काफी दूर है यह बजट, सरकार ने गरीबों, मजदूरों को राहत देकर विषमता कम करने का बड़ा मौका गंवाया

यह सिद्ध हुआ है कि जब अति धनी व्यक्तियों की आय में वृद्धि होती है, तो उसका देश की अर्थव्यवस्था पर कोई सकारात्मक असर नहीं होता है, जबकि यदि निर्धन परिवारों की आय वृद्धि होती है तो इससे अर्थव्यवस्था पर गुणात्मक या मल्टीप्लायर असर होता है।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया
user

भारत डोगरा

वर्ष 2022-23 का केन्द्रीय सरकार का बजट ऐसे समय पर प्रस्तुत किया गया है, जब देश का निर्धन वर्ग बहुत गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। एक ओर तो निर्धनता और अभाव प्रभावित व्यक्तियों की संख्या में हाल के समय में तेजी से वृद्धि हुई है, दूसरी ओर उनका अभाव बढ़ता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 की विकट स्थितियों में विश्व में जितने नए लोग गरीबी की चपेट में आए, उनमें से लगभग आधे भारत में थे जिनकी संख्या 4 करोड़ से अधिक है।

दूसरी ओर मुम्बई की प्राईज संस्थान के विश्लेषण से पता चलता है कि वर्ष 2015-16 और 2020-21 के बाद भारत के सबसे निर्धन 20 प्रतिशत परिवारों की आय में 53 प्रतिशत की गिरावट आई है, जबकि इससे पहले के दशक में वर्ष 2005-06 से 2015-16 के दौरान उन्होंने उल्लेखनीय आय वृद्धि दर्ज की थी।

साल 2021 के उपभोक्ता आंकड़ों के विश्लेषण से सेंटर फाॅर मानिटरिंग इंडियन इकाॅनमी ने बताया है कि लगभग 84 प्रतिशत भारतीयों की स्थिति में कुछ न कुछ गिरावट हुई। इस तरह की गिरावट की स्थिति ने अधिकांश भारतीयों को अपनी चपेट में लिया है। इसी सेंटर के एक अन्य विश्लेषण ने बताया कि 20-24 वर्ष के आयु वर्ग के स्नातकों (ग्रेजुएट) में बेरोजगारी 60 प्रतिशत तक पंहुच गई है, जबकि वर्ष 20-29 आयु वर्ग में यह 43 प्रतिशत तक पहुंच गई है। निश्चय ही यह बहुत चिंताजनक स्थिति है।

आज यह विश्व स्तर पर चर्चा का विषय है कि जनसाधारण और विशेषकर निर्धन वर्ग की बढ़ती कठिनाईयों के दौर में विषमताएं तेजी से बढ़ी हैं। प्राईज के सर्वेक्षण के अनुसार जहां नीचे के 20 प्रतिशत परिवारों की आय वर्ष 2015-16 और वर्ष 2020-21 के बीच 53 प्रतिशत कम हुई वहीं ऊपर के 20 प्रतिशत परिवारों की आय ने 39 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की। ऑक्सफैम विषमता रिपोर्ट ने बताया कि विशेषकर भारत के अरबपतियों की संपत्ति और आय में हाल के समय में बहुत तेजी से वृद्धि हुई। सबसे धनी 98 अरबपतियों के पास जो संपत्ति है, वह देश के 55 करोड़ लोगों (नीचे की 40 प्रतिशत जनसंख्या) के बराबर है।


इस स्थिति में यह स्पष्ट है कि बड़ी और महत्त्वपूर्ण समतावाद पहल की जरूरत बहुत बढ़ गई है। बजट की इस संदर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका बहुत बढ़ गई है कि वह समतावादी सोच को आगे बढ़ाए, अरबपतियों और अति धनी वर्ग पर समुचित टैक्स लगाकर उनसे पर्याप्त संसाधन जुटाए और इन्हें निर्धन वर्ग को उपलब्ध करवाए। इससे निर्धन परिवारों को बहुत राहत तो मिलेगी ही, इसके साथ अर्थव्यवस्था भी समतामूलक रिकवरी के दौर में आएगी।

जब अति धनी व्यक्तियों की आय वृद्धि होती है, तो उसका अर्थव्यवस्था पर कोई सकारात्मक असर नहीं होता है, जबकि यदि निर्धन परिवारों की आय वृद्धि होती है तो इससे अर्थव्यवस्था पर गुणात्मक या मल्टीप्लायर असर होता है। यानि निर्धन वर्ग की आवश्यकताओं की पूर्ति से कई स्तरों पर अर्थव्यवस्था में सक्रियता आती है और समतामूलक वृद्धि होती है।

