मृणाल पाण्डे का लेखः प्रांतीय चुनावों का चैप्टर बंद हुआ, 2024 की तैयारियां शुरू, अब आगे देखिए क्या-क्या होता है?

स्व. राजेंद्र माथुर सही कहते थे- हम कर्मविमुख भारतीयों में राज्येंद्रिय का अभाव है। 2022 के भी नतीजे दिखाते हैं कि घर-भीतर जितनी भुन-भुन करे, जनता ऐसा वर्ग या वर्ण युद्ध नहीं चाहती जिसमें बरसों लगातार खून-पसीना बहाना जरूरी हो। लेकिन उसे विश्वगुरुडम चाहिए।

फोटोः प्रतीकात्मक
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मृणाल पाण्डे

पांच में से चार राज्यों के असेंबली चुनाव जीतने के बाद बीजेपी इन दिनों जिसे उत्तराखंडी मुहावरे में कहते हैं, बाघ मार कर बाघंबर पर बैठी हुई है। उत्तर प्रदेश को जीतने का सुखद अहसास इनमें सबसे गहरा है। इतना कि पंजाब विजयी केजरीवाल का पंजाब में तुरत-फुरत मान की ताजपोशी कराने के बाद भाजपाइयों द्वारा तुरंत मुख्यमंत्री न चुन पाने का ताना शीर्ष पर गुस्सा उपजाने की बजाय चिकने घड़े पर पानी की तरह बह गया। लेकिन यह अफसोसजनक है कि इन चुनावों में भारतीय लोकतंत्र के कुछ निकृष्टतम गण कमोबेश सब दलों में दिखे।

सबसे ऊपर था कई थैलीशाहों, दलबदलुओं और अपराधियों (कुछ उम्मीदवारों में तीनों दुर्गुण थे) को बतौर उम्मीदवार नामजद करना। किस राज्य में जीते उम्मीदवारों का आपराधिक कैसा रिकार्ड है, उनकी घोषित संपत्ति क्या है, जो पिछली बार जीत कर फिर चुनाव लड़े गत पांच सालों में उनकी संपत्ति में कितनी बढ़ोतरी हुई और वंशवाद विरोधी दलों ने कितने वंशाधारित टिकट दिए, कितने वंशवादियों को फोड़ कर समारोहपूर्वक अपनी पार्टी में शामिल किया, यह प्रत्यक्ष है, जिसे प्रमाण की जरूरत नहीं। गूगल युग में यह तमाम ब्योरे सर्वसुलभ हैं इसलिए हम उन पर यहां नहीं जाएंगे।

वैसे तो हर पेशेवर अपराधी कानून और राजकीय नियमों के खिलाफ क्रांतिकारी विद्रोही ही होता है लेकिन अगर उसकी बगावत निजी हो और राजनीति से न जुड़ी हो, तो वह पाताल का ऐसा निवासी बना रहता है जिसका राष्ट्र स्तर पर कोई घातक असर नहीं पड़ता। उसका निजी विद्रोह छिटपुट जुर्म (और कभी-कभार यथोचित सजा के साथ) बिना जनता को ब ड़ा नुकसान किए खत्म हो जाता है। लेकिन अगर एक घोषित अपराधी ससम्मान राजनीति से जुड़कर अपने बाहबुलियों की फौज सहित राजनीति के सरपरस्तों की मदद करके जिता दे, तो सारे अपराधियों को कॅरीयर बनाने और विपक्षी पार्टियों को अपनी चुनावी मशीनों के अपराधीकरण के फायदे दिखने लगते हैं।

जब यह मसला मीडिया में आए (गो आजकल वह दुर्लभ हो चला है) तो जवाब में एक गिरे हुए राज समाज को बदलने के लिए गिरे हुओं की फौज चाहिए, कांटा कांटे से ही निकलेगा जैसे तर्क टीवी पर सुनाई देने लगते हैं। जब गंगा में डुबकी मारने की तरह सत्तारूढ़ दल में शामिल होने से सारे पाप धुलवा कर अपराधी पवित्र घोषित हो, तो वह क्या पागल है कि कहीं और जाएगा? इस तरह दलीय उम्मीदवार की बतौर पेशेवर अपराधियों को जब-तब दलों द्वारा चुनाव में उतारा जाने लगा है। आम नागरिकों के लिए इस सबके दीर्घकालिक नुकसानों पर अधिक कहना व्यर्थ है क्योंकि उदाहरण कई हैं और हमारे चारों तरफ फैले हुए हैं। दुनिया के 146 देशों की प्रसन्नता तालिका (हैप्पीनेस इंडेक्स) में भारत जो लुढ़क कर 139वीं पायदान पर आ गया है, वह बात भी इसी की तसदीक करती है।


