मृणाल पाण्डे का लेखः क्या कोई सरकार मनमोहन सिंह की अर्थनीति को स्वीकार किए बिना विदेशी पूंजी का पलायन रोक सकेगी?

निवेशित पूंजी की धारा उसी दिशा में बहेगी जहां सुरक्षित परिवेश में, निश्चित श्रम कानूनों की मदद से उसके अनिर्बाध बहने की पक्की गारंटी हो। यही वजह है कि विश्व के सभी सफल बाजार वे हैं जहां बात-बात में सड़कों पर हिंसा, घर में घुसकर लोगों की हत्या नहीं होती।

फोटोः सोशल मीडिया
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मृणाल पाण्डे

जब-जब कांग्रेस की ग्लानि हुई है, तब-तब देश को कांग्रेस और कांग्रेसियत से मुक्त कराने के छाती ठोंक दावेदारों की बन आती है। पर इतिहास यह भी साबित करता है कि देर-सबेर इंद्रप्रस्थ का विक्रमादित्य सिंहासन हर गैर कांग्रेसी सरकार को राज-काज की उसी इकलौती सफल शैली की तरफ जाने को मजबूर कर देता है, जिसकी हरचंद निंदा करके वह शासन पर काबिज हुई थी।

भारत के मालिक बदलें यह कोई चिंता की बात नहीं। चिंता तब होती है जब हम पाते हैं कि नए पन के नारों के भीतर से नया दिल्ली दरबार पुरानी आर्थिक-सामाजिक असमानता को, धार्मिक भेदभाव को, जातीय वर्गीकरण को फिर सतह पर लाने लगा है, जिन्होंने नाना गैर कांग्रेसी गठजोड़ शासनकालों में अवतारी नेतृत्व की पूजा करने, मीडियाई चाटुकारिता के घंटे घड़ियाल बजाने और (राज्यस्तर पर) वंशाधारित क्षत्रप कुलों से गठजोड़ साधकर देश का बंटाधार किया है। सतह पर एक कमल सरीखा स्वच्छ नेतृत्व जिसकी जड़ें कीचड़-कांदे से रस खींचती हों, यह हम बहुत देख चुके हैं। आजादी दिवस पर यह पूछने का दिल करता है, ऐसा कब तक?

यह ताजा खयाल आजाद भारत के अगले पांच सालों में पांच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था बनने के संदर्भ में आ रहे हैं। नए बजट के हाथों की अभी मेहंदी भी नहीं उतरी, पर उसमें की गई विदेशी पूंजी की भारत भूमि पर भारी आवक की भविष्यवाणी के साथ (शेष एशियाई बिरादरी की तरह) उसे निरुत्साहित करने वाले कदमों की भरमार होती जा रही है, जैसे शीर्ष पर आयकर रेट बढ़ाकर 42.7 फीसदी कर दिया जाना, कॉरपोरेट कर में कोई उल्लेखनीय कमी न होना और साथ ही एकाधिक राज्यों में तरह-तरह के आरक्षण आधारित कोटे बढ़ाने की सगर्व घोषणाएं!

यह तो भारी अंतर्विरोधी बातें हैं भाई! क्या यही वजह थी कि बजट के तुरंत बाद सेंसेक्स धराशाई हुआ और 5000 करोड़पतियों के भारत से पलायन की खबर आई है। कोई भला विदेशी निवेशक अपनी गाढ़ी पूंजी परदेस में दान-हवन करने को तो लाता नहीं। यह जोखिम वह अधिकतम मुनाफा कमाने के लिए ही सोच-समझकर उठाता है। इसीलिए उसे भरोसा दिलाया जाना जरूरी है कि यह काम वह बिना लालफीताशाही से बार-बार टकराए जल्द से जल्द कर सकेगा। कोरिया की इस्पात निर्माता कंपनी पॉस्को दस बरस इंतजार करती रही कि ओडिशा सरकार, जो उसे सादर न्योत कर लाई थी, उसे जमीन और खदान दिलवा देगी, पर आखिरकार उसने अपने तंबू-डेरे उखाड़े और स्वदेश वापिस चली गई।