यह अध्ययनों और सर्वेक्षणों से सामने आया है कि जब केंद्र सरकार के बजट के माध्यम से मनरेगा जैसी योजनाओं के लिए बजट में महत्वपूर्ण वृद्धि की जाती है तो उससे केवल मनरेगा पर कार्य कर रहे मजदूरों को ही राहत नहीं मिलती है अपितु जैसे-जैसे यह पैसा गांव और कस्बे के स्तर पर खर्च होता है तो गांव और कस्बे की अर्थव्यवस्था पर मल्टीप्लायर असर भी होता है। अतः अर्थशास्त्री समतामूलक रिकवरी के लिए यह सुझाव देते हैं कि देश की आय का अधिक हिस्सा उन परिवारों के हाथ में पंहुचाया जाना चाहिए जिनकी आवश्यकताओं की पूर्ति अभी आय के अभाव से बनी हुई है।

मनरेगा की प्रगति को मॉनिटर करने में लगे कुछ समूहों ने बजट से कुछ समय पहले ही बताया था कि मनरेगा के लिए जरूरी संसाधनों की कमी महंगी पड़ रही है और बहुत से मजदूरों की मजदूरी मिलने में पहले से भी अधिक देरी हो रही है। हजारों करोड़ रुपए का मजदूरी का बकाया एकत्र हो गया है। इस स्थिति में प्रस्तुत होने वाले बजट के लिए यह बहुत जरूरी था कि वह एक साधारण बजट की तरह न होकर निर्धन और जरूरतमंद को विशेष और बड़ी राहत देने वाला बजट सिद्ध हो।


दुर्भाग्यवश वर्ष 2022-23 के बजट में निर्धन परिवारों को राहत देने के लिए, तेजी से बढ़ती विषमताओं को कम कने के लिए और समता लाने के लिए कोई बड़ी पहल नहीं हुई। निश्चय ही सरकार की अनेक गरीबी को कम करने की योजनाएं हैं, कार्यक्रम हैं, वे पहले की तरह चल रहे हैं (प्रायः लक्ष्यों से पीछे चल रहे हैं) पर आज की विशेष स्थितियों को देखते हुए जो निर्धन पक्ष के लिए एक बड़ी पहल की जरूरत थी वह कहीं नजर नहीं आती है। इस तरह निर्धन परिवारों को बड़ी राहत देने का, विषमता कम करने का जो बड़ा अवसर सरकार के पास था, उसे सरकार ने गंवा दिया है।

बजट भाषण में हमने सुना है कि तराशे हुए हीरे-मोती पर कस्टम कम कर दिया गया है, अनेक नदी-जोड़ योजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा, एक्सप्रेसवे और हाईवे को अधिक बढ़ाया जाएगा, तो इस समय यह सब देश की सबसे बड़ी जरूरतों के अनुकूल नहीं है जबकि इस समय तो जरूरत इस बात की है कि निर्धन और जरूरतमंद वर्ग को सीधे-सीधे राहत मिले, उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिक पैसा उनके हाथ में आए और देश की अर्थव्यवस्था की समतामूलक रिकवरी का मार्ग प्रशस्त हो।

मनरेगा पर वर्ष 2020-21 में 110527 करोड़ रुपए खर्च हुआ, वर्ष 2021-22 के बजट में 72034 करोड़ रुपए का प्रावधान इसके लिए रखा गया, पर बाद में इसकी बढ़ती जरूरत को देखते हुए 97074 करोड़ रुपए कर दिया गया। मौजूदा हालत को देखते हुए इसमें बड़ी वृद्धि की मांग जोर पकड़ रही थी, पर इसमें फिर से वर्ष 2022-23 के मूल आवंटन को 72034 करोड़ रुपए कर दिया। यह बहुत निराशाजनक है कि मनरेगा का बजट बढ़ाने के इतने प्रयासों पर कुछ ध्यान ही नहीं दिया गया।

इस तरह बजट में निर्धन वर्ग को बड़ी राहत की उम्मीद बजट ने पूरी नहीं की है और इस राहत का इंतजार अभी और आगे बढ़ गया है।

नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia


Published: 01 Feb 2022, 9:06 PM