आज समाज में दिमागदार (यानी तटस्थता से विवेचन करने, समाचारों की तह तक जाने वाले) लोग हेडलाइन के बाद अक्सर मखु्यधारा का टीवी नहीं देखते, न ही अखबार अधिक पढ़ते हैं, जहां हर कहीं खबर से अधिक विवेचन है और टीवी या अखबारी चर्चा पैनलों पर पार्टी प्रवक्ता और उनकी मीडिया में जड़ जमाए बैठी बी टीम ही काबिज है। यहां पर मीडिया के घरानों और उनके प्रतिनिधि संपादकों-एंकरों का वह निकृष्टतम धंधई रूप प्रकट होता है जो चुनाव-दर-चुनाव उनको सरकारी विज्ञापनों की मोटी कमाई कराता है। अब चूंकि राज्य स्तर पर कई जगह विपक्षी सरकारें हैं, इसलिए असेंबली चुनावों में उनका भी खयाल रखना जरूरी है, न जाने किस भेष में कब नारायण मिल जाएं?

अब तक सब को पता हो चुका है कि वंशवादी कांग्रेस का समूल विनाश कर खुद को नए आम आदमी (या औरत) के प्रति सदय नए भारतीय लोकतंत्र का वाहक कहने वाली पार्टियां छिटपुट पुरानी योजनाओं को नया नाम देकर अपनी बनाने, कुछेक स्टेशनों-शहरों के नाम बदलने और पहले से गतिशील निर्माण योजनाओं की समाप्ति पर उनका जोर-शोर से लोकार्पण करने और सैकड़ों शिलान्यासों के बाद भी देश की दशा-दिशा में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं लाई हैं।

महंगाई और बेरोजगारी अमीर-गरीब के बीच की खाइयां सब गहराए हैं, और स्कूलों, उच्च शिक्षा परिसरों की हालत दयनीय है। यह सब और शेयर बाजार, बैंकिंग तथा निजी उपक्रमों की चंद सिरमौर यूनीकॉर्न कंपनियों में पकड़े गए घोटाले क्या संदेश देते हैं? यही कि सत्तारूढ़ सरकारें सर्वहारा की नहीं, छोटे- मोटे व्यापारियों और बिल्डरों की पार्टियां हैं जिनके प्रशासकीय मशीनरी से मधुर और अंतरंग रिश्ते हैं।

होलाष्टक की शुरुआत इंद्रध्वज की स्थापना से हो जो मुहल्ले और शहर के चौराहे पर समारोह के साथ ला कर लगे, यह हमारे वैदिक युग से चला आ रहा है। हमारा कृषक पशुपालक समाज वर्षा और धनधान्य के अधिपति इंद्र के नाम की रंगारंग ध्वजा बांध कर नई फसल कुशलता से घर लाने के लिए धन्यवाद में रंगारंग सामाजिकता से इंद्र के नाम के गिर्द नाचता-गाता और होली मनाता रहा है। इस बार सोशल मीडिया में होली पर इंद्र की बजाय कई जगह भाजपा का ध्वज लगा देखा। मदनोत्सव से पारंपरिक देवताओं को अपने इंद्र महाराज सहित एकदम ही रुखसत कर दिया गया क्या?


अब दैनिक जागरण पर खबर है कि सरकारी आदेशानुसार 25 मार्च को उत्तर प्रदेश में भव्य शपथ ग्रहण समारोह पर सब जिलों से कार्यकर्ता वाहनों पर अनिवार्यत: बीजेपी का झंडा लगाकर आएंगे। सेक्टर स्तर पर सबह 8 से 10 बजे तक मंदिरों में दो घंटे तक पूजा-पाठ होगा, घंटे बजाए जाएंगे। यह सवाल मन में आना स्वाभाविक है कि 2019 में बालाकोट के बाद राष्ट्रीय ध्वज को जैसा मीडिया बिल्ड अप मिला था, जिस तरह बीजेपी शासित राज्यों में ऊंचे से ऊंचा तिरंगा लगाने की होड़ मच गई थी, और हाल में यूक्रेन से लौटे छात्रों को तिरंगा हाथ में पकड़े बार-बार दिखाया गया, उस वाले समेकित राष्ट्र प्रेम का क्या हआ?

