जाति मुक्त समाज और जनगणना का सवाल: पिछड़ों के विकास का रास्ता निकालने का औजार है जातीय जनगणना

हमारे समाज में जातीय जनगणना को लेकर चल रही बहसों ने कई तरह के सवालों को सामने रखा है। इसके इसके पक्षकार कहते हैं अध्ययन बताते हैं कि जातियों के आर्थिक और सामाजिक विकास में जातीय जनगणना का बहुत महत्व है। वहीं इसका विरोध करने वाले भी हैं। यहां जनगणना के पक्ष में तर्क....

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अनिल चमड़िया

जातीय जनगणना इसलिए जरूरी है क्योंकि हम एक जाति आधारित समाज में रहते हैं। ब्रिटेन में 1801 में जनगणना के 70 साल बाद 1872 में ब्रिटिश शासकों ने भारत में जनगणना की शुरुआत की। उस दौरान जी.एस घुर्ये, जो जनसंख्या विज्ञानी माने जाते हैं, को इस बात के संकेत मिले कि भारत में जाति का सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने इस विमर्श को आगे बढ़ाया। इसके बाद कई लोगों द्वारा किए गए अध्ययनों में पाया गया कि जातियों के आर्थिक और सामाजिक विकास में जातीय जनगणना का बहुत महत्व है। भारत में 1931 तक जातीय जनगणना चली। 1941 में दूसरे विश्वयुद्ध के कारण यह नहीं हुई। फिर देश आजाद हो गया और जातीय जनगणना बंद हो गई।

आजाद भारत में पहली जनगणना में जाति के कॉलम को हटा दिया गया। कहा गया कि हमें जातिमुक्त समाज बनाना है। सवाल है कि क्या हमारे पास इसकी कोई योजना थी? अनुभवों से पता चलता है कि समाज के पिछड़े तबकों का विकास तो हुआ नहीं। उलटा, जातिवाद और फैला। आप जिस समाज को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से समृद्ध करने का दावा करते हैं, वह तो पीछे ही रह गया। इसका अर्थ है कि समाज में जाति की गहरी पैठ को आप अनदेखा करना चाहते हैं, खासकर वर्चस्व की पैठ को।

इसलिए तर्क यह है कि जातिमुक्त समाज का कोई भी कार्यक्रम जातीय जनगणना से ही बनेगा। गणना में एक अंतरजातीय कॉलम भी होना चाहिए क्योंकि देश में अभी दस प्रतिशत अंतरजातीय विवाह हो रहे हैं, तो इनकी संतानें गणना में कौन-सी जाति लिखाएंगी। यह व्यवस्था होनी चाहिए कि वे अपने को अंतरजातीय घोषित कर सकें, ठीक उसी तरह से जिस तरह कोई अपने को नास्तिक घोषित करता है।


किसी भी समाज का जो विकास होता है, उसकी अगुवाई वह तबका करता है जो शिक्षा के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक स्तर पर पहचान में समृद्ध होता है। यह कहना कि पिछड़े वर्गों के पढ़े-लिखे और प्रभावशाली लोग जातीय जनगणना की मांग कर रहे हैं, तो इसका जवाब है कि आजादी के पूरे आंदोलन का नेतृत्व भी तो पढ़े-लिखे तबकों ने ही किया था। उस समय अंग्रेज भी यह तर्क दे सकते थे कि इसका तो जमीन से कोई लेना-देना नहीं है, यह मांग तो ऊपर के लोग कर रहे हैं। जो लोग इस तरह के तर्क दे रहे हैं, वे अपनी जातीय भावना को टटोलें और फिर वे पाएंगे कि उनका तर्क कितना खोखला है।

अब रही बात बीजेपी की, तो यह साफ है कि बीजेपी जातीय जनगणना से इसलिए भाग रही है क्योंकि वह जाति-मुक्त समाज नहीं बनाना चाहती बल्कि वह और भी गहरे रूप में जातिवाद का विस्तार करना चाहती है। वह पिछड़ों और दलितों में कुछ जातियों की पहचान करती है और उनके भीतर हिंदुत्व की भावना को उभारकर उनको उनके पास- पास की जातियों के साथ संघर्ष की स्थिति में खड़ा कर देती है। वह इन जातियों की गोलबंदी को सांप्रदायिक आधार से तोड़ती है लेकिन उसका आधार जातिवाद ही होता है। बीजेपी का पिछड़ी जातियों को कुछ देने का दावा केवल प्रतीकात्मक है। वर्तमान में केंद्रीय मंत्रिमंडल में जिन पिछड़ों को जगह दी गई है, क्या उनमें से किसी को गृह, वित्त, रक्षा, स्वास्थ्य-जैसे महत्वपूर्ण विभागों वाले मंत्रालय दिए गए हैं? सवाल है कि आपने कितने पिछड़ों को वाइस-चांसलर और प्रोफेसर की नौकरी दी? दरअसल आप जाति के साथ खेलना चाहते हैं इसलिए लगातार जातीय जनगणना से भाग रहे हैं।

(कृष्ण सिंह से बातचीत के आधार पर)

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