भारत इसलिए भी निवेशकों को आकृष्ट करता था कि यहां श्रम दरें काफी कम हैं। इसलिए निवेशक चाहते हैं कि अपने उपक्रमों में कामगर लाने के लिए उसे श्रम कानूनों के तहत रक्षा मिले। यानी नए उपक्रम जिस तरह के कुशल श्रमिक चाहते हैं, उनको सिर्फ उनके हुनर के आधार पर वे न्यूनतम वेतनमान पर नौकरियां आवंटित कर सकें। एक बार काम शुरू हुआ, तो उनको मारुति सुजुकी की तरह उग्र यूनियनों या ग्रामीणों से लठैती-बकैती न करनी पड़े।

पर इधर मोदी जी ने गरीबों के लिए सरकारी तथा निजी दोनों क्षेत्रों में 10 फीसदी आरक्षण की घोषणा कर दी है। आंध्र प्रदेश के उभरते सितारे मुख्यमंत्री जगन रेड्डी ने भी तख्तनशीन होते ही ऐलान कर दिया है कि वे राज्य के औद्योगिक उपक्रमों और बुनियादी ढांचे से जुड़ी 75 फीसदी नौकरियां प्रदेश के मूल नागरिकों के लिए ही आरक्षित रखेंगे। इसी के साथ केंद्र सरकार ने सारे देश के लिए एक समान न्यूनतम मजूरी दर तय करने का काम अपने हाथ में ले लिया है, जिससे कई नई तरह की विसंगतियां पैदा हो गई हैं। यह काम अब तक राज्य सरकारें ही अपनी माली हालत के अनुरूप करती आई थीं, क्योंकि सरकारी क्षेत्र में मजूरी राज्य सरकार के खजाने से ही दी जाती है।

पर अब तो ‘सबै भूमि गोपाल की’ का युग है। अब यह सब केंद्र सबके लिए एकमुश्त तय किए दे रहा है, पर बंगाल, तमिलनाडु तथा ओडिशा जैसे जो कई राज्य तयशुदा दर (178 रुपये प्रतिदिन) से अधिक मजदूरी दे रहे हैं, वहां के मजदूर घाटे में आ जाएंगे और उधर उत्तर के बिहार, यूपी सरीखे राज्य भी, जहां न्यूनतम मजूरी की दरें केंद्र की तयशुदा दरों से कम थीं, सरकारी खजाना खाली होने और सस्ती दरों पर मजूर उपलब्ध न होने पर विदेशी निवेशकों के संभावित पलायन की दोहरी चिंता से ग्रस्त हैं।

इसके अलावा पर्यावरण बदलाव से संभावित जल संकट, जमीनी क्षरण और बढ़ती जातीय हिंसा तथा आतंकवाद की परछाइयां और निजी क्षेत्र को आरक्षण की जद में लाए जाने के ऐलान भी मिलजुल कर विदेशी निवेशकों को निरुत्साहित कर रहे हैं। फिर कराधान का मसला है। मोटे गाहक को हर बाजार छूट देता है। और कहावत यह भी है कि दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते। पर हमारे यहां ताजा बजट में कॉरपोरेट कंपनियों और ट्रस्ट के लिए 25 प्रतिशत और 42.7 प्रतिशत की दो अलग-अलग कर दरें आर्थिक विश्लेषकों की राय में गलत संकेत देती हैं।

फंड पर कर 42.7 फीसदी तक बढ़ता देखकर कई विदेशी ट्रस्ट फंड तो अपनी पूंजी समेट कर तुरंत भारत से चले गए हैं। इससे भारतीय बाजार दुष्प्रभावित हुआ है। सरकार उन विदेशी फंड निवेशकों को नेक सुझाव दे रही है कि क्यों न ट्रस्ट फंड को कॉरपोरेट कंपनी के रूप में बदल दिया जाए? पर यह गौरतलब है किआज जिन कई देशों के पेंशन फंड ट्रस्ट में निवेशित हैं, टैक्स कम करवाने को उनको कंपनियों में तब्दील कर देने का सुझाव मानना उनके लिये व्यावहारिक तौर से असंभव है।

