बिहार में नजर आ रहे हैं राजनीतिक बदलाव के आसार

कांग्रेस पूरे देश में फैली एक सेक्युलर पार्टी है। आगामी चुनावों के लिए गठबंधन में इसकी भूमिका प्रमुख होने वाली है। लेकिन संघ-बीजेपी को हराने के लिए इसे हाशिये की राजनीतिक आकांक्षा को समझना होगा।

फोटोः सोशल मीडिया
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संजीव चंदन

हाल के उपचुनावों के नतीजों से तेजी से राजनीतिक बदलाव के आसार आ रहे हैं। बिहार के परिणाम भी इस बदलाव की पूर्वपीठिका हैं। सोशल मीडिया पर इस बदलाव के मिजाज को पकड़ने के अपने ही तरीके हैं। रामविलास पासवान को 'राजनीतिक मौसमविज्ञानी' बताते हुए लगातार पोस्ट किये जा रहे हैं और उनके द्वारा कांग्रेस की प्रशंसा करते हुए हालिया बयान को राजनीतिक बदलाव का संकेत बताया जा रहा है। यह बिना किसी कारण के नहीं है। रामविलास पासवान 1996 से बनी सभी सरकारों के साथ रहे हैं और मंत्री बने हैं।

बिहार के जहानाबाद और अररिया में राष्ट्रीय जनता दल की जीत को यूं तो अपनी ही सीटों को बरकरार रखने के तौर पर बताया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत इतनी भी सपाट नहीं है। इन दोनों ही सीटों पर जब आरजेडी के उम्मीदवार जीते थे, तब जदयू उसके साथ गठबंधन में थी। इस बार जदयू का गठबंधन बीजेपी के साथ था। बीजेपी-जदयू गठबंधन ने 2010 और 2009 में क्रमशः जहानाबाद और अररिया की सीटें जीती थीं। यानी इन दोनों सीटों पर अकले राष्ट्रीय जनता दल की जीत को लालू प्रसाद और उनकी विरासत संभाल रहे तेजस्वी यादव पर मतदाताओं के विश्वास की पुनर्वापसी के तौर पर देखा जा सकता है।

आखिर क्या हो रहा है बिहार में?

बिहार में एक बार फिर हाशिये के समाजों में गोलबंदी शुरू हो गई है। 90 के दशक की शुरुआत में लालू प्रसाद को अपना नायक मानने वाली जमातें, एक बार फिर से उस नायकत्व को टटोल रही हैं। हालांकि, डगर इतना आसान भी नहीं है। 90 के दशक से ही जब मंडल की राजनीति के साथ पिछड़ी, अति पिछड़ी जातियों का राजनीतिकरण शुरू हुआ था, तब बीजेपी और संघ परिवार ने इन्हीं जमातों से हिंदुत्व के फायरब्रांड नेताओं को तैयार कर इस राजनीतिकरण का अपने हित में इस्तेमाल की सफल कोशिश शुरू कर दी थी। कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार जैसे फायर ब्रांड नेता इसी रणनीति के मोहरे थे। दूसरी ओर अस्मिता के स्वाभाविक विकास में पीछे छूट गयी जातियां अपना प्रतिनिधित्व तलाश रही हैं। इस तलाश को नीतीश कुमार ने पंचायत चुनावों सहित अन्य हिस्सेदारी के अवसरों में अतिपिछड़ा कैटगरी देकर और मजबूत बनाया है। इस लिहाज से अतिपिछड़ा समूह नायकत्व की चाह में सिर्फ लालू प्रसाद के प्रति आश्वस्त नहीं हो सकता। इसके अलावा बीजेपी ओबीसी आरक्षण का केंद्रीय स्तर पर अतिपिछड़ों के लिए विभाजन कर इन जातियों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास करने वाली है। इस तरह बीजेपी 90 के दशक से एक कदम आगे बढ़कर मंडल और कमंडल दोनों का ही इस्तेमाल अपने लिए करने की तैयारी में है।

रस्साकशी

जेडीयू के पूर्व विधान पार्षद और नीतीश कुमार के मित्र रहे लेखक प्रेम कुमार मणि कहते हैं, “मैं खुद जहानाबाद के चुनाव के दौरान वहां कई बार गया। बड़े अंतराल से राजद की जीत एक संकेत तो है ही लेकिन मैंने खुद देखा कि दलितों, पिछड़ों, अति पिछड़ों में लालू प्रसाद के प्रति नया उत्साह है।” वैसे भी अतिपिछड़ा समूह के भीतर जो सामाजिक, सांस्कृतिक आंदोलन रहा है, वह उन्हें सांप्रदायिक शक्तियों के साथ जाने से रोकता है। पूरा भक्ति आंदोलन अतिपिछड़ी जाति के संत कवियों का था। इस लिहाज से बीजेपी-जेडीयू इस समूह को पूरी तरह अपने प्रति गोलबंद करने में सक्षम नहीं है।

मौसम विज्ञान

प्रेम कुमार मणि के कथन को इन दिनों बिहार एनडीए में मची खलबली से भी समझा जा सकता है। जीतनराम मांझी पहले से ही महागठबंधन की राह ले चुके हैं, केंद्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा इसी राह पर चलने के संकेत दे रहे हैं, तो रामविलास पासवान ने भी अपनी हलचल तेज कर दी है। ऐसा इसलिए कि इनके आधार वोट बैंक में खलबली है और बीजेपी-संघ के खिलाफ एक बेचैनी सी है। यही कारण है कि हिंदुत्ववादी शक्तियां सांप्रदायिक आधार पर बिहार में गोलबंदी करना चाह रही हैं, इसे बीजेपी नेताओं के सांप्रदायिक बोलों से समझा जा सकता है, या फिर अररिया में 'पाकिस्तान मुर्दाबाद' के नारे वाले फर्जी वीडियो से या भागलपुर में तनाव फैलाने की कोशिशों से। दरभंगा में जमीन विवाद में मारे गये एक यादव नाम को भी सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई। सामाजिक कार्यकर्ता रिंकू कहते हैं, “अतिपिछड़े समूहों में पिछड़े नेतृत्व के प्रति सवाल हैं तो हिन्दूवादी संगठनों के खिलाफ आक्रोश, सामाजिक न्याय की दिशा इससे ही तय होनी है।”

कांग्रेस क्या करे?

प्रेम कुमार मणि कहते हैं, “कांग्रेस पूरे देश में फैली एक सेक्युलर पार्टी है। आगामी चुनावों के लिए गठबंधन में इसकी भूमिका प्रमुख होने वाली है। लेकिन संघ-बीजेपी को हराने के लिए इसे हाशिये की राजनीतिक आकांक्षा को समझना होगा, तभी बिहार सहित हिंदी पट्टी में इसकी मजबूत पुनर्वापसी हो सकती है। इमरजेंसी के दौरान उत्तर भारत के इलाकों में राजस्थान से लेकर उड़ीसा तक कांग्रेस ने ब्राहमणों को नेतृत्व दे रखा था, जिसके बाद इस इलाके में इसकी बहुत बड़ी हार हुई। वहीं दक्षिण भारत में ओबीसी राजनीति ने कांग्रेस की पतवार थामे रखा। अब यदि इसे पुनर्वापसी करनी है तो पिछड़ी-अतिपिछड़ी-दलित-आदिवासी आकांक्षाओं को समझना होगा, उन्हें नेतृत्व देना होगा। फिलहाल तो बिहार सहित पूरे देश में विश्वसनीय गठबंधन बनाने में कांग्रेस नेतृत्व की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए।”

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