विचार

राम पुनियानी का लेखः क्या पुलवामा और बालाकोट के बाद क्षेत्र में शांति हो सकती है?

पुलवामा आतंकी हमले और उसके बाद भारत के जवाब से दोनों देशों में एक जुनून सा पैदा हो गया है। अब हम बस उम्मीद कर सकते हैं कि दोनों देशों के बीच कटुता और न बढ़े। हमें इस बात पर विचार करना ही होगा कि क्या हम इस क्षेत्र को बार-बार हिंसा की आग में झोंक सकते हैं?

फोटोः सोशल मीडिया

राम पुनियानी

भारत ने दावा किया है कि भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान की धरती पर स्थित आतंकी कैंपों पर हमला कर उन्हें नष्ट कर दिया है और बड़ी संख्या में आतंकवादियों को मौत के घाट उतार दिया है। यह हमला कश्मीर के पुलवामा में हुए भयावह आतंकी हमले के बाद किया गया जिसमें 44 सीआरपीएफ जवान मारे गए। पुलवामा में 14 फरवरी को विस्फोटकों से भरी एक कार से सीआरपीएफ के काफिले पर हमला कर विस्फोट किया गया।

इस घटना पर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और अनेक बीजेपी नेताओं ने कहा कि चूंकि देश में कांग्रेस की नहीं, मोदी की सरकार है, इसलिए उपयुक्त कार्रवाई की जाएगी। ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की गई गई जैसे मोदी के सत्ता में आने के बाद से ही राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता शुरू हुई है और उसके पहले की ‘कमजोर कांग्रेस सरकारें तो बस हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती थीं।

तथ्य क्या हैं? आतंकी हमले से संबंधित कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। ऐसा लगता है कि पीएम मोदी हमारी सीमाओं की रक्षा करने में विफल सिद्ध हुए हैं। सबसे बड़ा सवाल ये है कि अत्यधिक घातक विस्फोटकों से लदी एक कार श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग जैसे अतिसुरक्षित क्षेत्र तक भला कैसे पहुंची? इस सुरक्षा चूक के लिए कौन जिम्मेदार है?

ध्यान रहे कि 26 नवंबर 2008 को हुए मुंबई हमले के बाद तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल और महाराष्ट्र के गृहमंत्री आरआर पाटिल दोनों को इस्तीफा देना पड़ा था। किसी भी भूल के सुधार की दिशा में पहला कदम यह पता लगाना होता है कि भूल क्यों और कैसे हुई? लेकिन पुलवामा हमले में हुई गंभीर सुरक्षा चूक के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। लापरवाही का आलम तो यह था कि इस घटना के काफी समय बाद तक पीएम मोदी को इसकी जानकारी ही नहीं थी और वे जिम कार्बेट पार्क में वीडियो शूट कराने में व्यस्त थे।

इस आतंकी हमले के बाद जो कुछ हुआ उसका सबसे चिंताजनक पहलू देहरादून, लुधियाना, औरंगाबाद और देश के अन्य कई शहरों में कश्मीरी विद्यार्थियों और व्यापारियों पर हुआ हमला था। अधिकांश मामलों में हमलावर हिन्दू दक्षिणपंथी समूहों से जुड़े हुए थे। जहां कई सिख संगठन कश्मीरियो की रक्षा में आगे आए वहीं सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि कश्मीरियो को सुरक्षा दी जानी चाहिए। इसके काफी बाद पीएम मोदी ने कहा कि कश्मीरियों पर हमले नहीं होने चाहिए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इसके पहले ऊना में दलितों पर हुए हमले और गाय के नाम पर मुसलमानों की लिंचिंग के मामलों में भी अपना मुंह खोलने में पीएम मोदी ने काफी देर कर दी थी।

पहले से ही अति राष्ट्रवाद की आड़ में नफरत फैलाने में लगे हमारे कई टीवी चैनलों ने इस घटना के बाद कश्मीरियों और मुसलमानों के खिलाफ वातावरण बनाना शुरू कर दिया। मीडिया के एक हिस्से, न्यूज चैनलों और कई संगठनों के चलते ही देश में ऐसा वातावरण बना जिसके कारण कश्मीरी विद्यार्थियों और व्यापारियों को निशाना बनाया गया।