भारत के उलट उसके कई एशियाई प्रतिस्पर्धी विकासशील देश विदेशी निवेशकों को जमीन आवंटन, लोन, बिजली, रेल तथा हवाई माल-यातायात, कॉरपोरेट कर और आयकर के क्षेत्रों में आकर्षक छूटें दे रहे हैं। ऐसे में अगर जगन रेड्डी जैसे नए राज्य प्रमुख अपने पूर्व मुख्यमंत्री के बनवाए आवास पर बुलडोजर चलवा कर कहें कि उनको पूर्व मुख्यमंत्री के वक्त के लगभग 21 हजार करोड़ कीमत के वैकल्पिक (हवा तथा सोलर) ऊर्जा उत्पादन के तमाम पूर्व समझौते काफी महंगे प्रतीत हो रहे हैं, लिहाजा वे उन पर पुनर्विचार करना चाहते हैं, तो निवेशकों के कान खड़े होंगे ही। विगत में भारत सरकार द्वारा एनरान कंपनी को पहले सब्सिडी देकर उस पर पुनर्विचार के बाद हर्जाना वसूली की अप्रिय तकरार का इतिहास याद कर परदेसी निवेशकों का भरोसा लड़खड़ाने लगे, तो अचंभा क्या?

ग्लोबल दुनिया में पूंजी निवेश का बुनियादी नियम है कि देश के प्रमुखों के बीच चाय पिलाई और पीठ थपथपाई की भले ही कई तस्वीरें छपती रही हों, अंतत: निवेशित पूंजी की धारा उसी दिशा में बहेगी जहां सुरक्षित परिवेश में, निश्चित सेवा-श्रम कानूनों की मदद से उसके अनिर्बाध बहने की पक्की गारंटियां उपलब्ध हों। यही वजह है कि विश्व के सभी सफल बाजार वे हैं जहां बात-बात में सड़कों पर मार पिटाई, घर में घुसकर लोगों की हत्या न की जा रही हो और कंपनियों और सरकारों के बीच हुए करारनामों को पवित्र और अनुल्लंघनीय माना जाए।

सभी निवेशक चाहते हैं कि सरकारें भले बदल जाएं, लेकिन जिन नीतियों-परिस्थितियों के तहत उन्होंने उपक्रम विशेष में निवेश करना तय किया था वे कतई न बदलें। जब वे पाएं कि लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों या ड्रोंस की हर बड़ी खरीद पर सरकार जब चाहे पुनर्विचार कर सकती है। और ई- कॉमर्स के नियमों में भी सरकार की एक पसंदीदा भारतीय उपक्रमी को अतिरिक्त फायदा पहुंचाने के लिए अचानक बदलाव संभव है, तो ये बातें उनको बहुत सशंक बना सकती हैं।

आजादी का हमारा समय दो बड़े सवाल आसमान की तरफ फेंक रहा है। एक, जब पुतिन पूंजीवादी योरोप के सद्गुण अपना चुके हों, अमेरिका इमरान को अफगानिस्तान का राजदंड थमा रहा हो, ब्रिटेन योरोपीय महासंघ से अलग होने जा रहा हो और आयरलैंड एकीकृत होकर स्वाधीनता की तरफ, तो ऐसी हैरतअंगेज हलचलों से भरे वक्त में क्या कोई भी सरकार मनमोहन सिंह की अर्थनीति के सद्गुण स्वीकार किए बिना विदेशी पूंजी का पलायन रोक सकेगी?

और दो, अगर उस मुकाम पर कांग्रेसियत को स्वीकार किए बिना लगातार युवा बेरोजगारों की भीड़ से फटे जा रहे भारत में आर्थिक सामाजिक शांति बनाए रखना असंभव है, तो पुरानी कांग्रेस को नेस्तनाबूद कर कांग्रेस की पुनर्रचना का खाका किस तरह असंभव, हेय अथवा नाजायज बन जाता है? अपरिवर्तन के बीच क्रांतिकारी बदलाव कांग्रेस में होता रहा है और यह बदलाव जब निकलेगा तो अखबारों, टीवी बहसों या ट्वीटों से नहीं, भारत की उन्हीं गहराइयों से चुपचाप उपज आएगा, जिनकी लिपि पढ़ पाने की तमीज मोहनदास करमचंद गांधी के बाद किसी को नहीं रही।

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