इंद्रासन अब दूसरे का है। गुडबाय इंद्र, नाइस नोइंग यू! इंद्रोत्तर युग में नया क्या है? लगभग हर जगह कांग्रेस युगीन लाइसेंस, कोटा-परमिट राज्य, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं इनकी! कश्मीर, कर्नाटक और पूर्वोत्तर हिजाब या घुसपैठ या आतंकवाद के नाम पर शासन को जब चाहे कुछ समुदायों के खिलाफ हिंसा का, बिल्डरों की भाषा में कहें, तो कंट्रोल्ड एक्सप्लोजन (सीमित विस्फोट) करने का परमिट चाहते हैं। निवर्तमान मुख्यमंत्रियों की मांग रही कि दोबारा पार्टी को जिताने के उपलक्ष्य में पुन: उसी पद पर वापसी का लाइसेंस मिले, तो वे 2024 में भी जीत का माहौल पैदा कर सकेंगे। सो, दस-बारह दिन की ऊहापोह के बाद यही हुआ है। चारों राज्यों में पुराने मुख्यमंत्रियों को ही दोबारा ताजपोशी का सुख मिलेगा। इनमें युवतम मुख्यमंत्री उत्तराखंड के धामी जी भी शामिल हैं जो ममता बनर्जी की तरह खुद खटीमा सीट हार कर भी राज्य में पूरी स्वामिभक्ति से रथचक्र की धुरी को थामे रहे।

सत्ता का सूबे के वृहत्तर जनहित में उपयोग का संकल्प नहीं, लोकल हितों पर दिल्ली की योजनाओं को चुनौती देने का हौसला भी नहीं, वृद्ध पेंशन, मुफ्त महीने भर का राशन और एक फोकट का गैस सिलेंडर पाकर वोट तय करने वाली प्रांतों की जनता को यही स्वीकार है, तो यही सही। होली के तुरंत बाद पेट्रोल के दामों में सरकार ने जो बेतहाशा बढ़ोतरी की है, वृद्ध जनों को सफर में मिलने वाली रियायत को जिस बेदिली से खत्म किया और कश्मीर में जो सुगबुगाहटें हैं, उनसे साफ है कि प्रांतीय चुनावों का चैप्टर बंद हुआ और 2024 की तैयारियां शुरू हो रही हैं।

और बहुसंख्य जनता का यह मन बन गया है कि वह प्रयोग की आंच में झुलसने की बजाय जैसी भी वह है, उसी अकर्मक जिंदगी का बीमा चाहती है। उसे उस समाज से एतराज नहीं जहां गरीब बाभन भी अमीर बनिये से खुद को बेहतर मानता हो और क्षत्रिय जमीन खोकर भी वर्ण व्यवस्था के बाहर वालों पर ठकुरैती दिखाने को आजाद रहे। मंझोली जातियों, दलितों को इस सड़ांध की सफाई का अवसर इस बार मिला था, पर ऐन समय वे जातीय धाराओं- उपधाराओं में बंट गए और तब नई तरह का नेता गढ़ने वाली हर प्रयोगशाला खंडहर हो गई।


स्व. राजेंद्र माथुर सही कहते थे- हम कर्मविमुख भारतीयों में राज्येंद्रिय का अभाव है। 2022 में भी नतीजे दिखाते हैं कि घर-भीतर वह जितनी भुन-भुन करे, भारत की जनता ऐसा वर्ग या वर्ण युद्ध नहीं चाहती जिसमें बरसों लगातार खून-पसीना बहाना जरूरी हो। लेकिन उसे विश्वगुरुडम चाहिए। इसीलिए कई बाबा, साधु, लोक कलाकार सामने सजा दिए गए हैं। जब-तब डमरू, भजन खड़ताल और नदी तटों पर भव्य दीपावली और आरतियों के आयोजन के लगातार प्रसारण और कुछ और मंदिरों को दोबारा बनाने या पाक अधिकृत कश्मीर को छीन लाने के बयानात भी देश को प्रतीकात्मक विश्वगुरुडम का आभास देते रहते हैं।

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