मेघालय के राज्यपाल तथागत रॉय ने तो सभी कश्मीरियों के बहिष्कार का आव्हान कर डाला। यह पूरी तरह से संविधान के खिलाफ है और उन्हें इस बात के लिए बाध्य किया जाना चाहिए कि वे इसे वापस लें। इस घटनाक्रम का सबस अजीब पहलू था बेंगलुरू स्थित करांची बेकरी पर हमला। इस बेकरी चेन की स्थापना खेमचंद रमनानी ने की थी जो विभाजन के बाद भारत के हैदराबाद में आकर बस गए थे। वर्तमान सरकार बड़ी-बड़ी बातें करने में तो सिद्धहस्त है, लेकिन जब आतंकवाद से मुकाबला करने की बात आती है तो यहां उसका रिकार्ड बहुत खराब है।

आधिकारिक आंकड़े साफ बताते हैं कि देश में आतंकी घटनाओं, आंतकी संगठनों से जुड़ने वाले भारतीयों और ऐसी घटनाओं में मरने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या में यूपीए शासनकाल की तुलना में कई गुना इजाफा हुआ है। इंडिया स्पेन्ड एनालिसिस (एक डेटा पोर्टल) ने सरकारी आंकड़ों के हवाले से बताया है कि साल 2015 से लेकर 2017 के बीच कश्मीर में आतंकवाद से जुड़ी 800 घटनाएं हुई हैं। इनकी संख्या 2015 के 208 से बढ़कर 2017 में 342 हो गईं। इन तीन साल में इन घटनाओं में 744 लोग मारे गए जिनमें से 471 आतंकवादी थे, 201 सुरक्षाकर्मी और 72 नागरिक।

इसका मुख्य कारण है असंवेदनशील नीतियों और बातचीत की जगह बंदूकों का इस्तेमाल करने की जिद। एक बार फिर पुलवामा के बाद सरकार ने इस क्षेत्र में सेना की मौजूदगी में जबरदस्त इजाफा किया है, अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा वापस ले ली गई है और युवाओं को यह चेतावनी दे दी गई है कि अगर उन्होंने बंदूक उठाई तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। यहां यह बता देना अहम है कि आदिल अहमद डार, जिसने सीआरपीएफ की बस से विस्फोटकों से भरी अपनी कार भिड़ाई थी की सैन्य कर्मियों ने बुरी तरह पिटाई की थी। उसके बाद वह इस राह पर चल निकला और जैश-ए-मोहम्मद की जाल में फंस गया।

हम अब केवल उम्मीद कर सकते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच कटुता और न बढ़े। देश में एक जुनून सा पैदा कर दिया गया है और पाकिस्तान का मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा समाप्त कर दोनों देशों के बीच व्यापार को गंभीर चोट पहुंचाई गई है। हमें इस बात पर विचार करना ही होगा कि क्या हम इस क्षेत्र को बार-बार हिंसा की आग में झोंक सकते हैं? भारत-पाकिस्तान और कश्मीर मामलों में जो भी विवाद हैं उनका एकमात्र हल वार्ता है। उम्मीद है कि हालिया हमला, जिसे सर्जीकल स्ट्राइक 2.0 कहा जाता है, दोनों देशों के बीच युद्ध में न बदल जाए।

हालांकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा है कि अगर उनके देश को पर्याप्त सुबूत दिए जाएंगे तो वह आतंकियों के विरूद्ध कार्रवाई करेगा। साथ ही उन्होंने बातचीत की पेशकश भी की है। संयुक्त राष्ट्र संघ महासचिव ने भी दोनों देशों के बीच वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाने का प्रस्ताव दिया है ताकि इस क्षेत्र में शांति स्थापित हो सके। हमें इस अवसर को नहीं गवांना चाहिए। भारत को आज विकास, भ्रष्टाचार, रोजगार और कृषि संकट जैसे मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है। यही इस क्षेत्र में शांति और समृद्धि लाएगा। बारूद की गंध और नफरत की फिजा हमें कहीं नहीं ले जाएगी।

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनीएवार्ड से सम्मानित हैं)

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